Opinion

अतिदक्षिणपंथी कट्टरवाद यूरोप सहित पूरी दुनिया के लोकतांत्रिक देशों के लिए खतरा

FAISAL ANURAG

अति दक्षिणपंथी ताकतों के वैश्विक उभार के बीच यूरोपीयन यूनियन के चुनाव में एक बार फिर नवनाजी और नवफासी ताकतों के खतरे को लेकर बहस गंभीर होती जा रही है. यूरोप के कई देशों में हाल ही में हुए चुनावों में अतिदक्षिणपंथियों ने जीत कर एक बार फिर 1920 और 1930 के दौर के खतरों को चिंता का विषय बना दिया है. यूरोप में इटली में फासीवद और जर्मनी में नाजीवाद ने न केवल सबसे बडे जनसंहारों का नेतृत्व किया बल्कि दूसरे महायुद्ध की भयावहता को जन्म दिया. पिछले कुछ समय से फिर इन ताकतों ने यूरोपीयन देशों में दस्तक देना शुरू कर दिया है. जर्मनी और ब्रिटेन में दक्षिण पंथी ताकतों ने जिस तरह की संकीर्णता के बीज बोने शुरू किये हैं उसे लेकर बड़े तबके में बेचेनी बढ़ती जा रही है. स्पेन और फ्रांस भी इन खबरों के राजनीतिक महत्व को लेकर अपनी चिंता जता रहा है. बावजूद इसके यूरोपीयन यूनियन के चुनाव जो 23-25 मई को हो रहे हैं उसमें दक्षिधपंथियों की चुनौती बेहद गंभीर है.

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ब्रिटिश लेबर पार्टी के नेता कोरबिन ने इन ताकतों के उभर को ले कर जबरदस्त प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने आर्थिक क्षेत्र में अमीरों को दिये जाने वाले विशेषाधिकार का सवाल उठाते हुए पूरी अर्थ व्यवस्था को अमरीपरस्त बता दिया है. उन्होंने ब्रिटेन के साथ पूरे यूरोप में इस बहस को तेज किया है कि जरूरत इस बात की है कि सरकारी क्षेत्र को एक बार फिर से पुनर्जीवित किया जाये. उन्होंने कहा है कि लंबे समय से समुदायों की उपेक्षा का ही परिणाम है कि कि दक्षिणपंथ का उभार खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है. जर्मी कार्बिन रेलवे के राष्ट्रीयकरण के साथ अर्थ व्यवस्था में समुदायों की भागीदारी और नियंत्रण के भी पैरोकार हैं. उनके नेतृत्व में लेबर पार्टी एक नए दौर की राजनीतिक ताकत बन कर उभर रही है. लेबर पार्टी में कार्बिन को उन ताकतों का भी विरोध का सामना करना पड़ता है जो यथावादी हैं.

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बावजूद इसके केरबिन आम लेबर सदस्यों के बेहद पसंदीदा हैं. माना जा रहा हे कि ब्रिटेन के अगले संसदीय चुनाव में लेबर पार्टी उनके नेतृत्व में टोरी पार्टी से सत्ता छीन सकती है. ब्रिटेन की पूजीवादी ताकतों और अमीरों को खटकने वाले कार्बिन की वही छवि है जो अमरीका के डेमेक्रेट नेता सैंडर्स की है. जो पिछले प्रेसिडेंट चुनाव में हिलेरी किल्ंटन को कड़ी टक्कर दे चुके हैं. अगले अमरीकी चुनावों में अमरीका के युवा डेमोक्रेटों के साथ मेहनतकशों के वे ही पसंदीदा डेमोक्रेट प्रत्याशी के दावेदार है. इन दोनों नेताओं में समानता यह है कि दोनों से दक्षिणपंथी राजनीतिक और आर्थिक ताकतों को खतरा महसूस होता है. इन दोनों का यूरोप और अमेरिका में वैचारिक असर भी है. यही कारण है कि दुनिया भर की दक्षिणपंथी ताकतों और पूंजीपरस्त लॉबी इन्हें खौफ के नजरिए से देखते हैं. हालांकि देानों ही कम्युनिस्ट नहीं हैं. और कम्युनिस्टों को लेकर उन दोनों का ही नजरिया आलोचनातमक ही है. दुनिया की राजनीति को नियंत्रित करेने वाली आर्थिक ताकतों के लिए तो लोकतांत्रिक ताकतें भी अब खतरनाक दिखने लगी हैं. इसके अनेक उदाहरण दुनिया भर में देखे जा सकते हैं. दुनिया भर, जिसमें भारत भी प्रमुख है, में जिस तरह दक्षिणपंथियों का राजनीतिक वर्चस्व बढ़ा है, उसे व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है.

