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हिंदू कोड बिल मामले मतभेद की वजह से अंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से दिया था इस्तीफा

  • दलितों के मसीहा अंबेडकर
  • जयंती पर विशेष

Naveen sharma

Ranchi : अक्टूबर 1948 में डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू कानून को सुव्यवस्थित करने की एक कोशिश में हिन्दू कोड बिल संविधान सभा में प्रस्तुत किया. बिल को लेकर कांग्रेस पार्टी में भी काफी मतभेद थे. बिल पर विचार के लिए इसे सितम्बर 1951 तक स्थगित कर दिया गया. बिल को पास करने के समय इसे छोटा कर दिया गया. अम्बेडकर ने प्रकरण से उदास होकर कानून मंत्री के पद से त्याग पत्र दे दिया.

डॉ. बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर ने हिंदू समाज के सबसे पिछड़े हिस्से को सम्मान और न्याय दिलाने के लिए संघर्ष किया. खासकर उस दौर में जब अनुसूचित जाति के लोगों को अमानवीय व्यवहार झेलना पड़ता था.
वे 1947 में स्वतंत्र भारत के संविधान की रचना के लिए संविधान सभा द्वारा गठित ड्राफ्टिंग समिति के अध्यक्ष थे. उन्होंने संविधान को तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वे भारत के प्रथम कानून मंत्री भी थे. देश के प्रति अतुलनीय सेवाओं के लिए वर्ष 1990 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

प्रारंभिक जीवन

डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को म्हो (वर्तमान मध्य प्रदेश में) में हुआ था। वह रामजी और भीमाबाई सकपाल अम्बेडकर की चौदहवीं संतान थे। अम्बेडकर अछूत महार जाति के थे. उनके पिता और दादा ब्रिटिश सेना में कार्यरत थे. उन दिनों सरकार ने सेना के सारे कर्मचारी और उनके बच्चे शिक्षित किये जाएं और इसके लिए एक विशेष विद्यालय चलाया गया. इसी विद्यालय के कारण भीमराव की अच्छी शिक्षा हुई.

जातिगत भेदभाव का दंश झेला

भीमराव ने बचपन से ही जातिगत भेदभाव का अनुभव किया. पिता सेवानिवृत होने के बाद सतारा महाराष्ट्र में बस गए. भीमराव का स्थानीय विद्यालय में दाखिला हुआ. यहां उन्हें कक्षा के एक कोने में फर्श पर बैठना पड़ता था और अध्यापक उनकी कापियों को नहीं छूते थे. इन कठिनाइयों के बावजूद भीमराव ने पढ़ाई जारी रखी. 1908 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की. उच्च शिक्षा के लिए एल्फिंस्टोन कॉलेज में दाखिला लिया. वर्ष 1912 में उन्होंने बंबई विवि से राजनीति विज्ञान और अर्थशास्त्र में स्नातक की उपाधि प्राप्त की. उन्हें बड़ौदा में नौकरी मिल गई.

अमेरिका में ली उच्च शिक्षा

वर्ष 1913 में अम्बेडकर के पिता का निधन हो गया. उसी साल बड़ौदा के महाराजा ने उन्हें छात्रवत्ति से सम्मानित किया और आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका भेजा. जुलाई 1913 में भीमराव न्यूयॉर्क पहुंचे. वहां से मास्टर ऑफ़ आर्ट्स की डिग्री और 1916 में कोलंबिया विवि से अपने शोध ” नेशनल डिविडेंड फॉर इंडिया: अ हिस्टोरिकल एंड एनालिटिकल स्टडी” के लिए दर्शनशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की. डॉ. अम्बेडकर अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढाई के लिए अमेरिका से लंदन गए पर बड़ौदा सरकार ने उनकी छात्रवत्ति समाप्त कर दी और उन्हें वापस बुला लिया.

कैरियर

बड़ौदा के महाराज ने डॉ. अम्बेडकर को राजनीतिक सचिव के रूप में नियुक्त किया. पर कोई भी उनके आदेशों को नहीं मानता था क्योंकि वो महार थे. भीमराव नवंबर 1924 को बम्बई लौट आये. कोल्हापुर के शाहू महाराज की सहायता से उन्होंने 31 जनवरी 1920 को एक साप्ताहिक अख़बार “मूकनायक” प्रारम्भ किया. । सितम्बर 1920 में अम्बेडकर अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए लंदन गए. वहां जाकर वकालत की पढ़ाई की. पढ़ाई खत्म करने के बाद भारत लौट आये

बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना

जुलाई 1924 में उन्होंने बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की. इस सभा का उद्देश्य सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर दलितों का उत्थान कर भारतीय समाज में दूसरे वर्गों के समकक्ष लाना था. उन्होंने अछूतों को सार्वजनिक टंकी से पानी निकालने का अधिकार देने के लिए बम्बई के पास कोलाबा में चौदर टैंक पर महद मार्च का नेतृत्व किया और सार्वजनिक रूप से ‘मनुस्मृति’ की प्रतियां जलाईं.

