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टेलीफोन ऑपरेटर, मोटर मैकेनिक और सैनिक के बाद टॉप के lyricist बने आनंद बख्शी

बॉलीवुड के मशहूर गीतकार आनंद बख़्शी की जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : बॉलीवुड के सबसे सफल गीतकारों में शुमार आनंद बख़्शी ने रॉयल इंडियन नेवी में दो साल तक कैडेट के रूप में काम किया था. इसके बाद आजादी मिलने पर 1947 से 1956 तक उन्होंने ‘भारतीय सेना’ में भी नौकरी की. इतने बरसों तक बंदूक थामे रहने के बाद भी आनंद बख्शी को संतुष्टि नहीं थी.

1983 में दूरदर्शन को दिए इंटरव्यू में आनंद बख़्शी बताते हैं, “मुझे बचपन से ही लिखने का शौक़ था, जब मैं फ़ौज में चला गया तो वहां भी थोड़ा बहुत लिखता था. वहां कुछ छोटे-मोटे स्टेज प्ले होते थे, मैं उनमें भी हिस्सा लेता था.

रात को हमारे फील्ड एरिया में दूर-दूर तक लाउडस्पीकर लगे होते थे. मैं उनके नीचे खड़ा हो जाता था, जब लाउडस्पीकर पर किसी गीतकार का गीत बजता था, तो बोलते थे अब सुनें फलां गीतकार की रचना. मेरे दिल में एक हूक सी उठती थी. क्या कभी ऐसा भी दिन आएगा कि किसी स्पीकर से मेरा नाम भी लिया जाएगा कि अब सुनिए आनंद बख़्शी की रचना.”

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टेलीफोन ऑपरेटर और मोटर मैकेनिक का काम भी किया

आनंद बख्शी का जन्म 21 जुलाई 1930 को रावलपिंडी (अब पाकिस्तान में) में हुआ था.बचपन से ही आनंद जी का लक्ष्य था फिल्म इंडस्ट्री में आना. परिवार की इजाजत के बगैर इन्होंने ने नेवी ज्वाइन कर ली जिससे की वे बंबई आ सकें.

लेकिन उनका नेवी का करियर ज्यादा दिन नहीं चल पाया. भारत पाकिस्तान के बंटवारे के बाद उन्हें परिवार के साथ लखनऊ जाकर रहना पड़ा. लखनऊ में आनंद ने कुछ दिनों तक टेलीफोन ऑपरेटर का काम भी किया. उसके बाद दिल्ली जाकर कुछ दिनों तक मोटर मैकेनिक का काम भी उन्होंने किया.

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बंबई में संघर्ष की दास्तान

दिल्ली के बाद आनंद का बंबई आना जाना रहता था. उसी दौरान उनकी मुलाकात एक्टर मास्टर भगवान से हुई. 1958 की भगवान दादा ने इन्हें दिया ब्रेक. इस फ़िल्म में उन्होंने चार गीत लिखे थे, लेकिन फिर भी वो गुमनाम ही रहे.

फिल्म ‘भला आदमी’ के बाद भी आनंद को अगली फिल्म के लिए कई साल का इन्तजार करना पड़ा. चार साल बाद 1962 में ‘मेहंदी लगी मेरे हाथ’ फिल्म मिली फिर 1965 में ‘जब जब फूल खिले’ फिल्म ऑफर हुई. दोनों फिल्मों को सूरज प्रकाश बना रहे थे.

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जब जब फूल खिले’ से खिला करियर

कामयाबी की मंज़िल बख़्शी ने तब चढ़ना शुरू की जब उन्होंने 1965 में रिलीज़ हुई फ़िल्म ‘जब जब फूल खिले’ के गाने लिखे.इनका नाम 1967 की फिल्म ‘मिलन’ के बाद काफी फेमस हो गया और उसके बाद एक से बढ़कर एक प्रोजेक्ट मिलने लगे.

इसके बाद फ़िल्मों में उन्होंने जो गीत लिखे वो उनके इस दुनिया से कूच करने के बाद आज भी हिंदी सिनेमा प्रेमियों को लुभाते हैं. साल 1958 से 2002 के दरम्यान बख़्शी ने करीब 3500 गाने लिखे.

