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कमाल है, कमाल ऐसे चले गए कि यकीन नहीं होता

-सुशील बहुगुणा

जिसे कभी जल्दबाज़ी करते नहीं देखा
वो जल्दबाज़ी में हाथ छुड़ाकर चला गया.
कमाल है, कमाल ऐसे चले जाएंगे कौन सोच सकता था. कल ही रात तो प्राइम टाइम में उत्तरप्रदेश की राजनीति पर बात कर रहे थे. यही नहीं न्यूज़ रूम में ये चर्चा चल रही थी कि कमाल ने कैसे उम्र को बांधा हुआ है और सभी को उनसे ये भी सीखना चाहिए. देख कर लगता ही नहीं था कि वो साठ के हो चुके हैं. २० साल से तो मैं देख रहा हूं. कभी उनका वज़न बढ़ा नहीं देखा. लगता था जैसे पहले दिन देखा वैसे ही वो आज हैं. तो फिर कैसे उन्हें हार्ट अटैक हो गया. समझ नहीं आ रहा. उनके साथ लंबी बातचीत की कई यादें हैं जो एक-एक कर मन में आ जा रही हैं.

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बीते तीन-चार दशक में उत्तरप्रदेश ने क्या नहीं देखा, हर ख़बर की नब्ज़ पर कमाल का हाथ रहा. बुरी से बुरी ख़बर बताते वक़्त भी उनका संयम, उनकी भाषा और उनके चेहरे के भाव जैसे दर्शकों को आश्वासन देते लगते थे. जो ख़बर टीवी के रास्ते और भी भयानक होकर दर्शकों के बीच परोस दी जाती है वो कमाल से होकर गुज़रती थी तो ज़रा थम जाती थी, उसका आवेश कम हो जाता था, समझदारी के रोशनदान से गुज़रते हुए जब वो कान तक आती थी तो पूरे तथ्यों और उनके सटीक विश्लेषण के साथ दर्शकों के मन में उतरती थी. लखनऊ से वैसी समझदारी भरी बातें अब कौन करेगा. उत्तरप्रदेश की ख़बरों को संभालना आसान नहीं और कितनी आसानी के साथ उन्होंने ख़बरों का वो संसार संभाला हुआ था. लगता है जैसे लखनऊ के बीच से लखनऊ निकल गया है. लखनऊ से दिल्ली का संपर्क टूट गया है. गंगा ज़मुनी तहज़ीब का एक ख़ास नुमाइंदा चला गया है किसी अनंत संसार की ओर.

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सालों पहले एक बार फोन पर बातचीत के दौरान उन्होंने मुझसे कहा कि वो हैं तो नास्तिक लेकिन हिंदुओं से ज़्यादा हिंदू हैं और मुसलमानों से ज़्यादा मुसलमान. कुंभ उन्होंने तमाम हिंदुओं से अच्छा कवर किया तो मक्का की हज यात्रा किसी और मुसलमान से बेहतर समझाई. धर्म, राजनीति, समाज सब पर उनकी गहरी पकड़ थी और उस पकड़ को जब वो अपनी मीठी ज़ुबां से बयां करते थे तो मुश्किल सी बात भी कितनी आसानी से दर्शकों को समझ आ जाती थी. समाज और धर्म के अलग अलग पहलुओं पर उनकी डॉक्यूमेंटरी एक अलग ही क्लास हैं. समय निकाल कर भगवान राम पर उनकी डॉक्यूमेंटरी देखिए. सरल से शब्दों को कैसे पूरी तरलता के साथ वाक्यों और तस्वीरों में पिरोया जा सकता है, उसके वो एक्सपर्ट थे. वही वाक्य हम बोल दें तो लगेगा कि इसमें क्या है और उसी वाक्य को वो बोल दें तो वाह क्या बात हो जाती थी. अगर कभी तस्वीर कमज़ोर पड़े तो कमाल के शब्द उसकी कमी पूरी कर देते थे. वो थे कमाल. शब्दों के बाज़ीगर.

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कौन उनका दोस्त नहीं था, बड़े बड़े साधु-संन्यासी और मौलाना भी. नेता भी और आम लोग भी. अगर चलते चलते कमाल की आवाज़ कान में पड़ जाए तो सब टीवी के आगे रुक जाते थे कि पहले सुन लें क्या बोल रहे हैं, फिर निकलते हैं. चाहे वो कट्टर हिंदू हो या मुसलमान मैंने सबको कमाल का मुरीद पाया है और उदार लोगों के लिए तो कमाल का रास्ता कमाल का था.

ऐसे कमाल आसानी से कहां बन पाते हैं. ये जो कमाल थे उन्हें उस दौर ने बनाया जब गंगा जमुनी तहज़ीब गोमती की तरह लखनऊ के बीचों बीच बहती और बसती थी. अवध की उस तहज़ीब ने उनके भीतर वो शब्द भरे जो हमने सुने, वो समझदारी दी जो हमारी समझ को बेहतर करती रही. अब प्यार का वो दौर ही जैसे ख़त्म हो चला है तो वो कमाल कहां से बन पाएंगे.

कई बार लगता है जैसे मौत को किसी बहाने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती. भगवान को ज़रूरत पड़ती है तो बिना किसी बहाने के किसी को अपने पास बुला लेता है. कमाल साहब के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. भगवान को शायद उनकी ज़रूरत ज़्यादा रही होगी लेकिन यहां हमारे समाज को भी उनकी ज़रूरत कम थोड़े ही थी. अब क्या कहें. अलविदा कमाल भाई.

(फेसबुक से साभार)

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