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आखिर जनसुविधाओं की कीमत पर कैसा रेवेन्यू मॉडल तैयार कर रही है जमशेदपुर अधिसूचित क्षेत्र समिति

Jamshedpur : जमशेदपुर अधिसूचित क्षेत्र समिति, जिसे शहर के लोग जेएनएसी के नाम से जानते हैं, एक नगरीय निकाय है. झारखंड के बाकी शहरी निकायों की तरह जमशेदपुर में कोई नगर निगम या नगरपालिका नहीं है. यहां नगर निकाय के चुनाव नहीं होते, क्योंकि इसमें कई तरह के पेंच हैं. लिहाजा यहां अधिसूचित क्षेत्र समिति बना दी गयी है, जो शहर के लोगों की सुख-सुविधा और साफ-सफाई का ध्यान रखती है. इसपर जन्म-मरण का प्रमाण पत्र बनाने, मकानों के नक्शे पास करने, पार्किंग और बाजारों की व्यवस्था करने, गरीबों को आवास दिलाने और वह तमाम काम करने का जिम्मा है, जो एक आम नगरपालिका करती है. लेकिन चूंकि यह निर्वाचित नगर निकाय नहीं है, इसलिए यहां विशेष पदाधिकारी ही सर्वेसर्वा है. फिलहाल राज्य प्रशासनिक सेवा के एक अफसर इसके कार्यपालक पदाधिकारी हैं.  बतानेवाले तो यह भी बताते हैं कि जिले के उपायुक्त का दफ्तर विशेष पदाधिकारी के दफ्तर के आगे बिल्कुल फीका है.

चर्चा है कि जबसे साहब आये हैं, जेएनएसी का सिविक मॉडल पीछे छूट गया है और रेवेन्यू मॉडल हावी हो गया है. हाल के दिनों में दो मामलों को लेकर जेएनएसी चर्चा में है. पहला सोनारी स्थित दोमुहानी में पब्लिक टॉयलेट के ऊपर रेस्टोरेंट की बंदोबस्ती करके और दूसरा रविवार के दिन एक वाहन शोरूम में  विज्ञापन बोर्ड लगाने पर फाइन वसूली के लिए टीम भेजकर. ये दो काम बताते हैं कि जेएनएसी राजस्व उगाही के लिए कितना बेचैन है. शौचालय के ऊपर रेस्टोरेंट बना देने का नायाब तरीका भी इन्हींं विशेष पदाधिकारी महोदय की देन है. पहली बात कि इन्होंने खुद नदी की जमीन पर शौचालय बनवाया, ताकि लोगबाग नदी के किनारों को शौच कर गंदा न करें. फिर उस शौचालय को दूसरे को लीज पर दे दिया. यानी वैसी जगह, जहां लोग मल-मूत्र का त्याग करते हैं, उसके ऊपर जेनएसी को लगता है कि लोग खाना खा सकते हैं. एक समय था, जब भारतीय घरों में शौचालय मुख्य घर से दूर बनाये जाते थे. लोगबाग शौचालय से आकर नहाते नहीं भी तो कम से कम हाथ-पैर-मुंह तो धो ही लिया करते थे. बाद के दिनों में शौचालय घरों और फ्लैट के अंदर अटैच्ड होने लगे, लेकिन फिर भी ऐसा नहीं होता कि लोग बाथरूम में बैठ कर खाना खाने लगें हों. लेकिन जेएनएसी ने ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है. बाथरूम के ऊपर किचन और रेस्टोरेंट के लिए जगह अलॉट कर दी. एक बेचारा फंस भी गया. 17 लाख रुपये में 3 साल का ठेका लेने वाला  व्यापारी अब जार-जार रो रहा है, क्योंकि उसका पैसा डूब गया.

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जेएनएसी का यह इकलौता कारनामा नहीं है. वह ऐसे कारनामे रोज करता है. टाटा स्टील और जुस्को कंपनी एरिया में शहरी विकास के लिए योजनाएं बनाती है. यहां की सड़कों को चौड़ा किया जाता है, ताकि वाहन उस पर से बेरोकटोक गुजर सकें, लेकिन जैसे ही कोई सड़क या फुटपाथ चौड़ा किया जाता है,  जेएनएसी बिना देर किये उसे पार्किंग में तब्दील कर देता है. आज तक किसी को समझ में नहीं आया कि अगर सड़क पर गाड़ी खड़ा करना अवैध है, तो जेएनएसी के पार्किंग का ठेका देते ही यह काम वैध कैसे हो जाता है.

लोग बताते हैं कि जेएनएसी की टीम ने शहर में वसूली के लिए बाकायदा इनफॉर्मर भी छोड़ रखे  हैं. यह इनफॉर्ममर अधिकारियों को अपनी अपनी सहूलियत के हिसाब से सूचनाएं देते हैं कि अमुक जगह अतिक्रमण हैं, उस जगह विज्ञापन की होर्डिंग लगा दी गई है, अमुक जगह दुकान सज गई है आदि-आदि. वैसे अफसरों को खुश करके कहीं भी दुकान लगायी जा सकती है. कहने वाले तो यह भी कहते हैं कि जेएनएसी के कुछ अधिकारियों ने एक ऐसा आदमी रख रखा है, जो नोटिफाइट एरिया के दफ्तर में आरटीआई डाल-डाल कर सूचनाएं निकालता है और उन सूचनाओं के आधार पर जेएनएसी के अधिकारी गड़बड़ी वाली जगह पर पहुंच जाते हैं.  ऐसी ज्यादातर आरटीआई बड़े बिल्डरों और भवनों पर डाली जाती है. आरटीआई डालने वाले महोदय अक्सर वहां देखे जा सकते हैं, जहां जेएनएसी की कार्रवाई चल रही हो.

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