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झारखंड में उपचुनावों का अजब-गजब इतिहास, दो से रिटेन हुए मुख्यमंत्री, तो एक ने सीएम को अपदस्थ भी कराया

  • Shyam Kishore Chowbe

Ranchi : झारखंड अपने आप में जिस प्रकार विविधता से भरा है, वैसे ही इसके चुनाव भी विविधता का अहसास कराते रहे हैं. सामान्यतः उपचुनावों को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता लेकिन जिस सूरत में मांडर विधानसभा क्षेत्र में हुए हालिया उपचुनाव ने राजनीतिक तौर पर एकदम नयी-नवेली शिल्पी नेहा तिर्की को साढ़े तेईस हजार वोटों के बड़े मार्जिन से 26 जून को जीत दिलायी, उससे उपचुनावों का इतिहास नजरों के सामने तारी हो जाता है. हालांकि शिल्पी अपने पिता बंधु तिर्की की सदन से सदस्यता समाप्त कर दी जाने और चुनाव लड़ने से उनको अयोग्य करार दिये जाने के कारण मैदान में उतरीं थीं, लेकिन इस बीच हुई दो-तीन घटनाओं से ऐसा समझा जाता था कि चुनावी गणित बदल जायेगा. ऐसा हुआ नहीं. एक तो बंधु अदालत से सजायाफ्ता घोषित किये गये थे, लेकिन मतदाताओं पर इसका कोई असर न पड़ा. दूसरी बात यह थी कि चुनाव क्षेत्र से सटी राजधानी रांची में उपद्रव हुआ, मुस्लिम-बनाम पुलिस जबर्दस्त संघर्ष हुआ और भाजपा से टिकट न मिलने के कारण निर्दलीय मैदान में उतरे देव कुमार धान के लिए दो दिन असदुद्दीन ओवैसी ने कैंपेन किया. इससे उम्मीद की जाने लगी कि मुस्लिम मतों का धान महोदय के पक्ष में ध्रुवीकरण हो जायेगी, लेकिन यह भी न हो सका. तीसरी बात यह कि इसी चुनावी समर के बीच भाजपा ने रांची में आदिवासी सम्मेलन कराया, लेकिन आदिवासी-मुस्लिम बहुल मांडर क्षेत्र पर इसका भी बहुत प्रभाव नहीं पड़ सका. बंधु खुद ही ढाई साल पहले कांग्रेसी बने थे और उनकी बेटी कांग्रेस के  टिकट पर उपचुनाव लड़ रही थी, जो विजयी हुई. इतना ही नहीं, झारखंड गठन के बाद विधानसभा के हुए चार चुनावों में उसने मांडर सीट पहली बार कांग्रेस की झोली में डालने का इतिहास कायम किया. झारखंड राज्य बनने के पहले सन 2000 में एकीकृत बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में उन्हीं देव कुमार धान ने मांडर सीट पर बतौर कांग्रेस प्रत्याशी जीत दर्ज की थी, जो बाद में भाजपा में शामिल होने के पश्चात 2014 के विधानसभा चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे थे और इस बार के उपचुनाव में निर्दलीय किस्मत आजमाते हुए भी तीसरी पायदान पर ही स्थान बना सके.

राज्य गठन के बाद 2001 में हुआ पहला उपचुनाव

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झारखंड में उपचुनावों का इतिहास खंगालें, तो राज्य गठन के बाद 2001 में पहला उपचुनाव हुआ था. राज्य बनने से ठीक पहले रामगढ़ सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे सीपीआई विधायक सबीर अहमद कुरैशी उर्फ भेड़ा सिंह का बेवक्त इंतकाल हो गया था. भाजपा के बाबूलाल मरांडी को केंद्र का मंत्री पद छुड़वाकर 14-15 नवंबर 2000 की मध्य रात के बाद झारखंड का पहला मुख्यमंत्री बनाया गया था. इसलिए अगले छह महीने के अंदर उनको सदन की सदस्यता ग्रहण करने की बाध्यता थी. चुनाव आयोग ने रिक्त रामगढ़ सीट पर उपचुनाव की घोषणा की तो बाबूलाल ने वहीं से अपनी किस्मत आजमाने की ठानी. वे यह उपचुनाव सबीर अहमद की बेवा नादिरा बेगम को शिकस्त देकर जीत गये और इस प्रकार मुख्यमंत्री की उनकी कुर्सी बरकरार रह गयी, यह अलग बात है कि कुछ तो भाजपा और कुछ सत्ताधारी एनडीए में आपसी रार के कारण उनको दो वर्ष बाद ही  मार्च 2003 में मुख्यमंत्री पद त्याग देना पड़ा. झारखंड विधानसभा के इस पहले ही कार्यकाल में एक अन्य उपचुनाव भी हुआ, जब पोड़ैयाहाट से भाजपा विधायक प्रदीप यादव एक अन्य उपचुनाव में गोड्डा संसदीय क्षेत्र से जीत दर्ज कर दिल्ली चले गये. इस कारण पोड़ैयाहाट विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव की नौबत आ गयी, जिसमें यह सीट भाजपा के हाथों से फिसलकर झामुमो के प्रशांत कुमार मंडल के हवाले हो गयी.

