JamshedpurJharkhand

आखिर जुबली पार्क रोड को खोलना क्यों नहीं चाहता है जिला प्रशासन!

Anand Kumar

कुछ दिन पहले मैं रांची में एक आइएएस अधिकारी के पास बैठा था. बातों-बातों में जमशेदपुर की चर्चा चली. अधिकारी महोदय जमशेदपुर में उपायुक्त रह चुके हैं. जुबली पार्क रोड को बंद किये जाने के मुद्दे पर जब उनकी राय जाननी चाही तो छूटते ही बोले, झारखंड सरकार की हद कंपनी के लीज एरिया के बाहर खत्म हो जाती है. लीज क्षेत्र को कंपनी आज तक अपनी जमींदारी समझती है और सबसे दुखद बात यह है कि जमशेदपुर में रहनेवाले ज्यादातर अफसर भी ऐसा ही सोचते हैं. उनकी बात सुनकर मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि आखिर ऐसा क्या कारण है कि एक सड़क को अचानक बंद कर दिया जाता है और प्रशासन कोई फैसला नहीं ले पाता. सवाल है कि क्या प्रशासन फैसला लेना चाहता भी है? सत्ता में बैठी कांग्रेस और झामुमो जैसी पार्टियां रोड खोलने के लिए आंदोलन कर रही हैं. स्थानीय कांग्रेस विधायक बन्ना गुप्ता जो राज्य की सरकार में मंत्री भी हैं, ऊपरी तौर पर रोड को खोलने के पक्ष में दिखते हैं. जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय तो बाकायदा इसे खोलने का अभियान चलाये हुए हैं. कांग्रेस के बड़े नेता और जमशेदपुर के पूर्व सांसद डॉ अजय कुमार ने भी शुक्रवार से जुबली पार्क खुलवाने का अभियान शुरू कर दिया. डॉ अजय जमशेदपुर के एसपी भी रह चुके हैं. भाजपा का बड़ा वर्ग भी इस रोड को खोलने के पक्ष में है.

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तो फिर कौन लोग हैं, जो नहीं चाहते कि यह रोड बंद रहे और सवाल यह भी है कि वे ऐसा क्यों चाहते हैं. टाटा कंपनी ऐसा चाहती है, यह तो जाहिर है. लेकिन जिला प्रशासन के अधिकारी इस मुद्दे पर राजनीतिक सर्वानुमति की बात क्यों कर रहे हैं. लेकिन यह सड़क कोई मालिकाना का मसला या राजनीतिक मुद्दा तो है नहीं. यह तो एक आम रास्ता है, जिसे 63 साल पहले टिस्को कंपनी ने ही भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के हाथों यहां के लोगों के लिए खोला था. तो प्रशासन क्यों इस मुद्दे को राजनीतिक समझ/बना रहा है. कंपनी के लोग इस मुद्दे पर कुछ बयान नहीं देते, क्योंकि प्रशासन उनकी ढाल जो बना है. जब यह रास्ता खोला गया था, तो टिस्को 1 मिलियन टन स्टील बनाती थी, आज 11 मिलियन टन बनाती है. तब शहर का जो नक्शा था, उसका बड़ा भाग हिस्सा फैक्टरी निगल चुकी है. इसमें रिहायशी इलाके और शिक्षण संस्थान भी शामिल हैं.

जिला प्रशासन के अधिकारी रोड बंद करने के पीछे प्रदूषण, अपराध और महिला सुरक्षा जैसे लचर तर्क देते हैं. मगर असल में यह लोगों को मुद्दे से भटकाने की कोशिश है. जिस शहर के बीचोंबीच 11 मिलियन टन का स्टील प्लांट चलता हो, वहां कारों और बाइक से प्रदूषण की बात करना हास्यास्पद है. प्रदूषण की इतनी ही चिंता है तो सड़क को सीएनजी वाहनों, ई बाइक, साइकिल और पैदल यात्रियों के लिए क्यों नहीं खोल देते. कंपनी या सरकारी अफसर शहर में एयर क्वालिटी मॉनीटरिंग सिस्टम क्यों नहीं लगवाते ताकि यहां वायु प्रदूषण के स्तर का पता लग सके.

जमशेदपुर में लगभग रोज ही गोलियों की तड़तड़ाहट गूंजती है. गुजरे तीन दिन के अखबार पलट लें, तो लगेगा जैसे हम किसी  अराजक शहर के वाशिंदे हैं. फायरिंग, हत्या, लूट, छिनतई की घटनाओं से पन्ने रंगे हुए हैं, तो महज जुबली पार्क बंद कर देने से अपराध थम जायेगा क्या. जमशेदपुर में हुडको और घोड़ाबांधा में भी पार्क हैं, वहां दुष्कर्म जैसी संगीन घटनाएं हो चुकी हैं. मगर वहां प्रशासन को महिला सुरक्षा की चिंता नहीं सताती. क्या इसलिए क्योंकि वह इलाका लीज क्षेत्र से बाहर है और जुबली पार्क लीज एरिया में है.

सरकार जनता के कल्याण के लिए होती है और सिविल सेवकों का काम है उन कल्याणकारी नीतियों को धरातल पर उतारना. उन्हें कंपनी का नहीं जनता का दुख-दर्द दूर करना है और शरीफ और कानून पसंद नागरिकों को सुरक्षा का बोध कराना है. याद रहे, कंपनियां कभी जनता का भला नहीं सोचतीं. वे हमेशा अपना मुनाफा देखती हैं. इसलिए शासन-प्रशासन के साथ जनता को भी सोचना होगा कि आखिर जमशेदपुर को कौन चला रहा है. जैसा कि डॉ अजय कुमार ने शनिवार को कहा कि किसी कंपनी के प्रबंधन का काम सिर्फ कंपनी चलाना होता है, न कि शहर को चलाना. प्रशासन चाह जाये, तो दो मिनट में फैसला हो जाये. तो  सवाल है कि आखिर प्रशासन ऐसा चाह क्यों नहीं रहा.
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