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स्वच्छता को अनुराधा ने बनाया अपना सारथी, गांवों को कर रही स्वच्छ 

2011 से चला रहीं स्वच्छता मुहिम, अब तक 45 गांवों में कर चुकी है काम 

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Chhaya

Ranchi: कहा जाता है इंसान का काम ही उसकी पहचान होती है. काम जितना बेहतर हो, उतनी ही पहचान भी अच्छी बनती है. कुछ इसी तरह ग्रामीणों के बीच अपनी पहचान बना रखी है अनुराधा ने. कांके, बोरिया की रहने वाली अनुराधा प्रसाद को शायद ही कांके प्रखंड स्थित गांव में कोई नहीं जानता हो. इन्होंने ग्रामीणों को तब स्वच्छता के लिए जागरूक करना शुरू किया, जब देश में कोई स्वच्छता अभियान नहीं चल रहा था. 2011 में इन्होंने बोरिया गांव से ही स्वच्छता मुहिम की शुरुआत की.

अकेले गांव में जाकर ग्रामीणों को स्वच्छता के बारे में बताना कोई आसान बात नहीं थी. खुद अनुराधा ने बताया कि जब पहली बार गांव गई तो लगा कि ग्रामीण बात करेंगे या नहीं, उपेक्षाएं भी मिली. लेकिन ग्रामीणों के पीछे लगे रहने से लोग जानने लगे और धीरे-धीरे स्वच्छता के प्रति लोग जागरूक होते गए.

ग्रामीण युवाओं को मुहिम से जोड़ा

अकेले गांवों में काम करते हुए अनुराधा ने महसूस किया कि ये अकेले का काम नहीं. इसके लिए युवाओं की जरूरत होगी. अनुराधा ने बताया कि बोरिया से काम की शुरुआत की गई तो वहीं से युवाओं को अपने साथ जोड़ने लगी. जिसमें महिलाएं भी शामिल थी. धीरे-धीरे काम बढ़ता गया और न सिर्फ कांके के आसपास बल्कि अन्य क्षेत्रों के भी गांवों में भी ये जाने लगी. न सिर्फ लोगों को जागरूक किया. बल्कि झाडू़, फिनाइल, डस्टबीन आदि का भी वितरण खुद से करती हैं.

45 गांवों में कर चुकी हैं काम

अनुराधा ने बताया कि जब इन्होंने काम की शुरुआत की थी, तब इनके पास मानव संसाधनों की कमी थी. समय के साथ लोग जुड़ते गए और तब लगा कि न सिर्फ कांके के आसपास बल्कि अन्य क्षेत्रों के लोगों को भी स्वच्छता के लिए जागरूक करना चाहिए. तब इन्होंने जगन्नाथपुर, हटिया, हिनू, एचईसी, मोरहाबादी के क्षेत्रों में काम शुरु किया. धनबाद और जमशेदपुर के कुछ गांवों में भी इन्होंने काम किया है. अब तक ये 45 गांवों में काम कर चुकी हैं.

पर्यावरण संरक्षण के बिना स्वच्छता संभव नहीं

पर्यावरण संरक्षण के बिना स्वच्छता जागरूकता नहीं हो सकते है. ऐसा मानना है अनुराधा का. इन्होंने बताया कि पर्यावरण संरक्षण जागरूकता के लिए इन्होंने साइकलिंग को प्रोत्साहित करना शुरू किया है. हर रविवार को बच्चों को एकत्रित कर ये साइकलिंग कराती हैं. ताकि पर्यावरण संरक्षण हो. इसके अलावा विभिन्न अवसरों पर ये पौधा वितरण भी करती हैं. जिन्हें ग्रामीण ही उगाते हैं.

ग्रामीणों को होती है आशा 

अनुराधा ने बताया कि कई गांवों में काम करने से जानकारी हुई कि लोगों को सरकारी कर्मचारियों से काफी आशा रहती है. ऐसे में जब कोई सामाजिक कार्यकर्ता उनके पास जाता है तो उन्हें भी वे सरकारी कर्मचारी समझते है. उन्होंने बताया कि कई बार लोग ये कहकर बात नहीं करना चाहते कि हमारे गांव में कोई विकास नहीं हुआ. ऐसे में बहुत समझाने पर लोग तैयार होते हैं.

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