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आखिर क्यों बोकारो विधानसभा क्षेत्र में मुद्दों की नहीं हो रही चर्चा

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Roshan Kumar

Bokaro : बोकारो को झारखंड की शैक्षणिक राजधानी कहा जाता है, यहां का समाज पढ़ा-लिखा होने के कारण राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय रहता है, राज्य के बड़े नेता अक्सर यहां आते रहते हैं. लेकिन सवाल ये है कि पढ़ा लिखा समाज होने के बाद भी यहां चुनाव से यहां के मुद्दे क्यों गायब है?

Mayfair 2-1-2020

बोकारो विधानसभा सीट पर ज्यादातर समय दो नेताओं का दबदबा रहा रहा है,जिसे “दादा” और “चाचा” की लड़ाई भी कहा जाता है. पूर्व विधायक समरेश सिंह यहां से पांच बार विधायक रहे हैं (1997,1985,1990,2000 और 2009 में)

वहीं समाजवादी नेता अकलू राम महतो दो बार (1980,1995) विधायक रह चुके हैं. 2014 में बीजेपी के बिरंची नारायण के 72 हज़ार से ज्यादा मतों वाली जीत के बाद समरेश सिंह ने राजनीति से संन्यास ले लिया. जिससे बोकारो का राजनीतिक समीकरण हमेशा के लिए बदल गया.

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Vision House 17/01/2020

बीजेपी ने बिरंची पर लगाया है दांव

इस बार जहां बीजेपी ने कहा वर्तमान विधायक बिरंची नारायण पर ही दांव लगाया है, वहीं कांग्रेस ने पूर्व विधायक समरेश सिंह की छोटी बहू श्वेता सिंह को उम्मीदवार बनाया है,पूर्व विधायक अकलू राम महतो के पुत्र राजेश महतो निर्दलीय चुनाव मैदान में है.

वहीं आजसू ने विस्थापित नेता राजेंद्र महतो को उम्मीदवार बनाया है, जेडीयू ने अपने पुराने नेता अशोक चौधरी को उम्मीदवार बनाया है, कुल मिलाकर 25 प्रत्याशी मैदान में है.

इतने प्रत्याशी होने पर भी बोकारो के मुद्दों को कहां खड़ा पाया जाता है, यह इसी बात से समझा जा सकता है कि वर्तमान विधायक अपने काम से ज्यादा अपने नेता नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट मांग रहे हैं, तो कांग्रेस और बाकी दल बीजेपी की आलोचना करके इस परिस्थिति में यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि क्या यहां के नेताओं के पास यहां की समस्याओं को हल करने का क्या कोई रोड मैप है?

विस्थापित आज भी लड़ रहे लड़ाई 

बोकारो स्टील प्लांट बनने के बाद से यहां विस्थापित नियोजन और मूलभूत सुविधा पाने की लड़ाई लड़ रहे हैं और यहां इसपर खूब राजनीति भी हुई और इस मुद्दे के बदौलत नेता विधानसभा और लोकसभा पहुंचते रहे हैं,मगर सच यही है कि विस्थापितों की समस्या 1977 से लेकर आज तक समस्या जैसी थी वैसी ही है.

जहां बोकारो स्टील प्लांट ठेकेदारों से काम कराना ज्यादा सहज समझता है और ठेकेदार मजदूरों का शोषण करके लाखों-करोडों कमाते हैं, वहीं विस्थापित दिल्ली-मुंबई में 150 दिन की नौकरी करने को मजबूर होता है, इस मुद्दे पर पूर्व विधायक समरेश सिंह 3 सितंबर 2012 को विधानसभा में अपना कुर्ता फाड़कर सुर्खियां बटोर चुके हैं, मगर समस्या हल नहीं कर करा पाये हैं.

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शैक्षणिक राजधानी में छात्रों और शिक्षा व्यवस्था का हाल तो और भी बुरा है

जहां बीएसएल 2000 तक बोकारो शहर में 42 स्कूलों का संचालन करता था. जिसमें गरीबों ,मजदूरों,खटालों और झुग्गी के बच्चे कम पैसे में अच्छी शिक्षा हासिल कर पाते थे, आज 19 साल बाद बीएसएल महज 10 स्कूलों का संचालन कर रहा है.

