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बिजली चोरी मामले में ACB ने 2014 में मांगी थी स्वीकृति, सरकार बदलने के बाद हुई कार्रवाई

1999 में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने अधिकारियों को पकड़ा था, 21 साल बाद छह फरवरी को JBVNL ने अभियोजन की दी स्वीकृति

बिहार के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने झारखंड भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को दी मामले की जानकारी

जांच करने के बाद 3 जुलाई 2014 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने जेबीवीएनएल से मांगी स्वीकृति

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Chhaya

Ranchi: नामकुम में 1997-1999 के बीच करोड़ों रुपये की बिजली चोरी होती रही. लेकिन सरकार की तरफ से उस वक्त इसे नहीं रोका गया. ताज्जुब की बात ये है कि, जब बिहार के एसीबी ने इस बाबत झारखंड सरकार को 2014 में यानी रघुवर सरकार के दौरान इस बात की जानकारी दी. तो उसके बाद भी सरकार की तरफ से एसीबी को कार्रवाई करने की स्वीकृति नहीं मिली.

अब सरकार बदलने के बाद पिछले दिनों जेबीवीएनएल की ओर से 21 साल पुराने मामले में कार्रवाई करने की स्वीकृति दी गयी. बता दें कि तत्कालीन बिजली बोर्ड के तीन अधिकारियों को साल 1999 में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने बिजली चोरी के मामले में पकड़ा था.

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अधिकारियों की ओर से मेसर्स स्पृहा स्टील प्राइवेट लिमिटेड नामकुम को बिजली बिल में फायदा पहुंचाने का मामला है. एसीबी ने साल 1999 में अधिकारियों पर केस दर्ज किया है.

लेकिन इसके बाद राज्य गठन हुआ और झारखंड बिजली बोर्ड में मामला दब गया. इसी बीच बिहार के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की ओर से भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो झारखंड को मामले की जानकारी दी गयी.

राज्य भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने मामले की जांच की. जिसके बाद 3 जुलाई 2014 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने जेबीवीएनएल से पत्र लिख विभागीय स्वीकृति मांगी. अब सरकार बदलते ही जेबीवीएनएल ने उक्त तीन अधिकरियों पर अभियोजन की स्वीकृति दी.

एक महीने में चालीस लाख की बिजली चोरी की गयी

इन तीन अधिकारियों को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने साल 1999 में खुद पकड़ा था. जिसके बाद कार्रवाई की गयी. इन पर आरोप है कि साल 1997 से 1999 तक अधिकारियों की मिलीभगत से एजेंसी को लगभग करोड़ों के बिजली बिल में फायदा पहुंचाया गया.

क्योंकि एजेंसी का कार्यालय नामकुम में था, और जिन अधिकारियों पर आरोप है वे सभी टाटीसिलवे में पदस्थापित थे. इंडस्ट्रीज के एक महीने का बिल ही लगभग तीस से चालीस लाख रूपये होता है.

ऐसे में अधिकारियों की ओर से लगभग करोड़ों का लाभ एजेंसी को पहुंचाया गया. फिलहाल तीनों अधिकारी रिटायर हो चुके हैं. नियमों की मानें तो अधिकारियों पर मामला दर्ज होने पर उन्हें प्रमोशन नहीं दिया जाना चाहिये. लेकिन राज्य गठन के बाद राज्य में मामला दब गया. और इन तीनों अधिकारियों को प्रमोशन मिलता रहा.

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2018 में भी बोर्ड बैठक में समीक्षा की गयी थी

जेबीवीएनएल में ऐसे मामलों को बोर्ड स्वीकृति की जरूरत होती है. ऐसे में 25 फरवरी 2018 को बोर्ड की 38 वीं बैठक में मामले की समीक्षा की गयी थी.

जिसमें कुछ अधिकारियों ने कार्रवाई करने की स्वीकृति दी. इसके बाद फिर से 10 जनवरी 2019 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की ओर से बोर्ड को अन्य साक्ष्य और दस्तावेज उपलब्ध कराये गये. जिसके बाद 25 अगस्त 2019 को बोर्ड की 40 वीं बैठक में अधिकारियों पर अभियोजन की स्वीकृति दी गयी.

बोर्ड के स्वीकृति के अनुसार उक्त तीन अधिकारियों पर धारा 420/120B, 201/353/379/467/468/471/109 और 39/44 दर्ज की गयी है.
फिलहाल उक्त मामले में बोर्ड स्वीकृति के पांच महीने बाद जीएम एचआर राकेश रोशन की ओर से भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को अभियोजन की स्वीकृति दी गयी. बता दें जिस वक्त निगरानी ने मामला दर्ज किया था तब राजीव रंजन मानव संसाधन ऊर्जा विकास में महाप्रबंधक के पद पर थे.

किन किन पर है आरोप

अमरनाथ झा, घोटाले के वक्त ये विद्युत आपूर्ति अवर प्रमंडल थे और टाटीसिलवे रांची में पदस्थापित थे. रिटारयमेंट के दिन इन्हें महाप्रबंधक का पद दिया गया. जबकि निगरानी में मामला दर्ज होने के बाद पदोन्नति नहीं दी जाती. इसके पहले भी इन्हें प्रमोशन दिया गया. फिलहाल ये रिटायर्ड है.

शिव शंकर झा, इस वक्त ये एमआरटी अवर प्रमंडल दो जूनियर इलेक्ट्रिकल इंजिनियर थे. मामला प्रकाश में आने के बाद इन्हें असिस्टेंट इलेक्ट्रिकल इंजीनियर बनाया गया. ये भी रिटायर्ड है.

हरेंद्र कुमार सिंह, विद्युत आपूर्ति अवर प्रमंडल टाटीसिलवे में असिस्टेंट इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे. ये लगातार प्रमोशन पाते रहे. फिलहाल ये दुमका बिजली बोर्ड में महाप्रबंधक हैं.

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