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दूसरी विधानसभा के कार्यकाल में चार बार हुए उपचुनाव

2005 में चुनाव के बाद जब राज्य में दूसरी विधानसभा का गठन हुआ तो इस कार्यकाल में चार उपचुनावों की नौबत आ गयी. विधानसभाध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी ने अपने दल जदयू की आंतरिक तनातनी के कारण विधायकी से ही इस्तीफा कर दिया. फिर अपनी परंपरागत सीट डालटनगंज से वे उपचुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर खड़े हुए और जीत भी गये. इसी दौर में सिमरिया से भाजपा के तत्कालीन विधायक उपेंद्र नाथ दास की असामयिक मौत के बाद उपचुनाव हुआ तो उनके पुत्र उज्ज्वल दास को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया. संवैधानिक बाध्यताओं के कारण वे विधानसभा की नौकरी त्याग कर उपचुनाव में उतरे. जाहिर है कि विधानसभा के कर्मचारी और विधायक में विधायक का ही पलड़ा भारी माना जाएगा, लेकिन उज्ज्वल का रिस्क कारगर न हो सका. जीत सीपीआई के रामचंद्र राम के हाथ लगी. यह अलग बात है कि वे अल्पायु साबित हुए. उनके देहांत के बाद 2009 के आरंभिक दिनों में राष्ट्रपति शासन लग गया और वर्षांत में अगली विधानसभा के गठन के लिए फुलकोर्स चुनाव हुआ. झारखंड विधानसभा के इस दूसरे कार्यकाल में ही हुआ तीसरा उपचुनाव काफी सनसनीखेज और चर्चित रहा. तमाड़ सीट से जदयू के तत्कालीन विधायक रमेश सिंह मुंडा की हत्या कर दी गयी थी. इस कारण उपचुनाव की नौबत आयी. 2008 के उन अंतिम दिनों में झामुमो के स्टालवार्ट नेता शिबू सोरेन मुख्यमंत्री थे लेकिन वे लोकसभा के सदस्य थे. इसलिए उनके सामने विधानसभा का सदस्य चुने जाने की संवैधानिक बाध्यता थी. वे तमाड़ सीट पर हुए उपचुनाव में प्रत्याशी बन गये. खूब धूम-धड़ाका हुआ लेकिन शिबू हार गये. जीत राजनीतिक क्षेत्र में अपरिचित से नाम आजसू के गोपाल कृष्ण पातर उर्फ राजा पीटर की हुई. शिबू को सदन की सदस्यता हासिल न हो सकी तो उन्हें जनवरी 2009 में इस्तीफा करना पड़ा. राज्य राष्ट्रपति शासन के हवाले हो गया, जो लंबा खिंचा. इस प्रकार वर्षांत में चुनाव हुआ. बेचारे गोपाल कृष्ण पातर उपचुनाव जीत कर भी केवल सदन की सदस्यता ही ग्रहण कर सके, कुछ विशेष करने का मौका न मिल सका. वे हालांकि फुलकोर्स चुनाव में उसी जदयू का प्रत्याशी बने, जिसके विधायक रमेश सिंह मुंडा की हत्या कर दी गई थी. पातर की किस्मत यह कि रमेश सिंह मुंडा की हत्या के मामले की तफ्तीश में उनका भी नाम आ गया और बहुत बाद में सजा भी हो गई. दिलचस्प बात यह कि तृतीय विधानसभा के लिए हुए चुनाव के बाद जब तीसरी मर्तबा शिबू को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला, तो उनकी कैबिनेट में राजा पीटर को भी स्थान मिला था. सच ही कहा जाता है, राजनीति में कोई किसी का स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता. मजे की बात यह भी कि शिबू के उपचुनाव हारने और इस्तीफे के बाद जब विधानसभा निलंबित कर दी गई थी, तब जामताड़ा से भाजपा विधायक विष्णु प्रसाद भैया ने शिबू के समर्थन में पदत्याग कर दिया था. इस सीट पर हुए उपचुनाव में शिबू प्रत्याशी बने थे और जीत भी गए थे लेकिन विधानसभा निलंबित थी और लगे हाथ लोकसभा का चुनाव भी सामने आ गया. शिबू ने लोकसभा चुनाव में दुमका सीट से किस्मत आजमायी तो विजयी रहे. इस कारण उन्होंने जामताड़ा उपचुनाव में विजयी रहने के बावजूद यह सीट रिक्त कर दी. संभवतः इसी कारण यह उपचुनाव अचर्चित रह गया.

