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सूचना आयुक्तों की नियुक्ति : सरकार ने भाजपा के पाले में फेंकी गेंद, बाबूलाल को छोड़कर मांगा दूसरा नाम

  • नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय चयन समिति में नेता प्रतिपक्ष का होना जरूरी
  • भाजपा बाबूलाल मरांडी को घोषित कर चुकी है नेता प्रतिपक्ष, लेकिन मौजूदा विधानसभा नहीं मानती उन्हें विपक्ष का नेता

Amit Jha

Ranchi : झारखंड राज्य सूचना आयोग में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की दिशा में पहल हुई है. चूंकि इसके लिए चयन समिति में सीएम, एक कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता का होना जरूरी है, इसलिए कार्मिक, प्रशासनिक सुधार विभाग ने विधानसभा सचिव से नेता प्रतिपक्ष संबंधी और दूसरी सूचनाएं मांगी हैं. संभव है कि सबसे बड़े विपक्षी दल भाजपा के सचेतक से पूछा जाये कि चयन समिति में भाजपा की ओर से किसे शामिल करना है. हालांकि, भाजपाई इसे सरकार की चाल बता रहे हैं. वे मान रहे हैं कि सरकार सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के मामले में गेंद भाजपा के पाले में डाल रही है. साथ ही एक तीर से कई शिकार भी करने की फिराक में है. भाजपाइयों का कहना है कि पार्टी किसी भी स्थिति में बाबूलाल मरांडी को छोड़कर किसी दूसरे को अपना नेता नहीं बनानेवाली.

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बगैर नेता प्रतिपक्ष के नियुक्ति की तैयारी

गौरतलब है कि झारखंड राज्य सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त और पांच सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की जानी है. लेकिन, इन नियुक्तियों के लिए चयन समिति में नेता प्रतिपक्ष की अनिवार्यता के मामले में राज्य सरकार दूसरा रास्ता अपनाने की तैयारी में है. महाधिवक्ता राजीव रंजन के सुझाव के मुताबिक ऐसा संभव है. लोकायुक्तों की नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को इसका आधार बनाया गया है. इसके मुताबिक, नेता प्रतिपक्ष की घोषणा नहीं हो पाने की स्थिति में या लंबे समय तक ऐसी स्थिति बने रहने के केस में सबसे बड़े विपक्षी दल के किसी नेता को इस जगह पर रखा जा सकता है. विपक्ष के नेता को तीन सदस्यीय समिति में सदस्य बनाया जा सकता है. इसी आधार पर कार्मिक विभाग ने झारखंड विधानसभा से जानकारी मांगी है.

नेता प्रतिपक्ष हैं बाबूलाल : बिरंची

भाजपा के मुख्य सचेतक और विधायक बिरंची नारायण ने न्यूज विंग से कहा कि विधानसभा अध्यक्ष को भाजपा की ओर से नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के बारे में औपचारिक रूप से बताया जा चुका है. उन्हें इस पर अविलंब निर्णय लेते हुए संवैधानिक मर्यादा का पालन करना चाहिए. इसके कारण संवैधानिक संकट की स्थिति है. मुख्य सचेतक होने के नाते उनका दायित्व विधानसभा सत्र के समय पार्टी के विधायकों की उपस्थिति सुनिश्चित कराना होता है. उन्होंने कहा, “मेरे पास सूचना आयुक्तों की चयन समिति में पार्टी की ओर से नेता भेजे जाने संबंधी पत्र नहीं आया है. अगर आयेगा भी, तो पार्टी बाबूलाल जी के नेतृत्व में ही आगे बढ़ेगी. मैं ऐसी किसी समिति का हिस्सा नहीं हो सकता हूं.”

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संवैधानिक व्यवस्था को बनाये रखने में चूक हो रही है : एडवोकेट राजीव

पीआईएल एक्सपर्ट और सीनियर एडवोकेट राजीव कुमार के अनुसार राज्य में संवैधानिक व्यवस्था को बनाये रखने में चूक हो रही है. सरकार और विधानसभा को गंभीरता दिखानी होगी. बाबूलाल मरांडी के मामले में मामला इतना जटिल नहीं है कि उन्हें नेता प्रतिपक्ष न माना जाये. उन्हें नेता प्रतिपक्ष का दर्जा देकर सूचना आयुक्तों की नियुक्ति का मामला जल्दी से जल्दी खत्म किया जा सकता है. ऐसा नहीं किये जाने से जनता आरटीआई के भरपूर उपयोग से वंचित हो रही है. जाहिर है कि इससे करप्शन का केस लगातार राज्य में बढ़ना तय है.

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