Opinion

बेटे आकाश विजयवर्गीय पर कार्रवाई, पर मीडिया की औकात पूछने वाले पिता का क्या करेंगे मोदी

Surjit Singh

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो जुलाई को कहा कि जिसका भी बेटा हो, कार्रवाई होनी चाहिए. मनमानी नहीं चलेगी. पार्टी में ऐसे लोगों के लिये जगह नहीं होनी चाहिये. प्रधानमंत्री का यह बयान आकाश विजयवर्गीय को लेकर है.

आकाश विजयवर्गीय, जो इंदौर से भाजपा के विधायक हैं. सरकारी अधिकारी को बैट से मारने को लेकर सुर्खियों में आएं. पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया. और अब वह जमानत पर हैं. जमानत पर जेल से निकलने के बाद आकाश विजयवर्गीय के समर्थकों ने जुलूस निकाला.

तो क्या आकाश विजयवर्गीय के साथ-साथ जुलूस निकालने वालों की भी पार्टी में जगह नहीं होनी चाहिये.

चलिये, अब मान लिया जाये कि प्रधानमंत्री ने कह दिया है, तो आकाश विजयवर्गीय पर कार्रवाई हो जायेगी. पर, उस व्यक्ति पर कौन कार्रवाई करेगा, जो आकाश विजयवर्गीय के पिता और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं. उनका नाम कैलाश विजयवर्गीय है.

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जिन्होंने आकाश विजयवर्गीय का बचाव करते हुए न्यूज-24 के एंकर से कहा थाः तुम्हारी औकात क्या है. हैसियत क्या है, सवाल पूछने की. शायद ही भाजपा का शीर्ष नेतृत्व कैलाश विजयवर्गीय से इस बारे में पूछे भी. यह मीडिया को लेकर भाजपा नेताओं के पूर्वाग्रह, वैल्यू और सोच को दर्शाने के लिये काफी है.

सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री किन-किन मामलों में बोलेंगे. उनके बोलने का कुछ असर होगा भी या नहीं. कितनों को पार्टी से निकालेंगे. कितनों पर कार्रवाई करेंगे.

दरअसल, भाजपा में ऐसे लोगों की फौज खड़ी हो गई है. चुनाव जीतने और सत्ता में बने रहने के लिये पार्टी ने ऐसे-ऐसे लोगों को भाजपा में शामिल करा लिया है या पदोन्नति दे दी है, जो आगे चल कर भाजपा के लिये ही गले की हड्डी बनने वाला है.

ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है, जिनका काम अफसरों को पीटना, गोडसे को महान बताना, मुस्लिम महिलाओं से दुराचार करने की अपील करना जैसे काम करना है.

यह बात तो सब जानते हैं कि आज की भाजपा अटल-आडवाणी वाली भाजपा से पूरी तरह अलग है. जिसका मकसद सिर्फ चुनाव जीतना और सत्ता पर काबिज होना भर रह गया है.

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पिछले कुछ सालों में भाजपा में नेताओं को पदोन्नति देने या शामिल कराने के मापदंड ही बदल गये हैं. पार्टी के बाहर के लोगों (विरोधी पार्टी के लोगों) को ही नहीं, पार्टी के अंदर के अलग राय-विचार रखने वालों को नीचा दिखाने, अपमान करने वालों, विरोधियों के खिलाफ गाली-गलौज की भाषा का इस्तेमाल करने वालों, जिस किसी को भी देशद्रोही व पाकिस्तान परस्त बताने वालों की वैल्यू बढ़ती चली गई है.

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यराज, मंत्री गिरिराज सिंह, सांसद प्रज्ञा ठाकुर जैसे लोग इसके बड़े उदाहरण हैं. यही कारण है कि भाजपा में केंद्र से लेकर राज्य स्तर पर पदाधिकारों की एक ऐसी फौज खड़ी हो गयी है, जो लगातार विरोधियों को अपमानित करने, अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए चीख-चिल्लाकर अपनी बात को ही सही करार देने, विरोधियों को बोलने नहीं देने में माहिर हैं.

ऐसे लोगों पर रोक लगाने की बजाय उन्हें प्रखर वक्ता बताया जाने लगा है. मीडिया सवाल उठाती नहीं और वे सत्ता शीर्ष के करीबी बने रहने में कामयाब होते चले गए. ऐसे नेताओं-कार्यकर्ताओं से निपटना प्रधानमंत्री और भाजपा के लिये बड़ी चुनौती बनने वाला है.

सफाई का काम जितनी जल्दी शुरू होगा, भाजपा उतने ही फायदे में रहेगी. कहते हैं, सत्ता और पावर अक्सर लोगों का दिमाग खराब कर देती है. घमंडी और अभिमानी बना देती है. गुस्सा नाक पर ला देती है और लोग खुद को सिस्टम से उपर समझने लगते हैं.

किसी बात की रोक-टोक या किसी मामले में अलग राय रखने वालों को हर कीमत पर कुचल देने की भावना भी जन्म लेने लगती है.

ऐसी स्थिति में कोई संस्था, पार्टी या व्यक्ति एक भंवर में फंस जाता है. जिससे बाहर निकलना उस संस्था या व्यक्ति के लिये मुश्किल हो जाता है.

तो क्या भाजपा उस भंवर में फंसने वाली है या फंस चुकी है. तीन जुलाई को हिन्दुस्तान अखबार के पहले पन्ने पर आकाश विजयवर्गीय को लेकर प्रधानमंत्री का दिया गया बयान प्रकाशित हुआ है.
उसके साथ ही दो सूचनाएं है. यह कि प्रधानमंत्री ने इससे पहले दो बार सख्त रुख अपनाया था. पहली बार पिछले साल मॉनसून सत्र से पहले. तब मोदी ने कहा थाः गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं. राज्य सरकारों को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए.

यह जांचने, समझने और महसूस करने का विषय है कि भाजपा शासित राज्यों की सरकार ने ऐसे लोगों से निपटने के लिये क्या कार्रवाई की.

दूसरी बार लोकसभा चुनाव-2019 के वक्त. जब गोडसे को देशभक्त बताने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साध्वी प्रज्ञा को नसीहत दी.

उन्होंने तब कहा था कि वह प्रज्ञा को कभी मन से माफ नहीं कर पायेंगे. तो क्या प्रधानमंत्री के नसीहत का प्रज्ञा ठाकुर पर कोई प्रभाव पड़ा.

यह समझने के लिये लोकसभा में शपथ लेते प्रज्ञा ठाकुर को याद करिये, समझने में मुश्किल नहीं होगी. जब प्रज्ञा ठाकुर ने शपथ के दौरान अपने पिता की जगह गुरुपिता का नाम लिया.

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