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AIBE : बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नये नियम से किसे हो रहा फायदा और कौन है परेशान, पढ़ें पूरी खबर

AIBE 16 : अगर आप वकालत करना चाहते हैं, तो लॉ की पढ़ाई के बाद आपके लिए एक अनिवार्य परीक्षा पास करना जरूरी है. यह परीक्षा भारतीय विधिज्ञ परिषद (Bar Council of India) द्वारा आयोजित की जाती है. इसके जरिये उम्मीदवारों में भारत में वकालत की प्रैक्टिस करने की क्षमता आंकी जाती है. इस परीक्षा का नाम है ऑल इंडिया बार एग्जाम (All India Bar Exam). इस परीक्षा में शामिल होकर आप वकालत का लाइसेंस प्राप्त कर सकते हैं. आइये जानते है बार एग्जाम के वैसे नियम जिसने कैंडिडेट को परेशान कर रखा है…

परीक्षा से पहले BCI ने बदले नियम

बार काउंसिल ऑफ इंडिया 31 अक्टूबर को ऑल इंडिया बार एग्जाम के 16वें संस्करण (AIBE 16) का आयोजन करने जा रहा है. परीक्षा से पहले बीसीआई ने एक बार फिर उम्मीदवारों को बड़ा झटका दिया है. इस बार बीसीआई ने एग्जाम सेंटर में बुक, नोट्स, गाइड इत्यादी ले जाने पर प्रतिबंध लगा दिया है. बीसीआई के साइट में नया नोटिफिकेशन आया जिसमें किसी भी तरह का स्टडी मेटेरियल नहीं ले जाने की बात कही गई है. ओपन बुक एग्जाम के लिए छात्रों को सिर्फ बेयर एक्ट (Bare Act without Notes) ले जाने की अनुमति होगी.

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बीसीआई का नया नोटिफिकेशन इसी महीने आया है यानी परीक्षा से कुछ दिन पहले. इससे समझा जा सकता है कि छात्र इसको लेकर कितनी असमंजस में होंगे. ज्यादातर छात्र बेयर एक्ट खरीद चुके हैं ऐसे में अब वो क्या करेंगे ? आर्थिक रूप से कमजोर छात्र महंगी किताबें दोबारा से नहीं खरीद सकते. स्थानीय बाजार में बिना नोट्स वाले बेयर एक्ट उपलब्ध नहीं है.

रजिस्ट्रेशन नोटिस में नोटिस में नया नियम जोड़ा गया

 

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रजिस्ट्रेशन में दो बार बदला नोटिस

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने AIBE 16 के लिए इससे पहले दो बार नोटिस बदल चुका है ऐसे में स्टूडेंट्स का भ्रमित होना लाजमी है. बाजार में कुछ एक पब्लिकेशन को छोड़ दें तो बाजार में बीसीआई के गाइडलाइन वाली पुस्तक मौजूद नहीं है. जिन पब्लिकेशन के पुस्तक हैं भी वो नये नवेले बाजार में दिख रहे हैं.

एग्जाम डेट से पहले नये नियम को हटाया

पब्लिकेशन ने खड़े किये हाथ

बेयर एक्ट छापने वाली बड़ी फर्मों में से एक लेक्सिस-नेक्सिस (LexisNexis) पब्लिकेशन का कहना है कि उनके यहां से प्रकाशित होने वाले बेयर एक्ट बिना नोट्स के मौजूद नहीं है (Universal’s Bare Acts are not available without short notes). वहीं यूनिवर्सल लॉ पब्लिशर्स का कहना है कि बिना नोट्स के बेयर एक्ट छात्रों के लिए उपयोगी नहीं है. उनका कहना है कि वो बीसीआई के अगले नोटिस का इंतजार करेंगे. इससे पहले वो किसी तरह का चेंजेस अपने यहां से प्रकाशित पुस्तकों में नहीं करना चाहते हैं.

बार काउंसिल ऑफ इंडिया को ऐसा लगता है कि जो छात्र लॉ की पढ़ाई कर रहे हैं उनके पास पैसे की कमी नहीं होगी. जबकि ऐसा नहीं है, लॉ पढ़ने वाले छात्र हों या फिर किसी अन्य विषय की पढ़ाई कर रहे छात्र के परिजन कड़ी मेहनत कर दो पैसे जुटाते हैं, तो कई ऐसे भी छात्र है जिन्हें अपनी पढ़ाई का खर्च खुद उठाना पढ़ता है. बीसीआई को सोचना होगा कि नोबेल पेशा में आने से पहले ना तो कोई अमीर होता है ना इसमें आने के बाद होता है.