अतिदक्षिणपंथ की राजनीति एक संकीर्ण किस्म के राष्ट्रवाद का मुख्य वाहक है. देशों की बहुलतावादी होती संस्कृति और आबादी के खिलाफ इन ताकतों का नफरत जाहिर है. नाजीवादी एडोल्फ हिटलर ने जिस तरह यहूदियों के खिलाफ घृणा का माहौल बना कर मजदूर उभारों को कुचला था वह सर्वविदित है. उस गैस चैंबर की गंध का अहसास अभी खत्म भी नहीं हुआ है. इस तरह की ताकतें काल्पिक दुश्मन की शिनाख्त करते हुए दुनिया के अनेक देशों की राजनीति में उभर का सत्ता तक चहुच चुकी हैं. इन तमाम ताकतों ने अपने अपने देशों में इमीग्रेशन के काल्पनिक खतरे को ही मुख्य आधार मान कर नफरत की हिंसात्मकता का विस्तार  करना शुरू किया है. हालांकि करोड़ों लोगों की मौत और तबाही के बाद उभरे यूरोप में अब भी इन ताकतों का प्रतिरोध व्यापक हो रहा है. यदि सूत्र में देखा जाये तो अतिदक्षिणपंथ न केवल अपने देशों में काल्पनिक दुश्कमनों के ही खिलाफ है बल्कि वह अमीरों के फायदे के लिए तमाम किस्म के सरकारी बंधनों को खत्म किए जाने का पक्षधर है. यूरोपीयन यूनियन में भी इन ताकतों की मांग कमोबेश यही है. 1917 की सोवियत क्रांति ओर उसके विस्तार से मजदूरों के राज के खिलाफ इटली, स्पेन ओर जर्मनी में जिस तरह की घटनाएं हुई थीं, वे केवल महामंदी की उपज तो थीं ही लेकिन केवल वही उसका कारण नहीं था. वह दौर एक महामंदी का था जो पहले महायुद्ध के बाद उभरकर दुनिया को प्रभावित कर रहा था. लेकिन मजदूरों के अधिकारों को कुचलना भी इन इन दक्षिणपंथियों के मुख्य टास्क का हिस्सा है.

यूरोप के अनेक देशों के नये राजनीतिक रूझानों में कई ऐसी ताकतें भी हैं जो मान रहीं हैं कि 1990 के बाद शुरू की गयी वैश्विक आर्थिक संरचना फेल कर चुकी है. अमेरिका में भी यह धारणा तेजी से फैल रही है. पत्रकार रवीश कुमार से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा कि वह आर्थिक प्रणाली जिसे 1990 में अपनायी गयी थी, 2012 आते-आते फेल कर गयी. भारत को अब इससे आगे ले जाने की जरूरत है. सार्वजनिक क्षेत्र की उपयोगिता पर वे भी चुनाव प्रचार में बोलते रहे. जर्मी कोर्बिन तो लंबे समय से यही बात करते रहे हैं. यूरोपीय यूनियन का चुनाव आर्थिक व्यव्स्था के प्रतिरोध के उस दौर में हो रहा है जब अनेक यूरोपीन राजनीतिक ताकतें मानती हैं कि आर्थिक संरचना के विफल होने का ही कारण है कि अतिदक्षिणपंथ उभार में है. तो क्या यूरोप एक बार फिर दक्षिणपंथी अराजकता और विभिषिका के दौर को स्वीकार कर लेगा, यह आशंका तेजी से उठ रही है. यूरोप और अमेरिका के बाहर कई देशों में दक्षिणपंथी राजनीति ताकतों ने राजनीतिक फतह हासिल कर ली है. जर्मनी और भारत इनमें प्रमुख हैं. इन देशों में जिस तरह क्रोनी पूंजी का वर्चस्व है और खुल कर खेलने की छूट दी गयी है उससे आर्थिक मंदी का साया गहरा होता जा रहा है. अमेरिका में ट्रंप भी लगातार ऐसे काल्पनिक शत्रुओं की तलाश करते हैं. कभी मेक्सिकों, कभी अब्राजन और कभी ईरान के बहाने दक्षिणपंथी उभार को वे हवा देते हैं. भारत में मोदी के नेतृत्व में भी इस तरह का प्रयोग पिछले पांच सालों से हो रहा है. 23 मई को ही पता चलेगा कि वह आगे भी जारी रहेगा या राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव आयेगा.

यूरोपीय यूनियन के चुनाव तय करेंगे कि क्या दुनिया एक नए सभ्यतागत टकराव के मुहाने की ओर है या नहीं. जब हटिंगटन ने क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन की बात की थी, तब से दुनिया में यह साफ हो चुका है कि कट्टरपंथ अपने अपने तरीके से अनेक देशों में सक्रिय है और लोकतंत्र के मूल्यों को निगलने पर उतारू है.

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