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पार्टिशन के बाद मां-बाप सहित पूरा परिवार चला गया पाकिस्तान लेकिन निदा फाजली रहे हिंदुस्तान में

जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi :  भारत में करीब हजार वर्ष के हिंदू -मुस्लिम संपर्क की वजह से ऐतिहासिक विकास क्रम में एक गंगा-जमुनी तहजीब विकसित हुई है. निदा फाजली इसी संस्कृति के सबसे नायाब उदाहरणों में से एक हैं. निदा फाजली रहीम, कबीर जैसे लोगों की विरासत को आगे बढ़ाने वाली कड़ी थे.

धर्म के आधार पर अलग राष्ट्र पाकिस्तान का निर्माण हमारे इतिहास की सबसे बड़ी भूल थी. निदा उस दर्दनाक दौर से भी गुजरे. वे मुस्लिम थे . उनके पिता और मां सहित पूरा परिवार पाकिस्तान चला गया लेकिन निदा भारत में ही रह गए. उन्हें अपनी जन्मभूमि छोड़ कर जाना गंवारा नहीं हुआ.

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साहित्य के प्रति यूं पैदा हुआ अनुराग

एक बार एक मंदिर के सामने से गुजरते हुए उन्हें एक नेत्रहीन व्यक्ति को सूरदास के पद गाते हुए सुना तो निदा को सूरदास के साहित्य से अनुराग उत्पन्न हुआ. इन्होंने सूरदास के और मीरा के साहित्य का अध्ययन किया तो जाहिर है उनके लेखन में सूरदास का माधुर्य देखा जा सकता है. इन्होंने ऊर्दू के मशहूर शायरों मीर और गालिब सहित अन्य शायरों को भी पढ़ा था.

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पहला नाम मुक्तिदा हसन, धर्मयुग से शुरू किया करियर

निदा फ़ाज़ली का जन्म 12 अक्टूबर को दिल्ली में हुआ था. उनका नाम मुक्तिदा हसन निदा फाजली था. इनके पिता भी उर्दू के अच्छे शायर थे. 1964 में नौकरी की तलाश में बंबई आए. इन्होंने धर्मयुग में अपना करियर शुरू किया. ब्लिटज के लिए भी कविताएं लिखने लगे. इनके मौलिक अंदाज है वजह से इनकी पहचान बनती चली गई. बड़े मुशायरों में आमंत्रित किया जाने लगा.

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शतरंज के मोहरे से फिल्मी सफर हुआ शुरू, 1980 में मिली पहचान

1974 में इन्हें पहली बार रवींद्र जैन के संगीत में शतरंज के मोहरे फिल्म में गीत लिखने का मौका मिला. इसमें आशा भोंसले का गाया जा री हवा छेड़ तेरी मोहे ना भाए. इन्होंने 1979 में शायद फिल्म में दिन भर धूप का पर्वत काटा, शाम को पीने निकले हम तथा खुशबू में फूल नहीं हो जो मुरझाऊं लोकप्रिय हुए थे.

1980 में गीतकार के रूप में इनको पहचान मिली जब इनकी दो फिल्मों आहिस्ता-आहिस्ता और आप तो ऐसे ना थे के गीतों ने धूम मचाई.

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तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा गम ही मेरा हयात है

1983 में रीलीज हुई कमाल अमरोही रजिया सुल्तान फिल्म के गीतकार के रूप में जां निसार अख्तर को लिया गया था, लेकिन फिल्म के पूरे गीत लिखे बिना ही उनका इंतकाल हो गया. इस पर निर्देशक कमाल अमरोही ने बाकी बचे दो कि लिखने की जिम्मेदारी निदा फाजली को दी थी. इसे उन्होंने बड़ी ही कुशलता से निभाया था. तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा गम ही मेरा हयात है गीत तो कमाल का था. गब्बन मिर्जा की पुरनूर आवाज में ये गजल हिंदी सिनेमा की संगीत में एक अलहदा अंदाज का नायाब नमूना है. इसके साथ ही हरियाला बन्ना आया रे गीत भी एक अलग अहसास का गीत है. चांद के पास जो सितारा है.

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कई किताबें प्रकाशित हुईं , साहित्य अकादमी अवार्ड मिला

इनकी कविताओं का पहला संग्रह 1999 में प्रकाशित हुआ था. उर्दू हिंदी और गुजराती में इनके कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. हम कदम, मोर नाच, सफर में धूप होगी, लफ्जों के फूल, आंख और ख्वाब के दरमियां, खोया हुआ सा कुछ और दीवारों के बीच आदि इनकी प्रसिद्ध किताबें हैं. इन की आत्मकथा दीवारों के बीच के लिए इन्हें मध्य प्रदेश सरकार ने मीर तकी मीर अवार्ड दिया था.