अर्जुन मुंडा के लिए मंगल सिंह सोय ने इस्तीफा दिया

पहली और दूसरी विधानसभा की नाईं तीसरी विधानसभा में भी मुख्यमंत्री पद कायम रखने के लिए उपचुनाव जीतने की बाध्यता सामने आई. दरअसल, यह झारखंड की राजनीति में आये दिन होते रहे उलटफेर का दौर था. तीसरी विधानसभा के गठन के बाद हालांकि राज्य में भाजपा के सक्रिय सहयोग-समर्थन से झामुमो ने सरकार बनायी, जिसके मुख्यमंत्री शिबू सोरेन चुने गए लेकिन यह दोस्ती बेहद अल्पकालिक साबित हुई. मई 2010 के अंत में शिबू को इस्तीफा करना पड़ा. विधानसभा निलंबित कर राष्ट्रपति शासन लगाया गया. उसी दौर में एक बार फिर सरकार का गठन हुआ। इस बार भाजपा के नेतृत्व में झामुमो के सहयोग से सरकार बनायी गयी. इसके मुख्यमंत्री बनाये गये अर्जुन मुंडा, जो उन दिनों लोकसभा सदस्य थे, तो अर्जुन मुंडा के लिए विधानसभा की सदस्यता सुनिश्चित कराने हेतु खरसावां के भाजपा विधायक मंगल सिंह सोय ने इस्तीफा कर दिया. 2011 के मार्च में उपचुनाव हुआ तो अर्जुन मुंडा विजयी रहे. विधानसभा के इसी कार्यकाल में दो विधायकों का असामयिक निधन होने के कारण दो अन्य उपचुनाव भी हुए. हटिया विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित कांग्रेस के गोपाल शरण नाथ शाहदेव के निधन के बाद हुए उपचुनाव में आजसू के नवीन कुमार जायसवाल विजयी रहे. इसके उलट मांडू से झामुमो विधायक टेकलाल महतो के निधन के बाद उपचुनाव में उनके पुत्र झामुमो प्रत्याशी जयप्रकाश भाई पटेल को जीत मिली. आज की तारीख में नवीन और जयप्रकाश भाजपा के पाले में हैं. इसी कार्यकाल में विधानसभा में मनोनीत सदस्य जोसेफ पंचेली गाॅलस्टीन का देहांत होने पर उनके पुत्र ग्लेन जोसेफ गाॅलस्टेन का मनोनयन किया गया. वे 2014 और 2019 में भी गठित विधानसभा में मनोनीत किए जाते रहे. गोया, आज भी वे मनोनीत विधायक हैं, हालांकि अगली बार से उनको यह मौका हासिल न हो सकेगा क्योंकि विधानमंडलों में एंग्लो इंडियन समुदाय से एक सदस्य के मनोनयन की परिपाटी अब समाप्त की जा चुकी है.

