Dharm-JyotishJamshedpurJharkhandLIFESTYLE

Akshaya Tritiya 2022 : इस बार अक्षय तृृतीया पर ग्रहों की स्‍थ‍ित‍ि होगी खास, बन रहा खास योग; जान‍िए

Jamshedpur : इस साल अक्षय तृतीया तीन मई यानी मंगलवार को है. अक्षय तृतीया पर ग्रहों की स्थिति खास रहेगी. इस वजह से मालव्य राजयोग, हंस राजयोग और शश राजयोग बन रहा है. इन राजयोगों का बनना बेहद शुभ है. इस द‍िन कोई भी शुभ काम या मांगलिक काम करना बहुत अच्‍छा फल देगा. खरीदारी करने के लिए भी यह स्थितियां बहुत ही शुभ हैं.   तृतीया तिथि का आगमन 2 मई को अहले सुबह 5.18 मिनट पर हो जायेगा. जबकि सूर्योदय 5.39 पर होगा. इस प्रकार सूर्योदय के पूर्व तृतीया तिथि का आगमन हो जायेगा. इस कारण 3 मई को दिन भर तृतीया तिथि रहने के कारण लोग व्रत, पूजा और खरीददारी में जुटे रहेंगे.

अक्षय तृतीया के दिन ही बांके बि‍हारी जी मंदिर में श्रीविग्रह जी के चरणों के दर्शन
परशुराम सतयुग के अंत और त्रेता युग के प्रारंभ में ऋषि जमदग्नि के यहां जन्मे थे. जो विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं. अक्षय तृतीया के दिन ब्रह्मा जी के पुत्र अक्षय कुमार का जन्म हुआ था. इसी दिन हयग्रीव का अवतार और बद्रीनाथ धाम का कपाट खुलता है. इसी दिन परशुराम जी का जन्म हुआ था. अक्षय तृतीया के दिन महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ था. द्वापर युग की समाप्ति भी इसी दिन हुई थी. वृंदावन के बांके बिहारी जी मंदिर में भी इस दिन श्रीविग्रह जी के चरणों के दर्शन होते हैं. वैसे सालों भर उनके चरण वस्त्र से ढ़के रहते हैं.

परशुराम का पहला नाम राम था, शिव ने उन्हें अपना फरसा भेंट किया था
परशुराम भगवान विष्णु के क्रोधावतार हैं. विष्णुपुराण के अनुसार परशुराम का पहला नाम राम था. प्रभु शिव ने उन्हें अपना परशु (फरसा) नामक अस्त्र दिया था. परशु धारण करने के कारण उनका नाम परशुराम पड़ गया. पौरोणिक कथा के अनुसार महर्षि परशुराम जी का जन्म महर्षि भृगु के पुत्र महर्षि जमदग्नि के यहां हुआ था. परशुराम का जन्म पुत्रेष्टि यज्ञ से हुआ था. यज्ञ से प्रसन्न देवराज इंद्र के वरदान के फल स्वरूप महर्षि जमदग्नि की पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल पक्ष तृतीया को मध्यप्रदेश इंद्रौर जिला के गांव मानपुर के जानापाव पर्वत पर हुआ था.

शिव के आश्रम में रहकर प्राप्त किया परशु फरसा
परशुराम ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में रहकर प्राप्त किया. उन्हें ऋषि ऋचीक ने शार्ङ्ग नामक दिव्य अस्त्र और वैष्णव धनुष दिया. कश्यप ब्रह्मर्षि से शास्त्रानुसार अविनाशी वैष्णव मंत्र प्राप्त किया. इसके बाद कैलाश पर्वत के गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में रहकर उन्होंने विद्या प्राप्त कर अति दुर्लभ दिव्यास्त्र, विद्युदभि नामक परशु (फरसा) प्राप्त किया. भगवान भोलेनाथ ने श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु उन्हें प्रदान किया.
बदरीनाथ में एक दिन की तपस्या हजार दिन के बराबर
जिस प्रकार त्रेता युग में रामेश्वर धाम बना था. उसी प्रकार द्वापर युग में द्वारका धाम, कलियुग में जग्गन्नाथ पुरी धाम और सतयुग में बदरीनाथ धाम की महत्ता का वर्णन मिलता है. वहां भगवान विष्णु ने नर और नारायण रूप में तप किया था. बदरीनाथ में एक दिन की तपस्या करने का फल एक हजार साल की तपस्या के बराबर माना जाता है. दुर्द्धम्भ राक्षस के वध के लिए भगवान ने यहां एक सौ दिन तक तपस्या नर और नारायण के रूप में की थी.

शिव को तपस्या करता देख भगवान विष्णु ने धारण किया बालक का रूप
बद्रीनाथ धाम में भगवान विष्णु, बद्री नारायण के रूप में आज भी तप कर रहे हैं. कहते हैं क‍ि यहां जो भी भक्त आता है और सच्चे मन से भगवान बद्रीनाथ का ध्यान करता है, उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है. भगवान विष्णु को उसी स्थान पर तपस्या करना था परंतु वहां भोलेनाथ के परिवार निवास करते थे. उन्हें वहां से कैसे हटाया जाए यही सोचकर उन्होंने बालक का रूप धारण कर लिया. भगवान विष्णु ने बालक रुप धारण करके रोना शुरू कर दिया. रोते हुए बालक की आवाज सुनकर मां पार्वती बालक को चुप कराने बालक के पास गई. तब उन्होंने बालक से कहा कि उसे क्या चाहिए, तो बालक ने अलकनंदा किनारे की जगह मांग ली. भगवान शिव और मां पार्वती ने बालक को वो स्थान दे दिया. इसके बाद भगवान विष्णु अपने असली रूप में आ गये और वहां पर तप करने लगे. तपस्या के दौरान भगवान विष्णु इतने ज्यादा लीन हो गए थे कि उन्हें ये भी ध्यान नहीं रहा कि उनके ऊपर बर्फ जमने लग गई है.
बद्रीनाथ में माता लक्ष्मी व अन्य देवी देवताओं की प्रतिमा
बद्रीधाम में स्थापित प्रतिमा को भगवान विष्णु के स्वयं प्रकट हुई आठ प्रतिमाओं में से एक माना जाता है. बद्रीनाथ में स्थापित भगवान विष्णु की मूर्ति को पंच बद्री अर्थात भगवान बद्रीनाथ के पांच रुपों को दर्शाता है और उसी प्रतिमाओं कि पूजा की जाती है. इस मंदिर में माता लक्ष्मी और अन्य देवी देवताओं की प्रतिमा स्थापित है. बद्रीनाथ धाम का निर्माण आठवीं शताब्दी में आदि गुरु शंकाराचार्य ने परमार राजा कनक के हाथों करवाया था. इस मंदिर में स्थित भगवान विष्णु की मूर्ति को लेकर चर्चा है कि उसे आदि गुरु शंकराचार्य ने अलकनंदा नदी से खोजा था और मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित किया था.

ये भी पढ़ें- Entertainment : ओड‍िया फिल्म Prasthanam का ऑडियो रिलीज, द‍िल को छू लेने वाले बोल

Advt

Related Articles

Back to top button