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ईश्वर का है समस्त परिवर्तनशील जगत और इसकी हरेक वस्तु

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मनुष्य ईश्वरीय तत्व का सबसे बड़ा प्रति है, ईश्वर को हर पल अपने इस तत्व की तलाश रहती है .

वह आने के लिए हमारे द्वार पर दस्तक भी देता रहता है.

किंतु हम स्वयं ही अपने आनंद के केंद्रों के वशीभूत रहते हैं. (रामकृष्ण परमहंस)

ईश्वर का है समस्त परिवर्तनशील जगत और इसकी हरेक वस्तु
Mayank Murari

विश्व की समस्त समस्या का समाधान और व्यक्ति के संतुलित एवं सच्चे विकास की बात किसी एक श्लोक में समाया है , तो वह ईशोपनिषद का पहला ही मंत्र है. इस ऋचा से एक साथ सतत विकास, पर्यावरण सुरक्षा,प्रदूषण मुक्ति, बेरोजगारी, मंहगाई, आधुनिक जीवन शैली से जुड़ी समस्त व्यैक्तिक और सामाजिक चिंताओं का समाधान संभव है.

उपनिषद का यह मंत्र व्यक्ति को एक आध्यात्मिक मार्ग के आरोहण का रास्ता दिखाता है. हमें सत्य और ऐसे जीवन की ओर ले जाता है, जहां सुख भोग की तकनीक के साथ संपूर्णसृष्टि के विकास एवं पोषण का लक्ष्य सध जाता है. शुरुआत होता है इस मंत्र का ईशावास्य से. अर्थात् ईश्वर का सबकुछ  है .

Whmart 3/3 – 2/4

पूरा मंत्र है –

ओमईशावास्यमिदंसर्वं यति्ंकचजगत्यांजगत्।

तेनत्येक्तेनभुञजीथामा गृधः कस्य स्विद्धनम्।।

यह ऋचा बताती है कि समस्त परिवर्तनशील जगत में जो कुछ हैं, वह सब ईश्वर से आच्छादित या व्याप्त हैं. हमें त्याग के साथ अपना पोषण करना चाहिए और किसी के भी धन का लोभ न करें. हम पूरे जीवन इसी माया और भ्रम में जीते हैं कि यह घर मेरा है, यह धन और यह यश, यह वंश, यह पद और प्रतिष्ठा मेरी है.

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पूरा जीवन हम इस भ्रांति के मायाजाल में चक्कर काटते हैं. सवाल है कि क्या यह जन्म मेरी इच्छा से होती है. मेरी इच्छा से मृत्यु होगी? क्या हम अपनी इच्छा या मन से क्रोध, प्रेम, यश, पद या संतान की प्राप्ति करते हैं! कदाचित नहीं. सब माध्यम से होता है. किसी में हमारी इच्छा नहीं होती है. हमारा कुछ नहीं है. यह पागलपन है इस जीवन और मृत्यु के बीच का.

अपना मानने का, अपना समझने का. यह घर मेरा है. नाम देते हैं. घर का, व्यक्ति का और पद का. जब भूख, नींद और मन पर हमारा नियंत्रण नहीं तो कुछ भी हमारा कैसे हो गया? जीवन में सारी भावनाएं, वस्तुएं और स्थितियां किसी क्षितिज से हमारे समक्ष उपस्थित होती हैं और कुछ अंतराल पश्चात चली जाती हैं.

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कार्यक्रम के पहले दिन 551 महिलाओं के साथ कलश यात्रा निकाली गयी. यह कलश यात्रा शिव मंदिर परिसर से सुबह 10 बजे निकल कर नगर भ्रमण करते हुए दोपहर दो बजे वापस मंदिर पहुंची.

वह क्षितिज, वह छोर और वह उत्स स्थल ही ईश्वर है और जो जीवन तथा सृष्टि में आच्छादित हो जाता है.

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विज्ञान उसी को प्रकृति कहता है. लेकिन विज्ञान प्रकृति कहता है तो हम शक्तिमान बन जाते हैं. एक अहंकारी व्यक्ति खड़ा हो जाता है. लेकिन जब उपनिषद कहता  है  कि वह ईश्वर  है  तो हमारा अहंकार खत्म हो जाता है. हम दीनता स्वीकार कर लेते हैं. यह चिंतन का अंतर जीवन के कर्म एवं धर्म में भी दिखने लगता है.

