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शाहीनबाग के लिए सुप्रीम कोर्ट से वार्ताकार नियुक्त होना मोदी सरकार की बड़ी विफलता

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Faisal Anurag

केंद्र सरकार शाहीनबाग के आंदोलनकारियों से न तो कोइ बात कर रही है और न ही देशभर में चल रहे प्रतिरोधों को लोकतांत्रिक तरीके से हल करने की पहल. सुप्रीम कोर्ट ने वार्ताकारों की नियुक्ति कर ये सवाल खड़ा किया है. लोकतंत्र में प्रतिरोध और असमति के स्वर का अपना महत्व है और उसकी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए.

शाहीनबाग में धरने पर बैठी महिलाएं बार-बार बातचीत की इच्छा प्रकट कर रही हैं. लेकिन केंद्र सरकार का कोइ भी प्रतिनिधि बात करने के लिए आगे नहीं आया है. जबकि दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान शाहीनबाग को लेकर सबसे ज्यादा सवाल भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने ही उठाया.

गृहमंत्री अमित शाह ने तो वोटरों से जोर से बटन दबाकर करंट शाहीनबाग तक महसूस कराने पर जोर दिया. हालांकि दिल्ली के मतदाताओं ने शाहीनबाग के बहाने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के तमाम प्रयासों को नकार दिया.

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शाहीनबाग में 150 मीटर की सडक पर पिछले 64 दिनों से महिलाएं घरना पर बैठी हुई हैं. सर्द रातों में भी उनका धरना जारी रहा. ठंढ लगने की वजह से एक छोटे से बच्चे की मृत्यु हेने का मुद्दा तो खूब उछला, लेकिन शाहीनबाग के सवालों का जबाव देने का कोई प्रयास नहीं हुआ. कुछ जानकार मान रहे हैं कि केंद्र सरकार की इस उपेक्षा वाली नीति के कारण सुप्रीम कोर्ट को आगे आना पड़ा है.

किसी भी लोकतंत्र में इस तरह का प्रतिरोध आमबात है. सरकारों की नीतियों और कानूनों के खिलाफ आवाम का आंदोलन करना भी नई बात नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने हाल ही में कहा है कि असहमति और विरोध एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, और उसे देशद्रोह नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने शाहीनबाग के संदर्भ में सड़क जाम की एक याचिका की सुनवाई करते हुए भी लोगों के प्रतिरोध के अधिकार को जायज करार दिया है. कोर्ट से समस्या के हल के लिए तीन व्यक्तियों को बातचीत कर रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया है.

वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े और रामचंद्रन तथा पूर्व सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला को यह दायित्व दिया है कि वे शाहीनबाग जायें और लोगों से बात करे. बुधवार की शाम को हेगड़े और रामचंद्रन ने शाहीनबाग की महिलाओं से ढाई घंटे तक बात किया. बातचात आगे भी जारी रहेगी. वार्ताकारों को सोमवार को रिपोर्ट दाखिल करना है.

बातचीत के दौरान उस समय एक भावुक दृश्य पैदा हो गया. जब संजय हेगड़े भी रूआंसे हो गए. उस समय एक लड़की अपनी पीड़ा सुना रही थी. जुनैब नाम की लड़की ने उन हालातों का तार्किक ब्योरा दिया, जिस कारण वे धरने पर बैठे हैं.

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सीएए,एनपीआर और एनआरसी ने जिस तरह का ड्रामा पैदा किया है, उसकी चर्चा भी जैनब और जामिया मीलिया की एक स्कॉलर ने बयां किया. शाहीनबाग की दादियों ने भी कहा कि उनके लिए यह अस्त्त्वि का सवाल है.

एक महिला ने तो यहां तक कहा कि प्रधानमंत्री ने तीन तलाक के मुद्दे को खत्म करते हुए मुस्लिम औरतों को अपनी बहन बताया. लेकिन बहनें सर्द रातों में आसमान के नीचे बैठकर कुछ कहना चाहती हैं. उसे सरकार का कोई भी प्रतिनिधि सुनना नहीं चाहता.

महिलाओं ने वार्ताकारों से कहा कि वे दिल का दर्द बताना चाहती है, लेकिन उसे अनसुना किया जा रहा है. वकील रामचंद्रन ने कहा भी कि सुपीम कोर्ट आंदोलन करने के हक की गारंटी देता है.

दिल्ली में हार के बाद अमित शाह के बयानों में बदलाव दिख रहा है. उन्होंने ऑफिस से समय ले कर बातचीत करने का आमंत्रण जरूर दिया है, लेकिन एक सरकार देशभर के 100 से अधिक जगहों के शाहीनबागों और देश के हर कोने में प्रतिरोध की आवाज को अनसुना नहीं कर सकता.

सुप्रीम कोर्ट की पहल बताती है कि लोकतंत्र में विरोध की आवाज को सुलझाने का सरकार दायित्व नहीं निभाकर लोकतंत्र की प्रक्रिया को ही कमजोर कर रही है.

सरकार का दायित्व होता है कि वह उन सवालों का जबाव दे, जो किसी अंदेशे के कारण मुखर हुए हैं. असम में एनआरसी के अनुभव की जो कहानियां आ रही हैं. उससे अंदेशा और मजबूत ही होता जा रहा है.

50 साल की जुबैदा की कहानी कुछ यह दास्तान कहती है. असम में एनआरसी के कारण हो रहे व्यापक अन्याय का एक उदहारण. 50 वर्षीय जुबैदा बेगम एनआरसी की सूचि से छूट गयी हैं. उनको डाउटफुल वोटर मार्क किया गया.

असम के फोरेनर्स ट्ब्यिूनल ने विदेशी घोषित कर दिया. इसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय में केस किया व हार गयीं. उनके द्वारा दिखाए गये दस्तावेजों- भूमि टैक्स की रसीद, बैंक खाता दस्तावेज व पैन कार्ड- को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना गया.

उन्होंने ट्रिब्यूनल और कोर्ट के समक्ष 15 दस्तावेज प्रस्तुत किया था. जनम प्रमाण पत्र न होने के कारण, उन्होंने ग्राम प्रधान द्वारा दिया गया पत्र जमा किया था, जिसे नहीं माना गया. इस चक्कर में उन्होंने अपनी जमीन बेच दी.

और अब परिवार के लिए दो वक्त खाना जुटाना मुश्किल हो गया है. साथ ही डिटेंसन सेंटर में होने वाली मौतों का सवाल भी वार्ताकारों के सामने रख्ते हुए कहा गया कि इससे जबरदसत ड्रामा पैदा होता है.

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