बार एग्जाम रोजगार की गारंटी नहीं देता, प्रतिबंध जरूर लगाता है

ऑल इंडिया बार एग्जाम को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट में पंजीकरण के पहले वकीलों की लिखित परीक्षा लेने के अधिकार को चुनौती दी गई थी. तब (मार्च, 2016) सुप्रीम कोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश टीएस ठाकुर द्वारा उठाए गए सवालों के बाद बाद बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अपने प्रावधानों में संशोधन करते हुए पंजीकरण के बाद परीक्षा लेना शुरू कर दिया. लेकिन इन सब के बीच छात्रों की परेशानी बढ़ गई. उनके सामने करियर से ज्यादा परीक्षा पास करने की चुनौती है. पहले एंट्रेस देकर कॉलेज में एडमिशन लो, फिर फाइनल सेमेस्टर क्लियर करने के बाद स्टेट बार काउंसिल (State Bar Council) में रजिस्ट्रेशन कराओ, तब AIBE में बैठने का मौका मिलेगा. इतने सारे स्टेप को पूरा करने पर आपको भारी भरकम फीस चुकानी पड़ती है. ये सब कर लेने के बाद भी आपके पास रोजगार नहीं होता.

आप ऐसे समझें, आप लॉ ग्रेजुएट हैं और आप इस प्रोफेशन में आना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको स्टेट बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन कराना होगा. ये निशुल्क नहीं है इसके लिए आपको पैसे देने होंगे. रजिस्ट्रेशन के बाद आपको AIBE के लिए फॉर्म भरना होगा जिसके लिए करीब 3500 रुपये देने पड़ते हैं. हां एक बात और… बार में रजिस्टर्ड होने के साथ ही आप कोई दूसरा रोजगार नहीं कर सकते भले ही आपके पास पैसे ना हो. अब कोई इस प्रोफेशन में बिना बैकग्राउंड के आया हो, तो उसकी हालत का पता लगाया जा सकता है. क्लाइंट बेस्ड जॉब में आपको क्लाइंट के भरोसे रहना पड़ता है. ऐसे में बीसीआई के नियम इस पेशे में आने वाले छात्रों को परेशान करती है. मालूमहो कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया समय-समयपर अपने नियमों में बदलाव करती रहती है.

पूर्व मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने कहा था कि समाज में वकीलों की अंधाधुंध भीड़ बढ़ने से इस पेशे की किरकिरी तो हुई है. इस बयान से आप समझ सकते हैं आखिर क्यों इस पेशे में लोगों को आने के लिए रोका जा रहा है, इसे समझाने की जरूरत नहीं. एक तो ये क्लाइंट बेस्ड प्रोफेशन है उसमें भी इतनी बाधाएं आती है. तो लाजमी है नये जेनरेशन के वकीलों को परेशानी होगी.

बीसीआई के नियम कब बनी परेशानी ?

पिछले साल पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट ने एक युवती की याचिका खारिज करते हुए कहा कि सिर्फ इस आधार पर नहीं मंजूर की जा सकती कि उसका करियर तबाह हो जाएगा. इस संबंध में लीगल एजुकेशन रूल्स, 2008 की धारा 7 के प्रावधान बिल्कुल स्पष्ट हैं. दरअसल, केस दायर करने वाली युवती ने एलएलबी में 44.70 फीसदी अंक हासिल किए थे; लेकिन नियम स्पष्ट हैं कि 45 फीसदी अंक वकालत का रजिस्ट्रेशन कराने के लिए जरूरी हैं.

करीब छह साल पहले बार काउंसिल ऑफ इंडिया के आदेश के अनुसार प्रत्येक वकील को कम से कम एक साल में एक वकालतनामा कोर्ट में दायर करना होगा. मतलब सालभर में एक केस तो लड़ना ही होगा. इस वकालतनामे की फोटो कॉपी बार काउंसिल ऑफ इंडिया के पास जाएगी. इसके साथ वकील शपथ पत्र भी देंगे कि वह और किसी अन्य धंधे में नहीं हैं और कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं.

बार काउंसिल ऑफ इंडिया को प्रतिबंद्ध से ज्यादा रोजगार सृजन के बारे में ध्यान देना चाहिए. ऐसा नहीं करने से छात्रों के परिजन की गाढ़ी कमाई तो बर्बाद होगी ही हमारे युवाओं में निराशा के साथ बेरोजगारी भी बढ़ेगी. और प्रोफेशन की तरह इसे भी उदार बनाने की जरूरत है.

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