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आठ वर्षों में दो कंपनियों के साथ एग्रीमेंट, 2.63 करोड़ का हुआ नुकसान

मामला रांची नगर निगम में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन कार्य से है जुड़ा

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Ranchi : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां अपने ‘स्वच्छता ही सेवा कार्यक्रम’ पर कहते है कि केवल शौचालय निर्माण कर देने से ही देश ही स्वच्छ नहीं हो पायेगा. इसके लिए जरुरी है कि शहर में फैले ठोस अपशिष्ट कचड़े का सही तरीके से निपटारा हो. वहीं ठोस अपशिष्ट प्रबंधन कार्यों पर रांची नगर निगम की स्थिति को देखा जाए, तो वह पूरी तरह इसमें विफल साबित हुई है. कैग की एक रिपोर्ट से पता चला है कि इसी कार्य में निगम को करीब 2.63 करोड़ रुपये नुकसान हुआ है.

स्वयं नगर विकास के संयुक्त सचिव ने इस रिपोर्ट पर कहा था कि मामले की जांच की जायेगी. हालांकि ऐसा नहीं है कि निगम ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन पर कोई पहल न की है. करीब आठ वर्षों में इसके लिए दो कंपनियों के साथ समझौता किया गया. इसमें A to Z कंपनी और एस्सेल इंफ्रा शामिल है. अब महालेखाकार (लेखापरीक्षा) मार्च 2016 (वित्तीय वर्ष– 2015-2016) की रिपोर्ट से पता चलता है कि कैसे ठोस अपशिष्ट कार्य पूरा नहीं होने पर भी निगम को उक्त राशि का नुकसान हुआ. सफाई कार्य देख रही वर्तमान कंपनी एस्सेल इंफ्रा ने भी झिरी में प्रस्तावित प्लांट पर नगर विकास के पास नयी शर्त रख दी हैं.

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ठोस कचड़े से होनी थी बिजली उत्पादन

मालूम हो कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन कार्य के तहत शहर से निकलने वाले कचड़े से बिजली उत्पादन करने की योजना निगम ने वर्ष 2011 में बनायी थी. सफाई व्यवस्था देख रही तत्कालीन एटूजेड कंपनी को झिरी में वेस्ट टू कंपोस्ट प्लांट लगाने की भी जिम्मेवारी सौंपी गयी, ताकि ठोस अपशिष्ट कचड़े का सही तरीके से निपटारा किया जा सके. निगम ने प्लांट निर्माण के लिए करीब 20.22 करोड़ राशि के साथ कंपनी के साथ समझौता भी किया था. बाद में जब कंपनी वेस्ट टू कंपोस्ट प्लांट लगाने में असफल रही, तो अक्टूबर 2015 में इसी प्लांट के लिए निगम ने नयी कंपनी एस्सेल इंफ्रा के साथ एक एग्रीमेंट किया. लेकिन अबतक यह पावर प्लांट लगाने का काम शुरू भी नहीं सका है.

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कैग ने रिपोर्ट में बताया, हुआ करोड़ रुपये नुकसान

महालेखाकार (लेखापरीक्षक) ने वित्तीय वर्ष 2015-2016 के लिए जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कैसे रांची नगर निगम को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन कार्य शुरू नहीं हो पाने से करीब 2.63 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. बताया गया कि ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के तहत कचरे के निपटान के लिए, ईंट बनाने, खाद बनाने आदि के लिए प्रसंस्करण प्लांट निर्माण किया जाना था.

इसके लिए करीब 20.22 करोड़ की राशि जारी की जानी थी. राशि में से एटूजेड कंपनी को करीब 2.63 करोड़ का भुगतान भी निगम द्वारा कर दिया गया. बाद में जब कंपनी संयंत्र का निर्माण नहीं कर सकी, तो निगम ने जनवरी 2014 में उस समझौता को रद्द अक्टूबर 2015 में नयी कंपनी एस्सेल इंफ्रा के साथ प्लांट निर्माण पर समझौता किया. सबसे बड़ी बात यह है कि पहले की कंपनी को हुए भुगतान राशि की वसूली भी निगम नहीं कर सकी. इससे निगम को करोड़ों का नुकसान हुआ.

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ससमय हस्तेक्षप की कमी से समझौता हुआ रद्द, बना कूड़े का पहाड़

कैग की रिपोर्ट में बताया गया कि कई ऐसे कारण थे, जिसके कारण प्लांट निर्माण से जुड़े समझौते को रद्द करना पड़ा. इसके कारण शहरी स्थानीय निकायों से कचड़े का संग्रहण कार्य काफी कठिन होता गया. पिछले आठ सालों में शहर के लाखों टन कूड़े को उठाव कर झिरी स्थिति निगम के डपिंग यार्ड में जमा करने से यहां कूड़े का पहाड़ बन गया है. वहीं इससे फैल रही गंदगी के कारण आसपास के लोग दिन में भी मच्छरदानी में रहने को विवश होते चले गये.

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एस्सेल इंफ्रा ने भी रखी शर्त, लेकिन सफाई कार्य में है पीछे

जहां पहली कंपनी एटूजेड से निगम को करोड़ों का नुकसान हुआ, वहीं साफ-सफाई का काम देख रही वर्तमान एस्सेल इंफ्रा ने भी प्लांट निर्माण पर नगर आयुक्त मनोज को बताया है कि कंपनी झिरी में प्लांट लगाने को तैयार है. लेकिन कंपनी की यह शर्त हैं कि अगर भविष्य में कभी कंपनी को टर्मिनेट किया जाता है, तो उस दशा में प्लांट पर लगने वाली राशि की 90 प्रतिशत डेब्ट लाइबिलिटी सरकार को वहन करनी चाहिए. वर्तमान कंपनी की विभिन्न वार्डों में साफ-सफाई कार्य की प्रगति को देखे तो यह कंपनी भी पूरी तरह असफल देखती है. कंपनी को 2017 के शुरूआत तक ही शहर के सभी वार्डों की सफाई का जिम्मा संभाल लेना था, लेकिन अभी कंपनी केवल 33 वार्डों तक ही सफाई का जिम्मा संभाल रही है.

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