Opinion

झारखंड का विकास नहीं, #NRC के बहाने वोटों के ध्रुवीकरण का संदेश दे गये अमित शाह

Faisal  Anurag

विकास चाहते हैं तो डबल इंजन की सरकार को चुनें. अमित शाह ने धमकी भरे अंदाज में झारखंड की धरती से भी यही कहा. अमित शाह ओर नरेंद्र मोदी बारबार इस चेतावनी को दुहराते रहते हैं. और विकास के लिए राज्यों में अपनी पार्टी का वर्चस्व चाहते हैं. शाह की बात में यह घनित है कि किसी अन्य दल की सरकार बनने की हालत में विकास बाधित होगा. मतलब यह है कि केंद्र की सरकार का सहयोग प्रभावित हो सकता है. देश के जिन राज्यों में गैर-भाजपा सरकारें हैं उनकी शिकायत है कि मोदी सरकार उनकी आर्थिक मदद में कोताही करती है.

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भारत का संविधान संघात्मक ढांचे की बात करता है. इसमें राज्यों की स्वायत्तता के अनेक पहलू उजागर होते हैं. राज्य सरकार चाहे जिस भी पार्टी की हो, केंद्र का दायित्व तय है कि वह राज्यों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करे.

भाजपा सरकार पर आरोप है कि उसने उन राज्य सरकारों के साथ दोस्ताना व्यवहार नहीं किया है जो उसकी पार्टी के नहीं हैं. भाजपा और तेलुगु देशम पार्टी का इस कारण साथ भी टूटा है. और उन राज्य सरकारों को भी परेशानी है जिसमें भाजपा कनिष्ठ सहयोगी है.

इसमें बिहार का नाम भी है. बिहार सरकार को अनेक मामलों में केंद्र का मुखापेक्षी होने का लगातार दबाव झेलना पड़ता है. बिहार के लिए प्रधान मंत्री ने आर्थिक सहयोग का जो वायदा सार्वजनिक तौर पर किया था, उस पर भी अमल नहीं किया गया. हालांकि बिहार सरकार की विकास योजनाओं को भाजपा अपनी ही उपलब्धि बताती रही है.

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कंग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री अक्सर बयान देते हैं कि उनके साथ केंद्र अपेक्षित सहयोग नहीं कर रहा है. जब नीतीश कुमार राजद के साथ सरकार के प्रमुख थे तब उनका भी यही आरोप था. टीमएसी और एडीएमके भी इस तरह की बाते करती रहतीं हैं. एडीएमके को अब पूरी तरह अपने पाले में करने में भाजपा को कामयाबी मिल चुकी है. एएमडीएमके भी अब खुला आरोप नहीं लगा रहा है. नवीन पटनायक की शिकयतें नहीं सुनी गयीं हैं लेकिन ओडिसा के जानकार मानते हैं कि ओडिसा की सरकार पर भी केंद्र का बेजा दबाव बना रहता है.

झारखंड में भाजपा बड़ी जीत के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रही है. भाजपा के विकास को ले कर झारखंड में परस्पर विरोधी दावे किये जाते रहे हैं. जिन योजनाओं की कामयाबी की बात की जाती है, उन्हें ले कर भी राज्य एकमत नहीं है. यही कारण है कि विकास के सवाल को भाजपा अपने अन्य एजेंडे के साथ रखती है. अमित शाह की बातों से साफ है कि वे किसी भी विपक्षी सरकार के खिलाफ वोटरों को अगाह कर रहे हैं.

भाजपा जानती है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव परिणाम झारखंड में एक तरह के ही नहीं होते हैं. 2014 में 12 सीट जीतने के बाद भी विधानसभा सीटों पर मिली बढ़त को नहीं दुहरा सकी और वह बहुमत से दूर रह गयी. 2014 में वोट शेयर बढ़ाने के बाद और 12 सीटों पर जीत हासिल करने के बाद भी भाजपा बहुमत के लिए किसी भी मोर्चे पर कमजोर साबित नहीं होना चाहती है. डबल इंजन सरकार को विकास की अनिवार्यता बताने वाले राज्य सरकार के विज्ञापन कई महीनों से होर्डिंग पर मौजूद हैं.

अमित शाह ने झारखंड के लिए एनआरसी की बात कर वोटरों के ध्रुवीकरण की भी प्रक्रिया को चुनावी अभियान का हिस्सा बना दिया है. दरअसल भाजपा विकास के अपने कार्यो की तुलना में ध्रुवीकरण के मुद्दों को चुनावी जीत का बड़ा कारक मानती है.

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