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बोकारो अस्पताल के डॉक्टर्स का कमाल : नसबंदी के 10 साल बाद भी दंपत्ति को दिला दी संतान

- बोकारो जनरल अस्पताल के विख्यात रिकंस्ट्रक्टिव सर्जन अनिंदो मंडल की टीम ने 3:30 घंटे माइक्रोस्कोपिक सर्जरी कर बाल जैसी पतली नसों को जोड़ वापस वीर्य क्षमता प्रदान की.

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DK
Bokaro: 10 साल पहले नॉन-स्केलपेल वेसेक्टॉमी (NSV) यानी नसबंदी करवा चुके 40 वर्षीय बबलू शर्मा के घर में फिर से बच्चे की किलकारी गूंजी है. बबलू शर्मा और उनकी पत्नी के लिये एक अनमोल सपने के पूरे होने जैसा है.

क्योंकि दो साल पहले इनके 8 वर्षीय बेटे के मौत हो गयी थी. उसके बाद से ही इस दंपत्ति को बच्चे का चाहत थी. लेकिन बबलू शर्मा 10 साल पहले ही नसबंदी करवा चुके थे, तो इससे दंपत्ति में मायूसी थी. लेकिन साइंस के चमत्कार से उन्हें फिर से संतान हुयी है.

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‘वासो वासोस्तोमी’ से मिला संतान सुख

बोकारो के इस दंपत्ति की मायूसी को बोकारो जनरल अस्पताल (बीजीएच) के डॉक्टरों ने दूर किया है और उनकी जिंदगी में एक बार फिर से संतान सुख दिया है. बीजीएच की एक टीम द्वारा ‘वासो वासोस्तोमी’ कर शर्मा की नस को फिर से जोड़ा गया.

जिससे उनकी वीर्य क्षमता वापस सामान्य हो गयी है. इस सर्जरी को दुर्लभ माना जाता है, क्योंकि डॉक्टर्स उस अती सूक्ष्म ट्यूब (वास डेफेरेंस) जो वृषण में स्खलन के लिए शुक्राणु को ले जाने का कार्य करता है. उसे वापस फिर से जोड़ देते हैं.

बबलू शर्मा की नसबंदी सुधारने वाली माइक्रो सर्जरी एक साल पहले बोकारो जनरल अस्पताल के जाने-माने रिकंस्ट्रक्टिव सर्जन डॉक्टर आनंद मंडल और उनकी टीम ने साढ़े तीन घंटे की मशक्कत के बाद सफलता हासिल की थी. बबलू शर्मा की पत्नी वीणा शर्मा ने कुछ हफ़्ते पहले ही एक बच्ची को जन्म दिया है. बच्ची के आने से दंपत्ति के उदास जीवन में फिर से खुशियां भर गयी हैं.
शर्मा और उनकी पत्नी 2017 में अपने आठ वर्षीय बेटे की ब्लड कैंसर से मौत हो गयी थी. उसके बाद से दंपत्ति बहुत दुख में जी रहे थे. शर्मा ने 2010 में अपने बेटे के जन्म के एक साल बाद ही बीजीएच में नसबंदी करा लिया था. वह एक मेडिकल शॉप में काम करते हैं जोशी कॉलोनी में रहते हैं.

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शर्मा ने जाहिर की खुशी

बबलू शर्मा ने बताया कि, मेरी शादी 2005 में हुई थी और मुझे पहली लड़की 2006 में हुई थी. फिर से हमें 2008 में एक बेटा हुआ, बाद में मैंने नसबंदी करा लिया. 2015 तक सब ठीक चल रहा था, उसी समय मेरे बेटे को बल्ड कैंसर होने का पता चला.

हमने उसे हर अच्छे अस्पताल में ले जाने और बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन 2017 में उसकी मौत हो गयी. बच्चे को खोने का दर्द असहनीय था. जिससे मेरी पत्नी और मैं कई दिनों तक सदमे में रहे.

शर्मा ने कहा, कि एक दिन उनके एक दोस्त ने उन्हें एक और बच्चा पैदा करने की राय दी. हालांकि उसके यह शब्द काफी राहत देने वाले थे. लेकिन दूसरी तरफ मुझे यह एहसास था कि एक और बच्चे के लिए उम्मीद करना बेकार है, क्योंकि मैंने अपने बेटे के जन्म के एक साल बाद ही NSV करवा लिया था.

लेकिन मेरे वह दोस्त की बातें मानो मेरे दिमाग में घर सा कर गयी. वापस अपनी छमता पाने के लिए मैं कई डॉक्टरों से मिला और कई अस्पतालों में भी गया.

इससे आगे शर्मा ने बताया कि ऐसे कुछ मामले मुझे पता चले, जिनमें लोगों ने वासो वासोस्तोमी सर्जरी करायी, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. इसी उधेड़बुन में मैं बोकारो जनरल अस्पताल के कॉस्मेटिक और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जन आनंदो मंडल से मिला.

ये मेरे लिए चमत्कार से कम नहीं है – शर्मा

उन्होंने मुझे माइक्रोस्कोपिक सर्जरी के बारे में बताया और कहा कि इसे कराकर आप वापस अपनी क्षमता पा सकते हैं. उनकी बातों में मुझे आशा की एक नई किरण दिखी. यूं कहें कि मेरा आत्मविश्वास वापस आ गया. शर्मा ने कहा कि मेरी सर्जरी 3.50 घंटे से अधिक समय तक चली और मुझे दो दिन बाद डिस्चार्ज किया गया.

शर्मा ने कहा कि, सर्जरी के तीन महीने बाद जब मेरी पत्नी गर्भवती हुई तो मुझे लगा की मेरे जीवन की सारी खोई हुई खुशियाँ वापस लौट आयी हैं. मैं बहुत खुशकिस्मत हूं कि मुझे अपना दूसरा बच्चा वापस मिल गया.

यह कोई चमत्कार से कम नहीं है. बच्चा स्वस्थ और ठीक है. बच्चे की किलकारियों ने हमारा सारा दर्द भुला दिया.
बीजीएच के संयुक्त निदेशक ने कहा कि मरीज की माइक्रोसर्जरी बर्न यूनिट के हेड ऑफ डिपार्टमेंट डॉ मंडल, डॉ सुजीत परीरा और उनकी टीम ने किया.

डॉक्टर मंडल के अनुसार

NSV में स्थायी गर्भनिरोधक उपाय के रूप में टयूब काटा गया था, जिसे उन्होंने वापस माइक्रो सर्जरी कर जोड़ दिया. ट्यूब की चौराई लगभग एक मोटे बालों जैसी होती है, जो काफी सूक्ष्म है. इस सर्जरी में बहुत सारी तकनीकी और शारीरिक चुनौतियां हैं. इसे बहुत सावधानी से करना पड़ता है. सर्जरी काफी सफल रही. शर्मा को सर्जरी के एक साल के भीतर ही बच्चा भी हो गया.

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