इन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड सहित खुसरो अवार्ड, हिंदी उर्दू संगम अवार्ड मिला था. सुर फिल्म के लिए में 2003 में स्टार स्क्रीन और बॉलीवुड मूवी अवॉर्ड दिया गया. इन्होंने खुले आसमान के नीचे तथा यह दिल आपका हुआ जैसे पाकिस्तानी फिल्मों के लिए भी गीत लिखे थे.ये देवा (04) तथा यात्रा (06) के लेखक कौन थे.

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होशवालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है

निदा इश्क के अहसास को बहुत ही लाजवाब शब्दों में बयां करते हैं होशवालों को खबर क्या बेखुदी क्या चीज है इश्क किजे फिर समझिये जिंदगी क्या चीज है. यह गजल जगजीत सिंह की मखमली आवाज में और भी निखर जाती है. इसे आमिर खान, सोनाली बिंद्रे और नसीरुद्दीन शाह की फिल्म सरफरोश में लिया गया है.

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कभी किसी को मुक्कमल जहां नहीं मिलता

यह निदा फाजली की सबसे अधिक ख्यात गजल में से है. आहिस्ता- आहिस्ता फिल्म की इस गजल में जीवन की फिलोसोफी है. इस गजल को भूपेंद्र ने बड़े ही खूबसूरत अंदाज में गाया है. इसको संगीत से सजाया था खय्याम ने. अधिकतर लोग अपने जीवन से असंतुष्ट ही रहते हैं. किसी को दौलत मिलती है लेकिन शोहरत नहीं, किसी को प्रेम नहीं मिलता तो किसी को काम में सफलता नहीं मिलती. इसी तरह से दुनिया जिसे कहते हैं, मिट्टी का खिलौना है में भी जीवन दर्शन है.

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तू इस तरह से मेरी जिंदगी में शामिल है..

1980 में एक फिल्म आई थी आप तो ऐसे ना थे. फिल्म कोई खास नहीं थी पर ये फिल्म राजब्बर और दीपक पराशर की पहली फिल्म थी. इसका ये गीत जबरदस्त लोकप्रिय हुआ था. इस गीत को मोहम्मद रफी ने भी गाया था पर मनहर उदास का गाया वर्जन तो लाजवाब है.

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आदमी के एकाकीपन के चितेरे

आधुनिक भागदौड़ भरी जिंदगी में आदमी अजीब से माहौल में रह रहा है. वो हर समय भीड़ से घिरा है लेकिन फिर भी कहीं से अकेला है. उसके इस एकाकीपन को निदा ने बड़ी शिद्दत से अपनी शायरी में बयां किया है.

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी ….

अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये..

जगजीत सिंह के साथ जोड़ी

निदा फाजली के दोहों पर जगजीत सिंह का एक लाजवाब अलबम है इनसाइट. इसके सभी दोहे एक से बढ़कर एक हैं.

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलों यूं कर लें

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए

यह एक बहुत ही सुंदर गीत है. इसमें बहुत ही सरल शब्दों में महत्वपूर्ण बात कही थी.

इनके गीतों से सजी अन्य फिल्मों में हरजाई, नाखुदा, विजय(88), इज़हार (89),चाहत, गुड़िया, इस रात की सुबह नहीं और तमन्ना (96), तरकीब 2000),वध (01) तथा देव (04).

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लोकप्रिय गीत

* किस्मत की बाजी का फैसला तो हो गया है :  आप तो ऐसे ना थे (80)

* किसकी सदाएं मुझको बुलाएं, अनजाने सपने नींद चुराए : रेड रोज (80)

* कभी पलकों पर आंसु है कभी लब पे शिकायत है : हरजाई (81), किशोर, आरडी

* चांद के पास जो सितारा है : स्वीकार किया मैंने  (83)

* अजनबी कौन हो तुम जबसे तुम्हें देखा है : स्वीकार किया मैंने (83), लता- ऊषा खन्ना

* चुप तुम रहो चुप हम रहे : इस रात की सुबह नहीं (96)

* कभी शाम ढले तो मेरे दिल में आ जाना : सुर (02),महालक्ष्मी, एम एम करीम

* आ भी जा ऐ सुबह आ भी जा : सुर (02), लकी अली एम एम करीम

* जाने क्या ढूंढता है मेरा दिल : सूर मेलोडी ऑफ लाइफ

* पिया के रंग और देनी ओढ़नी : देव (04), कैलाश खेर, आदेश श्रीवास्तव

* बीत गई हैं सदियां कई लेकिन इश्क अभी जिंदा है :भागमती (05)

* मुझे जीना सिखा दो ना : शीशा (05),

* मीठी मीठी बातें हरी-भरी शाम : मॉर्निंग वॉक (09)

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