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अल्पसंख्यकों को घुसपैठिया कहे जाने पर ऑल मुस्लिम यूथ एसोसिएशन ने जताया एतराज

प्रतुल शाहदेव के खिलाफ राज्यपाल से कानूनी कार्रवाई की मांग

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Ranchi: बीजेपी के प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने एनआरसी मसले पर झारखंड के अल्पसंख्यकों को घुसपैठिया और चंगेज खां का अनुयायी बताया. इस पर ऑल मुस्लिम यूथ एसोसिएशन, आदिवासी जनविकास परिषद सहित कई अल्पसंख्यक संगठनों ने कड़ा एतराज़ जताया है. संगठनों ने इसे सुप्रीम कोर्ट का उल्लंघन बताया और राज्यपाल से कानूनी कारवाई की मांग की.

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आदिवासी-मूलवासी में मतभेद पैदा कर सत्ता चाहते हैं

मुस्लिम यूथ एसोसिएशन के अध्यक्ष एस.अली ने कहा कि प्रतुल शाहदेव साम्प्रदायिक बयानबाजी कर आदिवासी और मूलवासियों के बीच मतभेद पैदा कर सत्ता की राजनीति चाहते हैं. उन्हे ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी नहीं है. 1965 में Bihar Revenue Department के स्पेशल ऑफिसर पीसी राय चौधरी द्वारा लिखित पुस्तक ‘बिहार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर : संताल परगना’ के पेज नंबर 3 में संथाल परगना के 6 सब डिवीजन में सभी समुदाय की कुल आबादी 1901 में 1 लाख 84 हजार 526 है जो 1961 में बढ़कर 26 लाख 75 हजार 203 हो गयी. 1951 से 2011 तक सभी समुदाय की आबादी में बढ़ोतरी हुई है. दूसरे समुदाय के आबादी में बढ़ोतरी या कमी किसी मजहब के कारण ना होकर गरीबों के समाजिक और आर्थिक हालात पर निर्भर करता है. इसे नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे ने भी स्वीकार किया है. गजेटियर 1961 में लिखा है कि इस अवधि में कोई बड़ी महामारी नही हुऐ, पब्लिक हेल्थ में सुधार हुआ जिस कारण जन्म दर में वृद्धि हुई.

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मुगलों की उपराजधानी था साहिबगंज, 1852 से है अपर बाजार का मस्जिद

मुस्लिम यूथ एसोसिएशन के अध्यक्ष एस.अली ने कहा कि रांची और संथाल परगणा में मुसलमानों का इतिहास पुराना है. साहिबगंज का राजमहल मुगलों की उप राजधानी हुआ करती थी, तो रांची में बड़े-बड़े जागीरदार हुए. 1852 में रांची के अपर बजार में हण्डा मस्जिद तो 1867 में जुम्मा मस्जिद स्थापित हुई. एक तरफ शेख भिखारी, नादिर अली अंग्रेजों से लड़ते शहीद हुए, तो दूसरी तरफ जमादार कुरबान अली को 14 साल की सजा हुई. 1912 में असमत अली ने सबसे पहले अलग झारखंड की मांग की थी. जयपाल सिंह मुंडा के साथ झारखंडी मुसलमान खड़ा रहा. यहां के मुसलमान आदिवासियों के साथ झारखंड के ही नहीं, बल्कि भाहरत के मूल निवासी हैं.

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शोषण के खिलाफ हुए हैं कई आंदोलन

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आदिवासी जनविकास परिषद के अध्यक्ष रंजीत उरांव ने कहा कि ‘बिहार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर : संताल परगना’ पुस्तक के पेज नंबर 146 और 147 में बताया गया है कि बड़ी तादाद में भूमिहार, ब्राहमण, राजपूत, भाटिया, साहुकार, आदि सारण, आरा, छपरा, पटना, बलिया, यूपी के प्रतापगढ़, फैजाबाद, राजस्थान के मारवाड़ी संथाल परगना और रांची में आकर बस गये. इनके अन्याय और शोषण के खिलाफ हूल विद्रोह, बिरसा आंदोलन, सरदारी आंदोलन जैसी कई क्रांति हुए हैं. देश विभाजन के बाद बड़े संख्या में बंगाली, पंजाबी और सिंधी भी संथाल परगना और रांची में आकर बस गये. 1931 में भूमिहार की आबादी 11 हजार 27, ब्राहमण 42 हजार 668, राजपूत 21 हजार 200, बनिया 14 हजार 990, साहुकार 54 हजार 669 था. 2018 में इनकी आबादी कितनी है और इनके कितने सांसद-विधायक हैं, प्रतुल शाहदेव को यह भी बताना चाहिए.

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मगही, मैथिली, भोजपुरी को बढ़ावा, झारखंडी भाषाएं विलुप्ति के कगार पर

रंजीत उरांव ने कहा कि सरकार द्वारा मैथिली, मगही, भोजपुरी, अंगिका और संस्कृत को तो सरकारी दर्जा और प्रोत्साहन मिल गया, लेकिन संथाली, मुंडारी, मालतो, कुडख, हो, खड़िया, नागपुरी, खोरठा, कुरमाली, पंचपरगानिया भाषा क्यों विलुप्ति के कगार पर है.

संवादाता सम्मेलन में थे उपस्थित

एस अली, वारिश कुरैशी, जियाउद्दीन अंसारी, इसमे आजम, इकराम हुसैन सहित अन्य लोग उपस्थित थे.

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