Opinion

अमित शाह की वर्चुअल रैली : दरअसल ये कोरोना से जंग पर राजनीति की जंग के हावी होने की स्क्रीप्ट है

Faisal Anurag

नीतीश कुमार ही एनडीए के नेता और मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे. एनडीए दो तिहाई सीट जितेगा. लेकिन जिस सभा में इस तरह की घोषणा की गयी है, उसे चुनावी रैली नहीं कहा जा सकता है. भाजपा नेता अमित शाह का तो यही नजरिया है. बकौल अमित शाह जिस रैली में यह बाते की गयीं वह तो कोरोना के खिलाफ जंग है. मार्च के बाद सार्वजनिक हुए अमित शाह की वर्चुअल रैली की घोषाणा को राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए. यह विचार भी उन्हीं के हैं. पटना की सड़कें जदयू के पोस्टरों से पटी हुई हैं.

भाजपा के तमाम नेता अमित शाह की रैली को कोरोना के खिलाफ प्रोत्साहन बता रहे हैं. भारत की राजनीति का यह एक ऐसा दौर है जहां राजनीति केवल विपक्ष करता है. भाजपा तो राजनीति से दूर रहती है. सब को पता है कि कोरोना त्रासदी में बिहार की हालत बेहद खराब है. राहत हो या स्वास्थ्य, सरकार के प्रबंधन को ले कर अकुशलता जाहिर है. वापस लौटे मजदूरों ने तो इसे ले कर अपना रोष भी प्रकट किया है.

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लेकिन अमित शाह का दावा है कि बिहार ने बड़ी कुशलता से प्रबंधन किया है. और 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज का सबसे बड़ा लाभकर्ता होने वाला है. अमित शाह जो 2015 के चुनाव के भी मुख्य नीति निर्माता थे, इस बार फिर सक्रिय हो गए हैं. सोशल मीडिया पर तो यहां तक लिखा गया कि चुनाव आते ही अमित शाह की सक्रियता तेज हो गयी है. पिछले महीनों में बंगाल केंद्रीय टीम भेज कर चर्चा में वे आए थे. बंगाल में भी अगले साल चुनाव होने वाले हैं. और भाजपा वहां सत्ता में आने के लिए लगी हुई है. अमित शाह भी ममता सरकार पर हमला करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते.

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 देश के अनेक राज्यों में कोविड 19 का कहर है. जिस गांधी नगर से अमित शाह लोकसभा में प्रतिनिधि हैं, उससे जुडे अहमदाबाद में ही एक हजार से ज्यादा लोग कोविड 19 के कारण मर गए हैं. गुजरात हाईकोर्ट की एक बेंच ने तो सरकार को आड़े हाथों लेते हुए उसके प्रबंधन की पोल खोली. अनेक मार्मिक कथाएं अहमदाबाद से सामने आ रही हैं.

जहां कोविड 19 की गिरफ्त में आए लोग बेबसी का शिकार हो जान दे रहे हैं. लेकिन इन सवालों पर केंद्र या शाह की किसी सक्रियता की सूचना सार्वजनिक नहीं है. भाजपा ने बिहार के चुनाव की दस्तक के साथ ही सक्रियता दिखा दी है. राजद और वाम दलों ने शाह की रैली का विरोध किया. और सड़कों पर उतरे. लगता है बिहार में कोरोना से जंग पर राजनीतिक जंग हावी हो गयी है. बिहार सरकार ने तो वापस लौटे मजूदरो के लिए बनाए

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गये क्वारेंटाइन सेंटरों को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया है. टेस्ट के मामले में भी बिहार देश में सबसे पीछे के राज्यों में है. 12 करोड की आबादी वाले राज्य में कोरोना टेस्ट को ले कर अनेक सवाल उठाए गए हैं. 12 करोड़  की आबादी में बिहार में केवल 95,473 टेस्ट हुए हैं. जबकि इतनी आबादी वाले महाराष्ट्र ने 5 लाख 38 हजार टेस्ट किये हैं.

