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आरोप लगाकर जांच से क्यों पीछे हट रही झारखंड सरकार

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Faisal Anurag
मुख्यमंत्री रघुवर दास विपक्ष के बड़े नेताओं के खिलाफ आरोप लगाते हुए अक्सर धमकी भरे अंदाज में बात करते हैं, लेकिन आरापों की जांच कराने से पीछे हट जाते हैं. तो क्या यह माना जाए कि सरकार केवल धमकी की भाषा का प्रयोग कर विपक्षी दलों को भयाक्रांत रखना चाहती है या भयादोहन करना चाहती है. ताकि विपक्ष के नेता सरकार की गलत नीतियों का विरोध ना करें और चुप्पी साध लें. प्रतिपक्ष के नेता मुखमंत्री को चुनौती के लहजे में आरोपों की जांच किसी भी एजेंसी से करा लेने की बात करते हैं और मुख्यमंत्री विपक्षी नेताओं की चुनौतियों को दरकिनार कर आरोप दुहराते ही रहते हैं. मुख्यमंत्री ने प्रतिपक्ष के नेता हेमंत सोरेन और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के खिलाफ आदिवासी हित में बने काश्तकारी अधिनियमों का उल्लंघन कर जमीन कब्जाने का आरोप लगाते हुए पिछले दिनों कहा था कि इन नेताओं के खिलाफ उनके पास पुख्ता प्रमाण है और सरकार फाइल पर गंभीरता से विचार कर रही है. विपक्ष के दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों ने इन आरापों पर कहा था कि सरकार सक्षम है. मुख्यमंत्री किसी भी एजेंसी से इन आरोपों की जांच करा लें. महीनों बीत गए लेकिन मुख्यमंत्री ने जांच की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है.

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राज्य में भयादोहन के इस सरकारी कदम से राजनीतिक माहौल खराब होता है. यदि सरकार इन आरोपों पर गंभीर है, तो ऐसे प्रत्येक मामले की उसे जांच कराकर स्थिति को साफ करना चाहिए और दोषियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करना चाहिए. सरकार बहुमत में है और वह किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव में भी नहीं है, फिर भी उसकी तरफ से केवल आरोप ही लगाए जाते हैं. इन आरोपों को भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता भी समय-समय पर दोहराते रहते हैं. राज्य में जब कभी जन मुद्दे गंभीर होते हैं, या किसी मामले में सरकार फंसने लगती है तो आरोपों को दोहराने की प्रवृति तेज कर दी जाती है और बहस की दिशा बदलने की कोशिश की जाती है.

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लोकतंत्र में इस तरह की प्रक्रिया उचित नहीं है. इससे जनता में अनावश्यक संदेह पैदा कर राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश तो की ही जाती है साथ ही भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर संकट के समय तालमेल की गुंजाइश भी बने रहने देने का संदेश साफ दिखायी देता है. कर्नाटक चुनाव के समय प्रधानमंत्री ने भी एक सभा में कांग्रेस के नेताओं को धमकाते हुए कहा था कि वे सीमाओं में रहे नहीं तो इसका अंजाम बुरा होगा. इसके जबाव में कांग्रेस ने कहा था कि प्रधानमंत्री के लिए इस तरह की भाषा शोभा नहीं देती है. यदि प्रधानमंत्री के पास कांग्रेस आलाकमान सहित नेताओं के खिलाफ मामले हैं तो उनकी जांच करा लेनी चाहिए. लेकिन चुनाव समाप्त होते ही यह मुद्दा भी गौण हो गया था.

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राजनीतिक तौर पर भी यह उचित नहीं लगता है कि केवल आरोप की राजनीति की जाए और प्रमाण या जांच की प्रक्रिया को नजरअंदाज कर लिया जाए. लोकतंत्र को यदि भ्रष्टाचार मुक्त बनाना है तो राजनीतिक दलों के नेताओं और बड़े अफसरों के खिलाफ मुकम्मल कार्रवाई की जानी चाहिए और सत्तारूढ़ दल को भी बख्शा नहीं जाना चाहिए. लेकिन अब तक का अनुभव बताता है कि भारत की कोई भी सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों के प्रति गंभीर नहीं है. अब तक जो कार्रवाई ऐसे मामलों में की गयी है, उसमें या तो दलालों की भूमिका रही है या फिर राजनीतिक बदले की भावना की प्रमुखता रही है. अक्सर देखा गया है कि एक समय जिन नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप राजनीतिक दल लगाते हैं बाद में वो या तो उन्हीं दलों के साथ चुनावी तालमेल कर लेते हैं या फिर आरोपित नेताओं को सम्मान के साथ गले मिला लेते हैं.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं और ये उनके निजी विचार हैं.)

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