न्यूज़ विंग
कल का इंतज़ार क्यों, आज की खबर अभी पढ़ें

चार आइएएस अफसरों के इस्तीफे के बाद जस्टिस गुप्ता के ‘देशद्रोह’ पर बयान के क्या हैं मायने

1,670

Faisal Anurag

सरकार के सौ दिनों के उत्साह में केंद्र सरकार डूबी हुई है. नरेंद्र मोदी चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए जीत के अचूक एजेंडे को सेट करने में व्यस्त हैं. इस बीच चार आइएएस अफसरों के इस्तीफे को इसी शोर में गुम किया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के एक जज के भाषण से पैदा हुई हलचल मीडिया से गायब है. बावजूद इसके ये सारे सवाल दर्द की तरह चुभ रहे हैं.

जस्टिस दीपक गुप्त ने सीडीसन के कानून को रद्द करने की मांग की है. साथ ही अहमदाबाद में दिये गये  अपने व्याखान में उन्होंने लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के सवाल को भी गंभीरता से उठाया है. इन्हीं सवालों को उठाते हुए पहले दो आइएएस अफसरों ने इस्तीफा दिया. और दो ने सरकार से नारजगी जताते हुए इस्तीफा दे कर लोकतंत्र के सवाल पर ही प्रकारांतर से कड़ा कदम उठाया है. जस्टिस गुप्त का यह भाषण कई  अर्थों में आज के माहौल बेहद गंभीर है. जस्टिस गुप्त की बातों पर शायद ही मीडिया गंभीर चर्चा करे, लेकिन उनकी चिंता आज के माहौल पर सख्त टिप्पणी जान पड़ती है.

इसे भी पढ़ेंः छठी JPSC का मामला HC में है लंबित लेकिन जारी हो गयी इंटरव्यू की तारीख, मामले पर दें अपनी राय

जस्टिस गुप्त ने कहा है कि बातचीत की कला मर रही है. कोई हेल्दी चर्चा नहीं हो रही है. सिद्धांतों और  मुद्दों की कोई चर्चा नहीं करता है. केवल चिल्लाहट और गालीगलौज का माहौल है. दुर्भाग्य से यह आम धारणा बन रही है कि या तो आप हमसे सहमत हैं या आप हमारे दुश्मन हैं. इससे भी बदतर कि आप राष्ट्रदोही हैं. उन्होंने कहा: एक धर्म निरपेक्ष देश में प्रत्येक विश्वास का धार्मिक होना जरूरी नहीं है. यहां तक कि हमारे संविधान के अनुसार नास्तिक समान अधिकारों का अधिकार लेने के लिए स्वतंत्र हैं. एक अज्ञेयवादी हो या नास्तिक हो, दोनों ही संविधान के तहत विश्वास और विवेक की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है.

उन्होंने कहा, “एक धर्मनिरपेक्ष देश में प्रत्येक विश्वास को धार्मिक होना जरूरी नहीं है. यहां तक कि नास्तिक भी हमारे संविधान के तहत समान अधिकारों का आनंद लेते हैं. चाहे वह एक आस्तिक हो, एक अज्ञेयवादी या नास्तिक हो, कोई भी हमारे संविधान के तहत विश्वास और विवेक की पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त कर सकता है.  संविधान द्वारा अनुमत लोगों को छोड़कर उपरोक्त अधिकारों पर कोई बाधा नहीं है.“

उन्होंने असहमत होने के अधिकार के महत्व बताते हुए कहा, “जब तक कोई व्यक्ति कानून को नहीं तोड़ता है या संघर्ष को प्रोत्साहित नहीं करता है, तब तक उसके पास किसी नागरिक और सत्ता से असहमत होने का अधिकार है. और जो वह मानता है उस विश्वास का प्रचार करने का उसे अधिकार है.“

इसे भी पढ़ेंः #BSE शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स150 अंक गिरा, बैंक, वाहन कंपनियों के शेयर डाउन

“लोकतंत्र का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नागरिकों को सरकार से कोई डर नहीं होना चाहिए. उन्हें उन विचारों को व्यक्त करने से डरना नहीं चाहिए, जो सत्ता में बैठे लोगों को पसंद नहीं हो. इसमें कोई संदेह नहीं कि विचारों को सभ्य तरीके से व्यक्त किया जाना चाहिए. हिंसा को उकसाए बिना, लेकिन इस तरह के विचारों की केवल अभिव्यक्ति अपराध नहीं हो सकती. और इसे नागरिकों के खिलाफ नहीं होना चाहिए.