बिहार सरकार की घोषणा तो यह भी है कि माइग्रेंट लेबर की थर्मल स्क्रीनिंग या टेस्ट को रोक दिया गया है. हल्के लक्षण वालों की टेस्टिंग तो तो पहले ही केंद्र ने एक तरह से रोक दी है. इन हालातों में जब भारत स्पेन और इटली को पीछे छोड़ छठे स्थान पर पहुंच गया है, हालात की गंभीरता को नजरअंदाज करना खतरनाक है. लेकिन चुनावी दस्तक के साथ ही इस खतरनाक खेल के लक्षण दिखने लगे हैं.

 बावजूद एनडीए ने चुनावी सवाल को प्राथमिकता दी है. अमित शाह की रैली के लिए बड़ी संख्या में एलइडी खरीदे गए हैं. साथ ही इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि रैली के समय बिजली की व्यवस्था सुचारू बनी रहे. अमित शाह ने अपने चुनावी अंदाज में ही बाते की हैं. इसे बिहार चुनाव का आगाज कहा गया है.

सवाल उठता है कि जब देश में तबाही का आलम है और लोगों की क्रयशक्ति कम हुई है. ऐसे समय में इस तरह की रैली से क्या हासिल होगा. पैदल चल कर या परेशानियों के बीच घर पहुंचे मजूदरों और उनके परिजनों को इससे कितनी राहत मिलेगी. अमित शाह तो राहत पैकेज में बिहार को सबसे बड़ा लाभार्थी होने वाला राज्य बता रहे हैं.

लेकिन यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस 1 लाख 25 हजार करोड़ के बिहार राहत पैकेज की घोषणा थी, उसमें कितनी राशि बिहार के लोगों तक पहुंची. नीतीश कुमार तो कभी विशेष राज्य के सवाल को जीवन मरण का सवाल बाताते थे. लेकिन उनकी सरकार ने उस 1 लाख 25 हजार करोड़ को पाने के लिए पिछले सालों में क्या किया. 2015 में नीतीश राजद व कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सत्ता में आए. लेकिन डेढ साल बाद ही वे उसी भाजपा के साथ मिल गए जिसके बारे में वे कहा करते थे कि मिट्टी में मिल जाएंगे लेकिन भाजपा से हाथ नहीं मिलाएंगे. यह संदर्भ आज पूछा जाना जरूरी है. क्योंकि भारतीय लोकतंत्र का जो चेहरा बन रहा है उसे ले कर कई सवाल उठे हैं.

 चुनावें की जीत-हार का अपना मतलब हो सकता है. लेकिन जैसा कि गांधी हो या अंबेडकर, सब का मानना था कि लोकतंत्र अपने लोकतांत्रिक मल्यों के सहारे ही मजबूत हो सकता है. भारत में देखा जा रहा हे कि चुनाव जीतने के लिए तमाम मूल्यों को दरकिनार किया जा रहा हे. चुनी गयी सरकारों से पाला-बदल करा कर और इस्तीफा दिला कर सरकारें गिरा दी जा रही हैं. इस बात की गारंटी नहीं दी जा सकती कि जनता ने जिस गठबंधन को सरकार के लिए लोकप्रिय मत दिया है, वह बना ही रहेगा. और पांच साल तक सरकार रहेगी. बिहार हो या कनार्टक इसके उदाहरण हैं.

राज्यसभा चुनाव आते ही जिस तरह विपक्ष के विधायकों से इस्तीफा दिलाया जा रहा है, वह भी कोरोना त्रासदी के शिकार लोगों का उपाहास ही है. गुजरात में कांग्रेस के आठ विधायकों से इस्तीफा दिलाया गया. कांग्रेस ने अपने शेष बचे 65 विधायकों को राजस्थान में एक रिसोर्ट में भेज दिया है.

इस रिसोर्ट राजनीति की शुरुआत भी भाजपा ने ही की थी. बिहार की रैली को ले कर सोशल मीडिया पर तीखी प्रकिक्रिया हुई है. और अनेक मीम और व्यंग्य पोस्ट किए गए हैं. स्पष्ट है कि कोरोना की त्रासदी को पीछे ले जा कर राजनीति को फिर से आगे लाने की यह कोशिश है.

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