धर्मेंद्र की 70 फ़िल्मों में गाने लिखे जो रिकॉर्ड है

आनंद बख़्शी ने वैसे तो हर बड़ी फ़िल्म और फ़िल्मी सितारे के लिए गाने लिखे मगर धर्मेंद्र के साथ उनका ख़ास रिश्ता था. बख़्शी ने धर्मेंद्र (dharmendra) की 70 फ़िल्मों में गाने लिखे जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है. धर्मेंद्र ने एक बार बख़्शी की शान में कहा था, “मुझे फ़ख्र महसूस होता है कि बख़्शी साहब जैसे अज़ीम शायर ने मेरे लिए इतने प्यारे गाने लिखे.”

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दिलीप कुमार भी हैं इनकी शायरी के मुरीद

वहीं, ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार आनंद बख़्शी को महफ़िलों की रौनक़ मानते थे. दिलीप ने एक कार्यक्रम में बख़्शी के बारे में कहा था, “हम लोगों ने जो वक़्त साथ गुज़ारा है बस इतना कहूंगा, जहां महफ़िल में बख़्शी साहब आए समझो उस महफ़िल में बहार आ गई. क्योंकि वहां शेरो सुख़न के झरने फूट पड़ते हैं.

बख़्शी साहब ने महफ़िलों को हुस्न बख़्शा है, हमारे मुआशरे को हमारी तहज़ीब को हुस्न दिया है. फ़िल्मों के गीतों के ज़रिए और अपनी कोशिशों से यह एक तारीख़ी शख़्सयित हैं, ऐसे लोग इस दुनिया में कम पैदा होते हैं.”

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प्रेम का रंग सबसे गहरा

वैसे तो बख्शी साहब ने हर मिजाज के गीत लिखें हैं लेकिन प्रेम गीतों में तो वे कमाल करते हैं. उनकी पहली हिट फिल्म जब जब फूल खिले के गीतों में प्यार की खूशबू को आप आज भी उसी ताजगी से महसूस कर सकते हैं. ये समां समां है ये प्यार का..’, ‘एक था गुल और एक थी बुलबुल..’ और परदेसियों से ना अंखियां मिलाना सदाबहार गीतों में शुमार हैं.

बड़े अच्छे लगते हैं ये धरती ये नदियां और तुम

अभिनेता सचिन की फिल्म बालिका वधू में किशोर कुमार के बेटे अमित कुमार ने अपना सबसे बेहतरीन गीत गाया था बड़े अच्छे लगते हैं ये धरती ये नदियां और तुम. ये लाजवाब गीत भी बख्शी साहब की कलम की ही जादूगरी था. कितने सहज व सरल शब्दों में प्यार का इजहार किया गया है.

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दर्द में डूबे गीतों में भी महारत

दर्द में डूबे गीत लिखने में भी वे बेजोड़ थे. गीत ऐसे की सुनने वालों की आँखें छलक उठीं दिल भर आये. , दोस्ती पर शोले फ़िल्म में लिखा वह गीत ‘ये दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे’ आज तक कौन नहीं गाता-गुनगुनाता. ज़िन्दगी की तल्खियों को जब शब्द में पिरोया तो हर आदमी की ज़िन्दगी किसी न किसी सिरे से उस गीत से जुड़ गयी. गीत जितने सरल हैं उतनी ही सरलता से हर दिल में उतर जाते हैं.

मजरूह सुल्तानपुरी के अलावा आनन्द बक्षी ही ऐसे गीतकार हैं जिन्होंने 43 वर्षों तक लगातार एक के बाद एक सुन्दर और मनमोहक गीत लिखे.

बख्शी टॉप के संगीतकारों के फेवरेट रहे हैं. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन, कल्याणजी आनंदजी, विजु शाह, रोशन, राजेश रोशन सहित कई बड़े संगीतकारों के चहेते लेखकों में आनंद बख्शी शामिल थे.

गायक भी बनना चाहते थे

आनंद बख़्शी बचपन से ही फ़िल्मों में काम करके शोहरत की बुंलदियों तक पहुंचने का सपना देखा करते थे, लेकिन लोगों के मज़ाक उड़ाने के डर से उन्होंने अपनी यह मंशा कभी ज़ाहिर नहीं की थी. वह फ़िल्मी दुनिया में गायक के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते थे.

