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औसतन तीन माह में एक एसिड पीड़िता पहुंचती है अस्पताल, पुलिस को जानकारी देने से परिजन करते हैं परहेज

परिजन भी छोड़ देते है पीड़िता का साथ

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CHHAYA

Ranchi: जलन ऐसे हुआ लगा मर ही जाउंगी, गला सूख रहा था, पानी-पानी चिल्ला रही थी, लेकिन घर में सब कह रहे थे चुप हो जाओ. चिल्लाओं मत….. कुछ ऐसा ही होता है जब एसिड अटैक किसी के ऊपर किया जाता है. इससे सिर्फ वहीं समझ सकता है, जिसके साथ घटना हुई हो. अमूमन महिलाओं के साथ एसिड अटैक की घटनाएं अधिक होती हैं. कई शोधों  में यह भी पाया गया है कि कम उम्र की युवतियों के साथ ऐसा अधिक होता है. डॉक्टरों के मुताबिक हर तीन माह में एक एसिड बर्न महिला अस्पताल पहुंचती है. कभी-कभी यह संख्या दो हो जाती है. सही इलाज की कमी और परिजनों के नजरअंदाज करने के कारण पीड़िता को अधिक परेशानी होती है.

राज्य में इलाज की नहीं है उचित व्यवस्था

कई एसिड पीड़ित महिलाओं से बात करने पर पता चला कि राज्य के अधिकांश अस्पतालों में एसिड बर्न के इलाज की उचित व्यवस्था नहीं है. वहीं प्राथमिक उपचार के नाम पर महिलाओं को सिर्फ मरहम-पट्टी किया जाता है. इससे एसिड बर्न पार्ट और भी गल जाता है. राज्य में रिम्स जैसे बड़े अस्पताल में भी एसिड बर्न महिलाओं को सिर्फ पट्टी लगाकर रखा जाता है. पलामू की एसिड पीड़िता 18 वर्षीय रिंकु देवी मई से अगस्त तक रिम्स में भर्ती रहीं. लेकिन उसे इलाज के नाम पर सिर्फ मरहम-पट्टी किया गया, जिससे उसका चेहरा और भी गल गया.

आसानी से मिलता है एसिड

पिछले पंद्रह सालों से एसिड पर बैन लगाने की मांग विभिन्न संस्था और प्रतिष्ठित डॉक्टर कर रहे हैं. लेकिन देश में एसिड पर रोक नहीं लगाया गया है. डॉ अनंत सिन्हा ने जानकारी दी कि राज्य या देश के किसी भी लैब से आसानी से सल्फ्यूरिक एसिड मिल जाता है. उन्होंने बताया कि कई बार एसिड पर रोक लगाने की बात की गयी लेकिन अब तक केंद्रीय स्तर पर कोई निर्णय नहीं लिया गया.

न उचित कानून है और न बोर्ड

सेक्शन 326 ए और 326 बी में ऐसे आरोपियों को सजा देने का प्रावधान है. 326 ए के तहत अपराधी को कम से कम दस साल की कैद का प्रावधान है. समय के अनुसार सजा को उम्र कैद में भी बदला जा सकता है. जुर्माना भी लगाने का भी प्रावधान है. वहीं सेक्शन 326 बी के तहत किसी तरह से एसिड अटैक की कोशिश करने पर कम से कम पांच साल की सजा है. इसे बढ़ा कर सात साल भी किया जा सकता है. लेकिन इन कानूनों में कोई भी ऐसा कानून नहीं है जो वास्तव में इन महिलाओं को राहत देने का कार्य करे. यहां तक की केंद्रीय सरकार ने राज्य सरकार को यह आदेश दे रखा है कि ऐसी पीड़िताओं को राज्य से सहायता राशि दी जायेगी. लेकिन इसके लिए किसी बोर्ड का गठन नहीं किया गया है. और न ही राहत समय पर मिल पाता है. तीन लाख देने का है प्रावधान: सर्वोच्च न्यायालय की ओर से पीड़िता को तीन लाख रुपये देने का आदेश है. लेकिन ज्यादातर पीड़िता को न सही समय पर इलाज के लिए राशि मिलती है और न ही न्याय. जानकारी नहीं होने के कारण भी पीड़िता इसका लाभ नहीं उठा पातीं.

कई तरह के होते है एसिड बर्न

डॉ अनंत सिन्हा ने बताया कि एसिड बर्न कई तरह के होते हैं. जिसमें कई रसायनों का प्रयोग किया जा सकता है. इन रसायनों में सल्फ्यूरिक एसिड, नाइट्रिक एसिड, गैसोलिन, ड्रेन क्लिनर, पैंट थीमर,  अमोनिया, बैटरी एसिड आदि का प्रयोग लोग करते हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे रसायन आसानी से लोगों की पहुंच में है. इन पर रोक लगनी चाहिए. पुलिस शिकायत करने से डरते हैं लोग:  अधिकांश मामलों में देखा जाता है कि परिचित ही महिलाओं पर एसिड अटैक करते हैं. ऐसे में परिजन न थाना में शिकायत करते हैं और न ही पीड़िता को शिकायत करने देते हैं. हरमू निवासी ममता भारती पर पंद्रह साल की उम्र में एसिड अटैक किया गया था. उसने जानकारी दी कि उसके घर वालों ने उसे पुलिस को शिकायत नहीं करने दिया.

परिजन छोड़ देते हैं साथ

अधिकांश एसिड पीड़ित महिलाओं को परिजन अस्पताल में ही छोड़ देते हैं. कई बार प्राथमिक इलाज करा के परिजन उनका साथ छोड़ देते हैं. रिंकू देवी ने बताया कि उन पर एसिड अटैक 28 अप्रैल 2018 को किया गया था. डालटेनगंज सदर अस्पताल के बाद उसे परिजनों ने रिम्स में भर्ती किया. सही इलाज नहीं मिल पाने के कारण महिला को इधर-उधर से जानकारी मिली और वह देवकमल अस्पताल में भर्ती हुई. इलाज में अधिक पैसा खर्च होगा, इस डर से घर वालों ने महिला का साथ छोड़ दिया. अभी भी महिला अस्पताल में ही है.

भारत में लगातार बढ़ रहे हैं बर्न मामले

एसिड सर्ववाइवर्स ट्रस्ट इंटरनेशनल की रिर्पोट के अनुसार पूरे विश्व  में एसिड के मामले आते हैं. लेकिन दक्षिणी एशिया में ऐसे मामले अधिक आते है. पाकिस्तान और भारत में लगातार ऐसे मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है.

क्या करें परिजन

किसी पर भी एसिड अटैक होने पर दस मिनट तक उसके जले भाग को ठंडे पानी से धोयें. प्राथमिक उपचार के लिए सही डॉक्टर का चयन करें. कपड़ा या गहने समेत जिस चीज में भी एसिड गिरा हो उसे दूर हटा लें. मानसिक रूप से साथ दें. दस्ताने का प्रयोग करें. मरहम पट्टी के चक्कर में अधिक समय बर्बाद न करें. पुलिस को शिकायत करें.

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