साइमन कमिशन का समर्थन

1929 में अम्बेडकर ने भारत में एक जिम्मेदार भारत सरकार की स्थापना पर विचार करने के लिए ब्रिटिश साइमन कमीशन के साथ सहयोग का विवादास्पद निर्णय लिया. कांग्रेस ने आयोग का बहिष्कार करने का फैसला किया और आज़ाद भारत के एक संविधान के संस्करण की रूप रेखा तैयार की. कांग्रेस के संस्करण में दलित वर्गों के लिए कोई प्रावधान नहीं था. अम्बेडकर दलित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के कारण कांग्रेस के लिए उलझन बन गए.

गांधी अंबेडकर का पुणा पैक्ट

जब रामसे मैकडोनाल्ड ‘सांप्रदायिक अवार्ड’ के तहत दलित वर्गों के लिए एक अलग निर्वाचिका की घोषणा की गई तब गांधीजी इस फैसले के खिलाफ आमरण भूख हड़ताल पर बैठ गए. नेताओं ने डॉ. अम्बेडकर को अपनी मांग को छोड़ने के लिए कहा. 24 सितम्बर 1932 को डॉ. अम्बेडकर और गांधीजी के बीच समझौता हुआ जो प्रशिद्ध ‘पूना संधि’ के नाम से जाना जाता है. इस संधि के अनुसार अलग निर्वाचिका की मांग को क्षेत्रीय विधान सभाओं और राज्यों की केंद्रीय परिषद में आरक्षित सीटों जैसी विशेष रियायतों के साथ बदल दिया गया.

तीनों राउंड टेबल कांफ्रेंस में शामिल हुए

डॉ. अम्बेडकर ने लंदन में तीनों राउंड टेबल कांफ्रेंस में भाग लिया और अछूतों के कल्याण के लिए जोरदार तरीके से अपनी बात रखी. इस बीच, ब्रिटिश सरकार ने 1937 में प्रांतीय चुनाव कराने का फैसला किया. डॉ बीआर अम्बेडकर ने बंबई प्रांत में चुनाव लड़ने के लिए अगस्त 1936 में “स्वतंत्र लेबर पार्टी ‘की स्थापना की. वह और उनकी पार्टी के कई उम्मीदवार बंबई विधान सभा के लिए चुने गए.

हरिजन शब्द के प्रयोग का विरोध किया

1937 में डॉ. अम्बेडकर ने कोंकण क्षेत्र में पट्टेदारी की “खोटी” प्रणाली को समाप्त करने के लिए एक विधेयक पास करवाया. इस के द्वारा भूपतियों की दासता और सरकार के गुलाम बनकर काम करने वाले महार की “वतन” प्रणाली को समाप्त किया गया. कृषि प्रधान बिल के एक खंड में दलित वर्गों को “हरिजन” के नाम से उल्लेखित किया गया. भीमराव ने अछूतों के लिए इस शीर्षक का जोरदार विरोध किया. उन्होंने कहा की यदि “अछूत” भगवान के लोग थे तो सभी दूसरे राक्षसों के लोग रहे होंगे. वह ऐसे किसी भी सन्दर्भ के खिलाफ थे. पर इंडियन राष्ट्रीय कांग्रेस हरिजन नाम रखने में सफल रही.

संविधान निर्माण की ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष बने

1947 में जब भारत आजाद हुआ तब प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने डॉ. भीमराव अंबेडकर को कानून मंत्री के रूप में संसद से जुड़ने के लिए आमंत्रित किया डॉ. अम्बेडकर को ड्राफ्टिंग समिति का अध्यक्ष चुना गया. फरवरी 1948 को डॉ. अम्बेडकर ने भारत के लोगों के समक्ष संविधान का प्रारूप प्रस्तुत किया जिसे 26 जनवरी 1949 को लागू किया गया.

लाखों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया

24 मई 1956 को बम्बई में बुद्ध जयंती के अवसर पर उन्होंने यह घोषणा की कि वह अक्टूबर में बौद्ध धर्म अपना लेंगे. 14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने अपने साढ़े तीन लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म को गले लगा लिया. 6 दिसंबर 1956 को बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर परलोक सिधार गए.

 

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