Opinion

बेरोजगारी के खिलाफ युवाओं  में नाराजगी

Faisal Anurag

यह स्पष्ट होता जा रहा है कि आनेवाले दिनों में भारतीय राजनीति में रोजगार,स्थानीयता और सांप्रदायिकता के साथ आर्थिक मंदी के गहराते संकट का सवाल अहम होता जा रहा है. रघुराम राजन सहित अनेक अर्थशास्त्रियों ने विश्व की तुलना में भारत की अर्थव्यवस्था में आयी सुस्ती को गंभीरता से विमर्श का हिस्सा बना दिया है. नोटबंदी वह कारक है जिसका असर अब ज्यादा दिख रहा है और मजदूर और किसानों के साथ मध्यवर्ग के जीवन पर पड़ा असर राजनीतिक रूप धारण करने लगा है. पिछले साढ़े चार सालों में भारत में रोजगार की सीमित होती स्थितियों के खिलाफ युवाओं की नाराजगी भी उभरने लगी है. इस नाराजगी में ग्रामीण युवाओं का स्वर ज्यादा तीखा है. हाल ही में हुए तीन राज्यों के चुनाव परिणाम इस तथ्य को रेखांकित कर रहे हैं. शहरी युवाओं में भी विक्षोभ है. सरकारी नौकरियों के साथ निजी संस्थानों में भी रोजगार के हालात गंभीर है और देश के युवाओं में हर साल दो करोड़ युवाओं को रोजगार देने का मसला भारतीय जनता पार्टी के लिए संकट बनता जा रहा है. यह देखा जा रहा है कि तकनीकी क्षेत्र में भी हालात ठीक नहीं हैं. स्वरोजगार का सरकार का नारा बुमरेंग करता प्रतीत हो रहा है. 90 मिनट में कर्ज का सवाल हो या मुद्रा लोन सब अब संदेह के घेरे में हैं. सोशल मीडिया पर इन लोन योजनाओं के खिलाफ बातें की जा रही हैं.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के एक बयान के बाद क्षेत्रीयता के दबाव का पहलू मीडिया में खूब चर्चा में है. भारत के प्रत्येक नागरिक को देश में कहीं भी बसने और रोजगार करने का संवैधानिक हक है. बावजूद इसके देश के अनेक राज्य महसूस कर रहे हैं कि उनके युवाओं को रोजगार वंचना का शिकार होना पड़ रहा है. इस सवाल को समाजशास्त्रीय और आर्थिक विकास के उन हालातों से देखने की संवेदना का विकास जरूरी है, जो आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में असंतुलन के कारण उभरा है. अनेक मध्य जातियों के आरक्षण की मांग भी इसी संदर्भ का हिस्सा है.  2012 में मध्यप्रदेश के ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने निजी क्षेत्रों के रोजगार में 50 प्रतिशत मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने की बात कही थी. कमननाथ ने उसी को अब 70 प्रतिशत करने का प्रपत्र जारी किया है और नए निवेश में इसे अनिवार्य करने की बात कही है. लेकिन उनका बिहार और उत्तप्रदेश और अन्य प्रांतों के युवाओं के रोजगार ले जाने की बात उचित नहीं है और इसकी भर्त्सना  उचित ही है. कमलनाथ को हक है कि अपने राज्य के युवाओं को रोजगार का पूरा अवसर मुहैया करायें, लेकिन अन्य राज्यों का अपमान नहीं करें. इस संदर्भ में गुजरात सरकार और हिमाचल प्रदेश की सरकारों का नजरिया भी भिन्न नहीं है. दोनों ही राज्यों की सरकारें रोजगार में 80 प्रतिशत स्थानीय युवाओं की हिस्सेदारी को अनिवार्य करने की दिशा में कार्य कर रही हैं. हिमाचल में तो इस संदर्भ में प्रपत्र भी जारी हो गया है.

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रोजगार के सवाल पर पहले भी क्षेत्रीय विषवमन हुआ है और हिंदी इलाकों के युवाओं और रोजगार कर रहे लोगों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है. प्रश्न यह है कि इस तरह के हालात आखिर क्यों गहराते जा रहे हैं और भारत के अनेक राज्यों में इस तरह के क्षेत्रीय उभार नजर आने लगे हैं. इसका मूल कारण रोजगार की सीमित होती स्थितीयां हैं और बेरोजगारी का विस्फोट है. स्वरोजगार के हालात भी नोटबंदी के बाद से पहले जैसे नहीं हैं और आर्थिक क्षेत्र की सुस्ती इस तरह के रूझान  को हवा ही देती है. भारत में मध्य जातियों के आरक्षण के सवाल को भी इसी संदर्भ में देखने समझने की जरूरत है. महाराष्ट्र में आंदोलन के बाद वहां की सरकार ने उन्हें आरक्षण देने का आदेश दे दिया है. इससे दलितों और पिछड़े वर्गों में आशंका बढ़ी है कि कहीं उनके हिस्से प्रभावित नहीं हों. गुजरात में पटेलों का आंदोलन भी लगातार परवान पर है और गुजरात के पिछले विधानसभा चुनाव में आरक्षण का सवाल एक सशक्त पहलू बन उभरा था. आंध्रप्रदेश में कप्पू जाति की मांग भी यही है. जाट और गुजर भी लंबे समय से यह मांग कर रहे हैं और कई बार आंदोलन कर चुके हैं.

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1984 के सिख नरसंहार के संदर्भ में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद देश के अन्य सांप्रदायिक दंगों में परोक्ष-प्रत्यक्ष हिस्सेदार राजनीतिज्ञों को सजा दिलाने की मांग भी जोर पकड़ रही है. इसके साथ ही देशभर में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तेज होता जा रहा है.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं)

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