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30,000 ग्राम सेवकों से धोखा, नियुक्ति के बाद से ही नहीं मिला मानदेय, अब पल्ला झाड़ रहा कुटीर उद्योग बोर्ड

2017 में हुई थी नियुक्ति, आरटीआई से हुआ खुलासा

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  • बोर्ड ने आरटीआई के जवाब में लिखा हो रही व्यवहारिक परेशानी, तथ्य उपलब्ध नहीं
  • पूर्व सीएस राजबाला वर्मा ने हर माह 1000 देने का किया था वायदा,  पिछले बजट में एक करोड़ 60 लाख का आंवटन किया गया था

Ranchi: लघु, कुटीर उद्यम विकास बोर्ड के गठन को महज डेढ.साल हुए है. जिन लोगों को रोजगार देने के नाम पर बोर्ड से जोड़ा गया, उन्हें बेरोजगार तो किया ही गया साथ ही उन्हें मानदेय भी नहीं दिया गया. अब इस संबध में बोर्ड के पास कोई जानकारी नहीं है. बोर्ड से आरटीआई से मांगने के इसका खुलासा हुआ. दरअसल साल 2017 में प्रखंड समन्वयकों के माध्यम से राज्य में 30,000 ग्राम संयोजकों की नियुक्ति की गयी थी.  मानदेय की मांग को लेकर कई बार ग्राम संयोजकों ने बोर्ड में रिपोर्ट की. जिसके बाद पूर्व सीएस राजबाला वर्मा ने जिला और प्रखंड समन्वयकों के साथ बैठक कर कथित रूप से ग्राम संयोजकों को प्रति माह एक हजार देने का निर्देश दिया था. लेकिन इसके बावजूद ग्राम संयोजकों को मानदेय नहीं दिया गया.

एक करोड़ 60 लाख का था प्रावधान

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साल 2018 के बजट में बोर्ड के ग्राम संयोजकों को देने के लिए एक करेाड़ 60 लाख राशि का आवंटन किया गया था. आरटीआई में कोई जवाब नहीं मिलने के बाद इसकी जानकारी जिला समन्वयकों से ली गयी. कई जिला समन्वयकों ने बताया कि पूर्व सीएस ने जिला और प्रखंड समन्वयकों के साथ बैठक कर ग्राम संयोजकों को प्रति माह एक हजार देने का निर्देष बोर्ड को दिया था. इसके लिए पिछले बजट में राशि भी आवंटित की गयी. लेकिन अब तक इन्हें कोई राशि नहीं मिली.

व्यवहारिक परेशानी को बताया कारण

बोर्ड से जानकारी मांगी गयी थी कि बोर्ड की ओर से कितने ग्राम संयोजकों की नियुक्ति की गयी थी,  उनके मानदेय से संबधित रिपोर्ट उपलब्ध कराएं, ग्राम संयोजकों के मानदेय से संबधित क्या कार्रवाई अब तक विभाग की ओर से की गयी. इसकी जानकारी ली गयी थी. लेकिन बोर्ड से प्राप्त जवाब में कहा गया है कि इन सवालों के जवाब देने में व्यवहारिक परेशानी हो रही है. सही तथ्य उपलब्ध नहीं होने के कारण जवाब देने में परेशानी हो रही है.

बीपीएल परिवारों का सर्वे कराया गया था

पंचायती राज विभाग का कराया गया था काम: इन ग्राम संयोजकों से बोर्ड से संबधित कोई भी कार्य नहीं कराया गया. बल्कि इनसे पंचायती राज विभाग की ओर से गांवों में बीपीएल परिवारों का सर्वे करया गया था. इससे संबधित रिपोर्ट भी बोर्ड के पास उपलब्ध नहीं है.

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