Opinion

ट्रेन, स्टेशन, एयरपोर्ट, पीएसयू के बाद अब स्कूलों को निजी हाथ में दे रही सरकार, यूपी ने कर दी है शुरूआत

Hemant Kumar Jha

जिनके पैरों के नीचे से दरी खींची जा रही है, वे आसमान में उड़ते परिंदों के पंखों की खूबसूरती पर मुग्ध हुए जा रहे हैं। इतिहास ने ऐसी आत्महंता पीढ़ी पहले कब देखी थी यह विमर्श का विषय हो सकता है, लेकिन इसमें शायद ही संदेह की गुंजाइश हो कि समकालीन मध्य वर्ग की आत्म मुग्ध विचारहीनता उसके बच्चों पर बेहद भारी पड़ने वाली है।

कश्मीर, पाकिस्तान, मॉब लिंचिंग और इसी प्रकृति के अन्य मुद्दों के कोलाहल में हममें से अधिकतर की नजरों से शायद ही यह खबर गुजरी हो कि सरकारी कॉलेजों को उद्यमियों के हाथों में बेचने की बाकायदा शुरुआत हो चुकी है और उत्तर प्रदेश में तो अभी पिछले सप्ताह ही तीन राजकीय डिग्री कॉलेजों के बिकने का ‘टेंडर’ भी जारी हो चुका है।

Sanjeevani

सरकारी कॉलेजों को निजी हाथों में सौंपने की यह प्रक्रिया आगे भी जारी रहेगी और इस सौदे के बाद सरकार और निजी उद्यमियों के बीच जो समझ विकसित होगी उसके अनुसार आगे बाकी अन्य राजकीय कॉलेजों के साथ भी ऐसा ही किया जाएगा।

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अब…जब सरकारी कॉलेज निजी होंगे तो उनकी फीस भी बढ़नी…बल्कि बेतहाशा बढ़नी तय है। सरकार द्वारा जो पत्र निर्गत किया गया है उसके अनुसार फीस स्ट्रक्चर के संबंध में सरकार और कॉलेज को संचालित करने वाले उद्यमी के बीच बैठक कर निर्णय लिया जाएगा।

सबसे महत्वपूर्ण यह कि इन कॉलेजों में शिक्षकों की नियुक्ति का अधिकार और उन्हें वेतन देने का जिम्मा भी निजी उद्यमियों को ही सौंप दिया जाएगा।

यानी…सरकारी कॉलेज की अवधारणा समाप्त होने का दौर शुरू हो चुका है। इसके साथ ही, सरकार के द्वारा नियुक्त होने वाले प्राध्यापक पद की गरिमा और इस पेशे से जुड़े स्थायित्व के भाव का भी लोप होना अब सिर्फ समय की बात है।

वैसे भी, अभी हाल में सरकार ने श्रम कानूनों में जो ‘सुधार’ किए हैं, भारत में ‘गिग इकोनॉमी’ और अधिक महत्वपूर्ण फैक्टर के रूप में सामने आने वाला है।  गिग इकोनॉमी…यानी नौकरियों में स्थायित्व की बात तो भूल ही जाइये, प्रति महीने या प्रति सप्ताह ही नहीं, प्रति घण्टे के काम के लिये भुगतान को भी तैयार रहिये। कंपनी को जब जितनी जरूरत पड़ेगी, काम लेगी।

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 गिग इकोनॉमी में भविष्य की सुरक्षा…?

यह राम भरोसे होगा। वैसे भी, कहा गया है कि कलियुग में राम का नाम लेना ही समस्त संकटों से पार लगाता है।

जिस दिशा में चीजें जा रही हैं, विकास की अवधारणा जिस तरह मानवता की कसौटियों से मुक्त होती जा रही है, मान कर चलना चाहिये कि अगले दो-तीन दशकों में सरकारी स्कूल-कॉलेज, सरकारी अस्पताल, सरकारी परिवहन आदि जैसे शब्द विलुप्त होने की कगार पर होंगे।

हाल में एक अध्ययन में यह भी बताया गया कि अवधारणा के स्तर पर प्रारंभिक शिक्षा में सरकारी स्कूल भले ही आवश्यक हों, धारणा के स्तर पर उनकी बढ़ती अप्रासंगिकता अगले 20-21 वर्षों में उन्हें बच्चों से पूरी तरह खाली कर देगी। नतीजा, बढ़ती अप्रासंगिकता का अभिशाप ढोते ये स्कूल अपनी मौत मर जाएंगे और उनकी कब्रों पर मुनाफे की संस्कृति पुष्पित-पल्लवित होगी।

जनशिक्षा…यह शब्द ही विलुप्तप्राय हो शब्दकोश के किसी पन्ने में अपने अर्थ पर अपना माथा नोचता रहेगा, जिसकी ओर कोई नहीं झांकेगा।

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जिस देश का विशाल बाजार आर्थिक मंदी की आहट से कांप रहा हो, मांग की कमी के कारण उत्पादन घटाने को विवश बड़ी कंपनियां कामगारों की छंटनी कर रही हों, नए रोजगार मिलने की बात तो दूर, लगे हुए रोजगार से वंचित हो बहुत सारे लोग अपने गांव लौट रहे हों, वहां विमर्शों के प्रायोजित अध्यायों के कोलाहल में जीवन की वास्तविकताओं से जुड़े मुद्दों का गुम हो जाना ऐसी त्रासदी है, जिसको आने वाला समय ही अधिक बेहतर तरीके से परिभाषित कर सकेगा।

इतने शोर-गुल में इस खबर की क्या बिसात कि सरकारी कॉलेजों के निजी हाथों में जाने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और जल्दी ही इसकी जद में अन्य सरकारी संस्थान भी आने वाले हैं। मुख्य धारा का मीडिया, खास कर हिन्दी मीडिया, ऐसे मुद्दों को नेपथ्य में डाल कर चलना सीख चुका है।

हमारी पीढ़ी त्रासदियों के नए संसार को रचे जाने की कवायदों में जाने-अनजाने उन शक्तियों की सहभागी बन रही है, जिनका अंतिम लक्ष्य ही है…तंत्र पर पूर्ण वर्चस्व और गुलामों की असंख्य पंक्तियां।

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(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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