चतुर्थ विधानसभा के कार्यकाल में सात उपचुनाव हुए

2014 के अंतिम दिनों में हुए चुनाव के बाद गठित चतुर्थ विधानसभा का कार्यकाल इस मायने में चर्चित रहा कि इस दौरान सात उपचुनाव हुए. गोड्डा सीट से निर्वाचित भाजपा विधायक रघुनंदन मंडल का निधन होने के बाद उपचुनाव में उनके पुत्र अमित मंडल ने भाजपा के ही टिकट पर विजय हासिल की तो पांकी क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक विदेश सिंह के देहांत के बाद हुए उपचुनाव में उनके पुत्र देवेंद्र कुमार सिंह  कांग्रेस के टिकट पर विजयी रहे थे. उधर लिट्टीपाड़ा से झामुमो विधायक डाॅ अनिल मुर्मू की मृत्यु के बाद हुए उपचुनाव में झामुमो के ही साईमन मरांडी ने जीत दर्ज की. ये वही साईमन थे, जो 2014 के चुनाव के समय बिदक कर भाजपा में चले गए थे और इसी सीट पर अनिल मुर्मू से हार गए थे. उपचुनाव की नौबत आने पर उन्होंने झामुमो में वापसी कर ली और सदन की सदस्यता ग्रहण की. इसी दौर में लोहरदगा सीट का मामला कुछ अलग रहा. इस सीट से बतौर आजसू सदस्य कमल किशोर भगत एक आपराधिक मामले में कोर्ट से सजायाफ्ता घोषित किए गए तो उपचुनाव में उनकी सद्यब्याहता पत्नी यह सीट बचा न सकीं. जीत कांग्रेस के सुखदेव भगत के पाले में गयी. ऐसे ही कोलेबिरा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे झारखंड पार्टी के एनोस एक्का एक आपराधिक मामले में कोर्ट से सजायाफ्ता करार दिये गये तो उपचुनाव में उनकी भी सीट कांग्रेस के नए-नवेले प्रत्याशी नमन विक्सल कोनगाड़ी के हाथ जा लगी. इसके उलट गोमिया से झामुमो विधायक योगेंद्र प्रसाद और सिल्ली से झामुमो विधायक अमित कुमार आपराधिक मामलों में क्रमशः रामगढ़ और रांची कोर्ट से सजायाफ्ता हुए तो उपचुनाव में उनकी पत्नी क्रमशः बबिता देवी और सीमा देवी ने अपने-अपने पति की सीट कायम रखी. दल वही रहा झामुमो.

पांचवीं विधानसभा में अब तक चार बार हो चुके उपचुनाव

अब, जबकि पांचवीं विधानसभा का गठन हुए ढाई वर्ष बीत चुके हैं, राज्य को चार उपचुनावों के दौर से गुजरना पड़ा है. वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 2019 के चुनाव में दुमका और बरहेट दो विधानसभा क्षेत्रों में जीत हासिल की थी. पांचवीं विधानसभा के गठन के बाद उन्होंने दुमका सीट खाली कर दी थी. उस पर हुए उपचुनाव में उनके छोटे भाई बसंत सोरेन ने, जाहिर है कि झामुमो के ही टिकट पर जीत दर्ज करायी. बेरमो सीट पर कांग्रेस विधायक राजेंद्र प्रसाद सिंह के असामयिक निधन के कारण हुए उपचुनाव में कांग्रेस के ही टिकट पर उनके पुत्र कुमार जयमंगल सिंह ने विजय पाई. इसी प्रकार मधुपुर सीट से विजयी झामुमो के हाजी हुसैन अंसारी के इंतकाल के बाद उपचुनाव में उनके बेटे हफीजुल हसन ने बतौर झामुमो प्रत्याशी जीत अपने नाम की. हाजी हुसैन भी वर्तमान कैबिनेट में मंत्री थे, उनके पुत्र हफीजुल भी अभी मंत्री हैं. चौथा उपचुनाव हाल ही मांडर क्षेत्र में हुआ, जिसमें वोटरों ने पिता की सीट पुत्री के नाम कर दी लेकिन पिता बंधु तिर्की जेवीएम, जो अब भाजपा में मर्ज हो गया है, के प्रत्याशी थे, जबकि पुत्री शिल्पी  नेहा तिर्की कांग्रेस की प्रत्याशी थी. 22 वर्षों के झारखंड में विधानसभा के कुल जमा 20 उपचुनावों के परिणामों पर गौर करें तो नौ मर्तबा सिटिंग पार्टियां गच्चा खा गयीं.

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