आदिगुरू शंकराचार्य अपने प्रसिद्ध भज गोविन्दम् में बार-बार कहते हैं कि अरे मूर्ख! धन की  अति कामना छोड़. गोविंद नाम को छोड़, भाव को पकड़. पूरे भारतीय दर्शन इस जगत में समाये ईश्वर से जुड़ने और महसूस करने की बात करता है. त्यागपूर्ण भोग का अर्थ ही है, जो छोड़ता है, वह भोगता  है.

जो पकड़े रहता है, नाम को, धन को, यश और पद को. उसके जिम्मे भोगने का सुख भी नहीं आता. जब सब ईश्वर का है तो कुछ भी पकड़कर रखने का नहीं. यश हो या अपयश, सुख हो या  दुख. और तब दूसरे के धन से लोभ क्या करना? लेकिन आदमी माया के अधीन कहां यह समझ पाता है.

अमेरिका के एक विख्यात अज्ञेय वादी इंगरसोल ने वार्ता में भोग पर चर्चा के दौरान स्वामी विवेकानंद को बताया कि मैं संसार से अधिकतम निकाल लेने में विश्वास करता हूं.

इसे नारंगी की तरह निचोड़कर सुखा देना चाहता हूं क्योंकि यह दृश्यमान जगत ही एक निश्चित वस्तु  है . इस जवाब के पश्चात स्वामी विवेकानंद ने इंगरसोल को बताया कि भारतीय भी इस पृथ्वी को एक पश्चिमी व्यक्ति से ज्यादा अधिक तरह से निचोड़ते हैं.

एक भारतीय जानता है कि वह मरता नहीं, इसलिए उसको निचोड़ने की जल्दी नहीं होती है. इस कारण वह निचोड़ने में, भोग में आनंद लेता है और ईश्वरानुभूति करता है. जीवन को जब हम स्वार्थी शोषण भाव से मुक्त होकर देख और समझ सके तभी हम जीवन को सचमुच भोग सकेंगे.

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यह संसार आनंदमय ब्रह्म के सिवाय क्या है? और उसी के उपभोग के लिए हम इस धरती पर हैं. हम सरल होने की स्थिति में ही त्याग की दृष्टि रखते हैं और तब ही ब्रह्म का आनंद जो इस धरती के हरेक वस्तु में समाया है दिखता है.

अगर ऐसा नहीं होता तो गांधीजी स्नान के लिए संगम पर गंगा से मात्र एक बाल्टी पानी का ही उपयोग नहीं करते. कहते हैं कि जब जवाहर लाल नेहरू ने उनको कहा कि बापू यह संगम का घाट है और यहां जल का कोई संकट नहीं है.

तब गांधीजी ने कहा था कि इस जल पर करोड़ों भारतवासी का अधिकार है. मेरा जितना अधिकार था, उतना ही उपयोग किया. ज्यादा का भोग गलत है. यही है जीवन का सच्चा आनंद और एक समग्रदृष्टि.

जीवन में जब हम छोड़ते हैं, त्यागते हैं, तो खाली नहीं होते हैं. लेकिन त्याग ना केवल पाने के लिए नहीं होता है. वह अगर ऐसा हुआ तो वह दोषपूर्ण हो जायेगा. फिर हम तेनत्येक्तेनभुञजीथान हीं कह सकते हैं.

जो व्यक्ति छोड़ता है, वह सदैव ताजगी, नवीनता, नूतनता, नयी खुशी, नवीन विचार, चैतन्य ज्ञान से भरा रहता है और जो सदैव भरा रहे, खाली होने को या छोड़ने को राजी नहीं हो, तो वह वंचित रह जाता है. उसके हिस्से जीर्ण-शीर्ण ही मिलते हैं.

आज बेरोजगारी की समस्या हो, या भुखमरी का या जल वायु संकट की. सबके पीछे एक ही कारण है – हम पकड़े हुए है. अपने हठ, अपनी विचार और अपनी दृष्टि. दूसरे के धन पर अपना कब्जा गलत तरीके से स्वार्थ की पूर्ति. सदैव शोषण का भाव. जब कि हमें यह करने का कोई अधिकार नहीं है.

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