अभियोजन पक्ष से डरने या सोशल मीडिया पर ट्रोल होने के डर के बिना लोग अगर अपनी राय व्यक्त कर पायेंगे तो दुनिया रहने के लिए एक बेहतर जगह होगी. यह वास्तव में दुखद है कि हमारी एक सिलेब्रिटी को सोशल मीडिया से दूर जाना पड़ा क्योंकि उन्हें और उनके परिवार के सदस्यों को गंभीर रूप से ट्रोल किया गया और धमकी दी गयी.“

उन्होंने अवगत कराया कि विद्रोहियों की आवाज को चुप कराने के लिए ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में राजद्रोह का कानून पेश किया गया था. जबकि उन्होंने यह तय किया कि यह प्रावधान लोगों को उनकी ताकत और अधिकार के इस्तेमाल से रोकने के लिए था. यह कानून प्रकट रूप से वैध, असंतोष या स्वतंत्रता की किसी भी मांग को रोकने के लिए इस्तेमाल किया गया था.

वास्तव में क्वीन इम्प्रेसेस बनाम बालगंगाधर तिलक, पत्रांक (1898) 22 बॉम्बे 112 के मामले में ’राजद्रोह’ शब्द को बहुत व्यापक अर्थ में समझाया गया था. “इन लेखों के कारण कोई गड़बड़ी या प्रकोप हुआ या नहीं, यह पूरी तरह से सारहीन है. यदि अभियुक्त का इरादा लेख द्वारा विद्रोह या अशांति फैलाना था, तो उसका कृत्य निस्संदेह धारा 124 ए के अंतर्गत अपराध होगा.“

इस दृष्टिकोण को अस्वीकार करते हुए उन्होंने कहा; “हिंसा के लिए उकसावे के बिना आलोचना करना राजद्रोह की श्रेणी में नहीं होगा“. महात्मा गांधी के शब्दों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि “स्नेह कानून द्वारा निर्मित या विनियमित नहीं किया जा सकता. यदि किसी को किसी व्यक्ति या प्रणाली के लिए कोई स्नेह नहीं है और जब तक कि वह उकसाने का कार्य नहीं करता, हिंसा को बढ़ावा नहीं देता, उसे अपने असंतोष के लिए पूर्ण अभिव्यक्ति देने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए.“

उन्होंने कहा कि संविधान के संस्थापकों ने संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत स्वतंत्र भाषण के अधिकार को  अपवाद के रूप में राजद्रोह में शामिल नहीं किया, क्योंकि वे कहते थे कि राजद्रोह केवल तभी अपराध हो सकता है जब वह सार्वजनिक अव्यवस्था या हिंसा के लिए प्रेरित करे या भड़काये.

उन्होंने कहा, “केवल हिंसा या विद्रोह के लिए उकसावे पर रोक लगाई जानी चाहिए और इसलिए, अनुच्छेद 19 के अपवादों में ’राजद्रोह’ शब्द शामिल नहीं है. लेकिन राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक अव्यवस्था या अपराध के लिए उकसाना शामिल है.“

इस फैसले की सावधानीपूर्वक जांच करने पर, न्यायमूर्ति गुप्त ने कहा, “यह स्पष्ट है कि यदि अव्यवस्था या कानून और व्यवस्था की गड़बड़ी या हिंसा के लिए उकसाना नहीं है, तो यह संभावना होती कि संविधान पीठ सभी में धारा 124 ए नहीं लगाती. हिंसा के लिए उकसाने या सार्वजनिक अव्यवस्था या कानून और व्यवस्था को बिगाड़ने के संदर्भ में इसे पढ़े जाने पर संवैधानिक माना गया था.“

जस्टिस गुप्त का यह वक्तव्य जिस माहौल में आया है, उसके अनेक संकेत हैं. इसके पहले भी सुप्रीम कोर्ट के चार जजो ने प्रेस कांफ्रेस कर लोकतंत्र के सवाल को उठाया था. उसमें वर्तमान मुख्य जज भी शामिल हुए थे. यही नहीं न्यायलयों के अंदर से ही अनेक तरह के असहमति के स्वर तेज होते रहे हैं. मद्रस हाईकोर्ट के एक जज ने हाल ही में जिस तरह की बातें कही हैं वह बेहद गंभीर संकेत देती हैं. इसके साथ ही कालेजियम सिस्टम को ले कर भी कई जजों के असंतोष की बात की जा रही है. इन नारजगियों का सीधा संबंध केंद्र सरकार की नीतियों ओर भूमिका से है.

चार अफसरों के इस्तीफ पर आइएएस अधिकारियों के एसोसिएशन की खामोशी भी सामान्य नहीं मानी जा रही है.

इसे भी पढ़ेंः इसरो के वैज्ञानिकों का वेतन कम करने वाले आज कर रहे गर्व करने का खेल

 

हमें सपोर्ट करें, ताकि हम करते रहें स्वतंत्र और जनपक्षधर पत्रकारिता...

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like
क्या आपको लगता है कि हम स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता कर रहे हैं. अगर हां, तो इसे बचाने के लिए हमें आर्थिक मदद करें. आप हर दिन 10 रूपये से लेकर अधिकतम मासिक 5000 रूपये तक की मदद कर सकते है.
मदद करने के लिए यहां क्लिक करें. –
%d bloggers like this: