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SAR अफसर की वजह से आदिवासी परिवार को हुआ लाखों रुपये का नुकसान, CNT प्रावधानों के बावजूद बाजार दर से नहीं मिली क्षतिपूर्ति राशि

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♦एसएआर अधिकारी मीना ने बाजार से काफी कम दर पर जमीन का मुआवजा तय किया

Pravin Kumar

Ranchi : अपनी जमीन बचाने के लिए विमल कच्छप 13 सालों तक कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाते रहे. उन्हें उनकी जमीन तो नहीं मिली, लेकिन वह अपनी जान जरूर गंवा बैठे. उनकी हत्या 5 नवम्बर 1995 में कर दी गयी थी.

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उनकी इस लड़ाई को उनकी पत्नी जावा कच्छप ने अपने चार बेटों के साथ जारी रखी. लेकिन जब फैसले का वक्त आया तब भी आदिवासी परिवार को उनकी जमीन का उचित कंपेनसेशन नहीं मिला. इतना ही नहीं एसएआर  मुआवजा तय करने के पूर्व आदिवासी परिवार की आपत्तियों को भी दरकिनार कर दिया गया. जबकि आदिवासी परिवार की ओर से जमीन की कीमत 12 लाख रुपये प्रति डिसमिल देने का मांग की जा रही थी. जो बाजार दर के अनुसार थी. लेकिन मात्र 1 लाख 37 हजार 391 रुपये मुआवजा दर का निर्धारण कर दिया गया.

यह करनामा वैसे अफसर के द्वारा किया गया जिसकी जिम्मेदारी आदिवासियों को अधिकार दिलाने की है. मामला एसए आर वाद सं0 138/182-83 से जुड़ा है. इसका निष्पादन विशेष विनियमय पदाधिकारी (एसएआर अफसर) रांची श्रीमती मीना ने किया. सीएनटी एक्ट की धारा 71 ए के तहत आदिवासी परिवार को अधिकतम लाभ दिलाने का प्रावधान है.

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क्या है मामला

भू-वापसी का यह वाद आवेदक विमल कच्छप, पिता महादेव उरांव, गांव बगीचा टोली, मौजा तुपुदाना थाना नम्बर 267, खाता सं. 99, प्लाट सं0 606, रकबा 30 डिसमिल की वापसी के लिए छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम -1908 की धारा 74 ए के तहत प्रकाशवती देवी, पति रामेश्वर लाल खेटिया, भाला ब्रदर्स अपर बाजार रांची के विरुद्ध दायर किया गया था. इसके बाद 1986 में तत्कालन एसएआर अफसर ने विमल कच्छप को 20 हजार क्षतिपूर्ति राशि देने का आदेश निर्गत किया. इस आदेश के विरोध में विमल कच्छप की ओर से अपर समाहर्ता रांची न्यायालय में एसएआर अपील 56 (आर)15/1886-87 दायर की गयी और इस मामले में 2 मार्च 1987 को दखल दिहानी का आदेश निर्गत किया गया. इस आदेश के विरुद्ध प्रकाशवती देवी ने आयुक्त न्यायालय में रिवीजन वाद सं0 127/1987 दयार किया. जिसमें आयुक्त न्यायालय ने 6 अक्टूबर 19 98 को अपर समाहर्ता रांची के द्वारा परित आदेश को निरस्त कर दिया. और कहा भूमि के कम्पेंसेशन को रीफिक्स किया जाये.

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मामला पहुंचा हाइकोर्ट

आयुक्त न्यायालय द्वारा 6 अक्टूबर 1998 में परित आदेश के खिलाफ 1995 में विमल कच्छप की हत्या के बाद उनकी पत्नी जावा कच्छप ने हाइकोर्ट रांची में CWJC No502/1999(R) जावा कच्छप बनाम राज्य सरकार दायर किया. जिसमें हाइकोर्ट की एकल पीठ ने 23 फरवरी 2012 को परित आदेश में कमिश्नर न्यायालय के द्वारा 6 अक्टूबर 1998 को परित आदेश सही माना. कोर्ट ने याचिका यह कहते हुए खारिज किया कि क्षतिपूर्ति राशि का फिर से निर्धारण किया जाये. इसके बाद भी आदिवासी परिवार अपनी जमीन की वापसी के लिए कोर्ट कचहरी में लड़ाई लड़ता रहा. इस बीच प्रकाशवती देवी की भी मौत हो गयी.

1986 से 2019 तक अपने आधिकार के लिए लड़ता रहा विमल कच्छप का परिवार

इस मामले में जावा कच्छप के द्वारा एलपीए दयार किया गया था. हाइकोर्ट से लेकर उपायुक्त और कमिश्नर कोर्ट ने क्षतिपूर्ति राशि तय करने की बात कही. जावा कच्छप बनाम प्रकाशवती देवी के मामले में जावा कच्छप के द्वारा उच्च न्यायालय में दायर रिट याचिका एवं LPA भी दयार किया गया था, जिसमें क्षतिपूर्ति राशि बाजार दर पर उपलब्ध कराने के संबध में कहा गया था. LPA No. 210/2012  और याचिका के मामले विचाराधीन रहने के कारण क्षतिपूर्ति राशि निर्धारण एवं भुगतान नहीं हो सका था. न्यायालय के द्वारा 3 जनवरी 2019 को आदेश परित किया गया था. इसके बाद विनिमय अधिकारी ने 4 जनवरी 2020 को क्षतिपूर्ति राशि का निर्धारित कर दिया, जो कि बाजार दर से काफी कम है. इस मामले में आदिवासी परिवार को 30 डिसमिल जमीन का मुवाजा करीब दो करोड़ बनता है. लेकिन एसएआर पदाधिकारी श्रीमती मीना की वजह से मात्र 41 लाख 21 हजार 730 रुपये ही मिले.

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6 Comments

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