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आलोक वर्मा को लेकर जल्दबाजी में है सरकार

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FAISAL ANURAG

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मात्र पचपन घंटों में ही आलोक  वर्मा को सीबीआई से हटा दिया गया. यह एक ऐसी घटना है जो बताती है कि सरकार बैकफुट पर है और मामूली तकनीकी आधार को मानक बनाकर अपनी बदहवासी को जता रही है. एक तो 77 दिनों तक सुप्रीम कोर्ट में आलोक वर्मा का मामला पेडिंग रहा और जब अदालत ने अपना फैसला सुनाया तो उसने सेलेक्ट कमिटी के महत्व को स्वीकार तो किया, लेकिन सरकार को भी अवसर प्रदान कर दिया. फैसले में अदालत ने कहा कि सीवीसी के आरोपों के बारे में सेलेक्ट कमिटी एक सप्ताह में फैसला ले.

सरकार ने जो जल्दबाजी दिखायी उससे परसेप्सन यह उभरता है कि आलोक वर्मा को लेकर सरकार जल्दबाजी में हैं और उनकी सेवा के शेष बचे 21 दिन भी इन्हें देने को तैयार नहीं है. एक फैसला रात के दो बजे हुआ था, जिसमें आलोक वर्मा को जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया था और यह फैसला आधी रात के पहले हुआ, जिसमें उन्हें अग्निशमन सेवा में भेज दिया गया. इस पूरी घटना पर देशभर में बहस तेज हो गयी. एक बार फिर रफाल जांच का सवाल उठ खड़ा हुआ है, वहीं सीवीसी पर लगे आरोप भी चर्चा में आ गए हैं. पूछा जा रहा है कि जब सीवीसी पर खुद ही भ्रष्टाचार और अनियमितता के आरोप हैं और तब उसके आरोपों और रिपोर्ट को ही आलोक वर्मा को हटाने का आधार क्यों बनाया जा रहा है. सीवीसी के आरोप में भी आलोक वर्मा पर ज्यादातर आरोपों के बारे में कोई प्रमाण नहीं होने की बात उभर कर सामने आ गयी है.

रिपोर्ट में जिन आरापों को आलोक वर्मा के खिलाफ गंभीर बताया गया है, उसके संदर्भ में भी कोई  ठोस प्रमाण पेश करने में सीवीसी विफल रही है. उसने इतना ही कहा है कि इन आरापों की आगे जांच जारी रखने की जरूरत है. जाहिर है कि मात्र इस तरह की रिपोर्ट के आधार पर आलोक वर्मा को हटा देने से राजनीतिक सवाल तो उठेंगे ही और सरकार को उन सवालों का ठोस जबाव भी देना चाहिए. जिस नागेश्वर राव को कार्यकारी निदेशक का प्रभार दिया गया है, उनके खिलाफ तो अनेक  आरोप हैं और उनकी जांच भी जरूरी है. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को स्वतंत्र और निदेशक को स्वतंत्रता के साथ निर्णय लेने का अवसर देने की बात भी कही है.

इसी सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को तोता कहा था. अब पिंजउे के भीतर क्या चल रहा है, इसपर चर्चा का बाजार गर्म है. अनेक मामलों में यह आरोप लगा है कि केंद्र सरकार अपने विरोधियों को प्रताड़ित  करने के लिए सीबीआई का खुला इस्तेमाल कर रही है. यहां तक कि चुनावों में विरोधी दलों को कमजोर करने के इरादे से भी इस एजेंसी के इस्तेमाल की बात की जा रही है. अनेक ऐसी घटना सामने है, जिससे इन चर्चाओं को बल ही मिल रही है और सीबीआई की साख भी प्रभावित हुयी है. राजनीतिक इस्तेमाल की प्रक्रियाओं ने सीबीआई की स्वायत्ता को तार-तार कर रखा है. अभी जो परिदृश्य है, उसमें सीबीआई की साख बहाल हो जाएगी, इसका संकेत भी नहीं मिल रहा है.

सीबीआई में जिस तरह से अधिकारियों को लाया गया है उसे लेकर भी राजनीतिक हलकों में खुल कर आरोप लगाया जा रहा है कि खास तरह के सत्तापार्टी से प्रतिबद्ध अफसरों को नियुक्त करने की बात की जा रही है. सीवीसी ने वर्मा पर जिन आरोपों के गंभीर होने की बात की है, क्या सुप्रीम कोर्ट ने जिन ए के पटनायक की देखरेख में जांच की बात की थी, उनका समर्थन हासिल है. क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के सामने जो रिपोर्ट सीवीसी ने दी थी उसमें आलोक वर्मा के खिलाफ सिर्फ दो मामलों  में ही आरोपों की गंभीरता की बात उभरकर सामने आयी थी. इंडियन एक्सप्रेस ने प्रकाशित किया है कि जिस दिन आलोक वर्मा को आधी रात के समय सीबीआई दफ्तर में पुलिस ने घेर लिया और आलोक वर्मा को जबरन छुट्टी पर भेज दिया, उस समय वे जिन सात मामलों की जांच कर रहे थे उसमें तीन में प्रधानमंत्री मोदी के प्रिय तीन अफसरों के गंभीर मामले थे. इसके साथ ही रफाल का मुद्दा भी था. प्रशांत भूषण ने कहा है कि सीबीआई के सूत्रों ने ही उन्हें बताया था कि नीचे से क्ल्यिर हो एक फाइल आलोक वर्मा के पास थी, जिसमें रफाल की जांच के संदर्भ में उन्हें निर्णय  लेना था. 143 पेज का वह दस्तावेजी पत्र जिसमें अरूण शैरी, यशवंत सिन्हा और प्रशांत भूषण ने आलोक वर्मा को दिया था. सरकार चाहती थी कि वर्मा उस पत्र को नकार दें. सरकार के एक बड़े अधिकारी ने इस संदर्भ में आलोक वर्मा को निर्देश भी दिया था, यह आम चर्चा में है. आलोक वर्मा के नजदीकी सूत्रों ने इसे सही भी बताया है. मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया का केस भी उनके पास था जिसके रफाल की तरह ही गंभीर राजनीतिक होने का अंदेशा बना हुआ था. इसमें अनेक बड़े लागों के फंसने की बात है. तत्कालीन वित्त सचिव हंसमुख अधिया के खिलाफ सुब्रमण्यम स्वामी के आरोपों  की जांच का मामला भी आलोक वर्मा के पास था. सभी जानते हैं कि अधिया नरेंद्र मोदी के खास अफसर रहे हैं. कोयला खदान के आवंटन का एक मामला भी है, जिसमें प्रधानमंत्री के सचिव भास्कर खुलबे की संदिग्ध भूमिका की सीबीआई जांच कर रही थी. संदेसरा स्टर्लिंग बॉयोटेक मामला जिसमें राकेश अस्थाना पर आरोप भी है और जांच में भी है. जब इतने सारे मामले आलोक वर्मा के पास थे और उसमें सत्ता प्रतिष्ठान के ताकतवर लोगों के संदर्भ में जांच की प्रक्रिया थी, तब रातों रात हड़बड़ी में  उन्हें हटाने से अनेक संदेह का सार्वजनिक होना स्वाभाविक ही है.

(लेखक न्‍यूज विंग के वरिष्‍ठ संपादक हैं)

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