शहर में निजी कोचिंग संस्थानों और 10 हज़ार रूपए महीने तक वसूलने वाले निजी स्कूलों का जाल जान बूझकर बिछने दिया गया, जिसमें गरीब आदमी फंसकर मर ही जाये.

सेल के अनुसार, बोकारो स्टील प्लांट फायदे में चल रहा है, तो क्या यह सवाल नहीं उठना चाहिए कि इस तरह के संस्थानों को बंद क्यों नहीं किया जा रहा है, इसका जवाब न विधायक के पास है न सांसद के पास.

वैसे खुद झारखण्ड सरकार पिछले 5 सालों में बोकारो में सैकड़ों और झारखण्ड में हज़ारों स्कूल बंद कर चुकी है, जिसका जवाब मुख्यमंत्री भी नहीं देते हैं.

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बोकारो के कॉलेजो में जहां 3 साल का स्नातक 4 से कम में शायद ही पूरा हो पाता है

बोकारो स्टील सिटी कॉलेज में जहां 2017 में नामांकन ले चुके छात्रों की अभी चौथे सेमेस्टर की हुई है. लेकिन कायदे से पांचवी की होनी चाहिए. 2018 में नामांकन ले चुके छात्र अभी दूसरे सेमेस्टर की परीक्षा दे रहे हैं, जो 6 महीने की देरी से है.

वैसे यह पूरी झारखंड की समस्या है और इसको कौन हल करेगा पता नहीं. राज्य सरकार तो बेबसी ऐसे दिखाती है, जैसे उसे गुजरात में आयी बाढ़ पर आर्थिक सहायता देनी हो, जो देने के लिए उसके पास पैसे नहीं हैं.

बोकारो में मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज की मांग सालों से हो रही है, मेडिकल कॉलेज तो बना, मगर वो भी पिछले 5 सालों में ठीक तरह से चालू नहीं हो पाया है.

इंजीनियरिंग कॉलेज की ईंट कब रखी जाएगी, इस शुभ मुहूर्त का इंतजार यहां के छात्र अभी तक कर रहे हैं.

स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर बस एक बोकारो जेनरल अस्पताल है, जहां की ओपीडी में पांव रखने की भी जगह नहीं होती, एक सदर अस्पताल बनाया गया, जहां डॉक्टर मरीजों को देखते ऐसे हैं जैसे उनके ऊपर एहसान कर रहे हों, ज्यादा सवाल पूछने पर डांट कर भगा दिया जाता है.

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बोकारो के युवाओं को नहीं मिली नौकरी

यहां के युवाओं के रोजगार पर तो शायद ही पिछले 20 सालों में किसी ने ध्यान से देखा हो. बियाडा औद्योगिक क्षेत्र की सारी छोटी फैक्ट्रियां बंद हो चुकी हैं. प्रस्तावित अल्ट्राटेक सीमेंट और रेल कोच का एक प्लांट अभी तक क्यों नहीं बना, इसका जवाब किसी के पास नहीं है, बोकारो के युवा पूरे भारत में अच्छे पदों पर काम करते हैं, मगर उन्हें अपने शहर में ही रोजगार नहीं मिलता है.

पिछले 5 सालों में यहां के विधायक बिरंची नारायण के पास 2 पुल निर्माण के अलावा बताने को कुछ नहीं है, एयरपोर्ट के व्यवसायीकरण को विधयाक अपनी बड़ी उपलब्धि बताते हैं, मगर सच तो यह है कि इस काम के लिए 5000 पेड़ों को काटा गया, जिसका कोई मतलब नहीं था. आगामी 9 तारीख को खुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां रैली करने वाले हैं.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पहले ही रैली कर चुके हैं, मगर क्या मोदी जी यहां के लोगों के दिल को छू पाएंगे? संभावना कम है, जब खुद प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पूरे झारखण्ड में धारा 370 ,राम मंदिर और NRC जैसे मुद्दों पर वोट मांग रहे हों. तो बोकारो में प्रधानमंत्री जनता के मुद्दों पर बात करें तो शायद ही यह संभव हो.

फिर भी बोकारो के छात्रों और युवाओं से आग्रह है कि अपने हक़ के सवाल पूछते रहें, भले कितने भी अहंकारी लोग सत्ता पर क्यों न बैठे हों, क्योंकि देश में लोकतंत्र है.

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Ranchi Police 11/1/2020

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