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संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से जुगलबंदी

यह सुनहरा दौर था जब गीतकार आनन्द बक्षी ने संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ काम करते हुए ‘फ़र्ज़(1967)’, ‘दो रास्ते(1969)’, ‘बॉबी(1973’), ‘अमर अकबर एन्थॉनी(1977)’, ‘इक दूजे के लिए(1981)’ और राहुल देव बर्मन के साथ ‘कटी पतंग(1970)’, ‘अमर प्रेम(1971)’, हरे रामा हरे कृष्णा(1971′ और ‘लव स्टोरी(1981)’ फ़िल्मों में अमर गीत दिये. फ़िल्म अमर प्रेम(1971) के ‘बड़ा नटखट है किशन कन्हैया’, ‘कुछ तो लोग कहेंगे’, ‘ये क्या हुआ’, और ‘रैना बीती जाये’ जैसे उत्कृष्ट गीत हर दिल में धड़कते हैं और सुनने वाले के दिल की सदा में बसते हैं. राज कपूर के लिए ‘बॉबी(1973) व ‘सत्यम् शिवम् सुन्दरम्(1978) में आनंद बख्शी ने गीत लिखे.

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सुभाष घई की फिल्मों के हिट गीतों के हीरो

फिल्म निर्माता और निर्देशक सुभाष घई की फिल्मों की सफलता में मधुर गीतों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है. उनकी फिल्मों में गीतों की रचना की जिम्मेदारी आनंद बख्शी ही निभाते रहे. उनकी शुरुआती फिल्म ‘कर्ज़(1980) से लेकर हीरो(1983)’, ‘कर्मा(1986)’, ‘राम-लखन(1989)’, ‘सौदागर(1991)’, ‘खलनायक(1993)’, ‘ताल(1999)’ और ‘यादें(2001) में वे सुभाष के साथ थे.

यश राज फिल्म की मेलोडी के राज

निर्माता और निर्देशक यश चोपड़ा की सुपर हिट फिल्मों चाँदनी (1989)’, ‘लम्हे(1991)’, ‘डर(1993)’,’दिल तो पागल है(1997)’ तथा आदित्य चोपड़ा के लिए ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे(1995)’, ‘मोहब्बतें(2000)’ फिल्मों में सदाबहार गीत इन्होंने लिखे.

लोगों के जज़्बातों को सरल ज़बान में बयां करने वाले बख़्शी ने 30 मार्च 2002 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया. आज भी उनके बेशक़ीमती गीतों का सरमाया लोगों की ज़बान पर है.

लोकप्रिय गीत

1जिस गली में तेरा घर ना हो बालम
2लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है
3 कोई परदेशी आया परदेश में
4 इश्क़ बिना क्या मरना यारा, इश्क़ बिना क्या जीना
5 हमको हमीं से चुरा लो. दिल में कहीं तुम छुपा लो
6 मेरे महबूब क़यामत होगी..
7 चिट्ठी न कोई संदेश…,
8 चांद सी महबूबा हो मेरी…,
8 झिलमिल सितारों का…,
9 सावन का महीना पवन करे सोर..
10., बाग़ों में बहार है…,
11मैं शायर तो नहीं…,
12झ़ूठ बोले कौआ काटे…,
13कोरा काग़ज़ था ये मन मेरा…,
14तुझे देखा तो यह जाना सनम…,
15 खिलौना जानकर मेरा दिल तोड़ जाते हो
16 उड़ जा काले कावां…,
17 धीरे-धीरे बोल कोई सुन ना ले
18 दो लफ्जों की है ये कहानी
19 ना कोई उमंग है ना कोई तरंग है
20 बड़ा नटखट है ये कृष्ण कन्हैया
21 जिक्र होता है जब कयामत का
22 किसी राह में किसी मोड़ पर कहीं चल ना देना तू छोड़ कर
23 जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं
25 मैं शायर तो नहीं मगर ऐ हसीं जब से देखा मैंने तृझको शायरी आ गई

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