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#RSS: आर्थिक मंदी के बाद अब मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं को भी नकारने की कवायद

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Faisal Anurag

क्या भारत में मॉब लिंचिग केवल काल्पनिक और पश्चिमी अवधारणा है? इसका जवाब तो यही है कि यह सवाल ही वास्तविकता को नकारनेवाला है. लेकिन आरएसएस के स्थापना दिवस पर तो मोहन भागवत ने साफ शब्दों में मॉब लिंचिंग की घटनाओं को ही नकार दिया.

उन्होंने कहा कि देश को बदनाम करने के लिए इस तरह की शब्दावली का प्रयोग अनुचित है. उन्होंने कहा कि लिंचिंग एक पश्चिमी शब्द है. उन्होंने ने जोर दे कर कहा कि लिंचिंग शब्द भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है इसलिए इसे भारत पर थोपा नहीं जाना चाहिए.

उनके भाषण से स्पष्ट है कि उन्होंने इस तरह की लिंचिंग में मारे गये लोगों के अस्तित्व को ही नकार दिया है. और इस तरह की हिंसा के अंजाम देने की राजनीति की निंदा नहीं की. जाहिर होता है कि इस तरह की हत्याओं के पीछे एक खास किस्म का उन्माद और नफरत क्रियाशील है.

इस नफरत की राजनीतिक प्रक्रिया को समझने से पता चलता है कि संघ सुप्रीमों की नजर में लिंचिंग निंदनीय नहीं है. यह दीगर बात है कि प्रधानमंत्री मोदी दो-एक बार इस तरह की घटनाओं पर क्षोभ व्यक्त कर चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट निर्देष के बाद भी मॉब लिंचिेग के लिए कठोर कानून बनाने की प्रक्रिया का शुरू नहीं हुई है.

यह भी एक सामान्य परिघटना नहीं है. हर साल आरएसएस सुप्रीमो दशहरा के अवसर पर संघ स्थपापना दिवस के आयोजन को संबोधित करते हैं. इस आयोजन में 2014 के बाद एक नई परंपरा शुरू की गयी है, जिसमें देश के उद्योग जगत के किसी बड़ी हस्ती को अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया जाता है.

इस बार एससीएल के संस्थापक शिव नाडार को आमंत्रित किया गया था. माना जाता है कि इस भाषण से संघ प्रमुख आरएसएस की नीतियों पर अपने विचार प्रकट करते हैं. भागवत के इस व्याख्यान में कई ऐसे पहलू उभरे हैं जो बाताते है कि संघ की दिशा क्या है और किस ओर है.

भीड़ हिंसा की घटनाओं को प्रचार बता कर आखिर वे क्या संदेश दे रहै हैं. यह कोई रहस्य नहीं है. अतीत में देखा गया है कि संघ परिवार किस तरह हिंसा करने वालों के पक्ष में खड़ा रहा है. जयंत सिन्हा ने तो हत्या के आरोपियों का न केवल स्वगत किया बल्कि उनके लिए संसाधन जुटाने में मदद भी की.

इसी तरह यूपी के इंस्पेक्टर सुबोध सिंह की हत्या आरोपियों को मदद दी जा रही है. और जेल से बेल मिलने के बाद भव्य स्वागत किया जा रहा है. अखलाक, पहलू खान और तबरेज अंसारी के मामले तो पूरी दुनिया में चर्चित हुए हैं.

अब भागवत इस तरह की चर्चा को देश को बदनाम करने का अभियान साबित कर रहे हैं.

भागवत ने एक और दिलचस्प बात कही है. उन्होंने कहा है कि देश में किसी तरह की आर्थिक मंदी नहीं है, देश आर्थिक विकास के क्षेत्र में बेहद उल्लेखनीय कार्य कर रहा है. मोदी के लिए यह क्लीन चीट है.

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बीएमएस के कुछ नेताओं ने भी आर्थिक मंदी, रोजगार संकट और विदेशी कारपारेट की दखल को लेकर चिंता प्रकट की है.

लेकिन उसे आरएसएस का समर्थन प्राप्त नहीं है. इन दिनो संघ और भाजपा, दोनों ही देश की आर्थिक वास्तविकताओं को गलत साबित करने में लगे हुए हैं. न सरकार के स्तर पर मंदी की असलियत को ले कर स्वीकारेक्ति है और न ही संगठन के स्तर पर.

यह अलग बात है कि देश में निजीकरण की प्रक्रियाओं में देश के सरकारी सेक्टर के कोर समूहों के सामने अस्तित्व का संकट है. अनेक समूहों के मजदूर आंदोलनरत हैं. इन  खबरों की चर्चा तक मीडिया में नहीं होती है. भागवत का यह बयान भी इसी कड़ी को मजबूत बना रहा है.

वास्तविकताओं को नकारने का यह बिल्कुल नया दौर है. किसी भी क्षेत्र में कमियों की चर्चा करने वालों पर देश विरोधी होने का आरोप इस प्रक्रिया का ही हिस्सा है. मोहन भागवत कह रहे हैं कि दुनिया और देश में भी कुछ ऐसे तत्व हैं जो निहितस्वार्थो के कारण नहीं चाहते हैं कि भारत एक शक्ति संपन्न देश बने.

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ समय में भारत में विचारों मे एक भारी बदलाव आया है. इसे कुछ ताकतें नकारती हैं. लोकतंत्र में आलोचनाओं को देशविरोधी बताने के सिलसिले से स्पष्ट है कि एक खास किस्म की अनुदारता को न्यायसंगत ठहराने का सरकारी औरी सांगठनिक अभियान जारी है.

यहां यह भी गौरतलब है कि भागवत ने इसी आयोजन में देश की हिंदुत्व की लाइन को भी स्पष्ट कर दिया है. उन्होंने यह भी साफ किया है कि भारत के हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के मामले मे आरएसएस अडिग है और रहेगा.

प्रत्येक मंच का इस तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. जिसमें असमहत विचारों को दुश्मन साबित किया जा सके. हाल ही में जब देश के जानेमाने 49 कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने अपनी चिंता को ले कर प्रधानमंत्री को पत्र लिखा तो उन लोगों पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया.

इस सवाल पर समर्थन और विरोध का एक माहौल खड़ा कर दिया गया है.

सवाल उठता है कि आखिर देश की न्याय प्रणाली इस तरह की प्रवृतियों को रोकने में कारगर क्यों नहीं है. जिन प्रसिद्ध लोगों पर देशद्रोह करा मामला दर्ज किया गया है, वह एक मजिस्ट्रेट के आदेश से किया गया है. ऊपर की अदालतों की खोमोशी को लेकर भी अनेक सवाल पूछे जा रहे हैं.

मोहन भागवत के बयान से मिलता जुलता बयान तो राम माधव ने भी दिया है. माधव लंबे समय तक संघ के वक्ता रहे हैं. और अब भाजपा के रणनीतिकार हैं. माधव ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी के पास चुनाव की ऐसी मशीनरी है जो बिना चुनाव लड़े भी सत्त्ता में आ सकती है.

उन्होंने खुले तौर पर इस बयान में अनुदार शासक की अवधारणा को मान्यता दी है. इमरजेंसी को तानाशाही बताने वाले संघ और भाजपा के इस तरह के बयान के निहितार्थ को समझा जाना चाहिए.

 

 

 

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