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सड़क हादसे में बेटे को गंवा चुकी अर्पिता बनी समाज सेवा की मिसाल, रोशन किया ममता का जहां

आयुष की आंखों ने ममता की बेनूर दुनिया को किया रोशन

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Dhanbad: कहते है किसी मां के लिए अपने लाल को खोने से बड़ा दुख दूसरा नहीं हो सकता. गोद उजड़ने का दर्द, वहीं मां समझ सकती है, जिसपर ये विपदा आयी हो. लेकिन दुख की इस घड़ी में भी जो दूसरे की मदद को सोचे वो इंसान काबिले तारीफ है. कुछ ऐसी ही शख्सियत है अर्पिता अग्रवाल की. जिन्होंने सड़क हादसे में अपने बेटे आयुष को खो दिया. लेकिन उसके बाद उन्होंने आयुष की आंखें डोनेट करने का फैसला लिया, ताकि किसी की जिंदगी का अंधेरा दूर हो सके.

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ममता से ऊपर समाज सेवा

आयुष अग्रवाल (फाइल फोटो)

दरअसल, 9 अगस्त को अर्पिता अग्रवाल का बेटा आयुष अग्रवाल सड़क हादसे में गंभीर रुप से घायल हो गया था. जिसके बाद उसे पीएमसीएच में भर्ती कराया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. हालांकि, इसे लेकर अस्पताल की लापरवाही की बात भी सामने आयी. लेकिन इस हादसे ने अर्पिता अग्रवाल की खुशियां छीन लीं.

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लेकिन इस दर्दनाक हादसे के बाद धनबाद की जानी-मानी समाज सेवी संस्था ‘उड़ान हौसलों की’ की सक्रिय सदस्य और रक्तदान में तत्पर रहने वाली अर्पिता अग्रवाल ने जो किया, उससे एक क्षण के लिए हर कोई सकते में आ गया. बेटे की आकस्मिक मौत से हिल चुकी अर्पिता अग्रवाल एक फैसले ने हर किसी को हैरत में डाल दिया, और वो फैसला था बेटे के नेत्रदान का. उन्होंने अपने बेटे की नेत्रदान करने की घोषणा कर दी. इसके बाद आयुष के नेत्र को स्टोर करना और जरूरतमंद को सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित करना एक प्रमुख चुनौती थी. जिसके लिए संस्थान ‘उड़ान हौसलों की’ के सदस्य इस कार्य में जुट गए.

साहसिक और सराहनीय कदम

अर्पिता अग्रवाल, आयुष की मां और समाजसेवी

इस संस्था से जुडी शालिनी खन्ना ने बताया कि हमें बेहद गर्व है कि अर्पित अग्रवाल हमारी संस्था ‘उड़ान हौसलों की’ सदस्य हैं. जिस मां का 14 वर्षीय हंसता-खेलता बेटा अचानक सड़क दुर्घटना का शिकार हो जाता है और अपना प्राण गंवा बैठता है और उसी क्षण उसकी अपनी मां अपने बेटे का नेत्रदान करने का फैसला लेती है. यह सचमुच एक रोंगटे खड़े कर देने वाला फैसला है. रोती हुई उस मां की हकीकत के बीच, इस बड़े साहसिक निर्णय वाले उस सपने का स्वागत कर उसे मूर्त रूप देना और उसी के सहारे किसी के जीवन में रोशनी फैलाना बड़ा ही सराहनीय काम है.

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दिव्यांग ममता को मिली रोशनी

अब हम आपको दिव्यांग ममता की कहानी सुनाते हैं. ममता की आंखों में रोशनी नहीं है. कुछ महीने पहले किसी के नेत्रदान की खबर सुनकर नेत्रहीन ममता पीएमसीएच पहुंची. लगभग सप्ताह भर उनका रोज वहां आने-जाने का क्रम चला. अंत में डॉक्टरों ने ममता को यह कहकर मना कर दिया कि कुछ महीने दवाइयों के सेवन के बाद ही आंख के प्रत्यारोपित करने के लिए नस तैयार हो पाएगी. ऐसे में ममता PMCH से बैरंग वापस लौट गई. बीच में भी ममता नेत्रदान की खबर सुन PMCH आयी थी. लेकिन खाली हाथ ही लौटना पड़ा था.

दिव्यांग ममता को मिली रोशनी

इधर अर्पिता अग्रवाल के फैसले के बाद ‘उड़ान हौसलों की’ की टीम ने ममता से संपर्क किया. जिसके बाद बिना समय गवांए पीएमसीएच के डॉक्टरों द्वारा पूरे दिन ममता का विभिन्न तरह का चेकअप किया गया. उसके बाद आयुष की एक आंखों को ममता में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया गया. ममता का ऑपरेशन सफल रहा.

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इस सफलता के बाद अर्पिता के चेहरे पर जो संतुष्टि का भाव था. वह अमूल्य था. वहीं शालिनी खन्ना ने बताया कि आयुष की एक आंख तो ममता को लगा दी गई, जबकि दूसरी आंख को किसी दूसरे जरूरतमंद के लिए रखा गया था. ताकि एक और अंधकारमयी जीवन का रोशनी मिल सके.

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