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आय, रोजगार और सुरक्षा के मामले में पूर्ण बहुमत और डबल इंजन वाली रघुवर सरकार फेल 

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Akshay Kumar Jha

किसी भी बहुमत वाली सरकार से तेजी से विकास की उम्मीद होती है. वजह होती है राजनीतिक स्थिरता. पांच साल बिना किसी उठा-पटक के सरकार चलाने के बावजूद अगर सुरक्षा, आय और रोजगार जैसे मामलों में राज्य पिछड़ता है, तो इसे सीधे सरकार से जोड़कर देखा जाना लाजमी है. झारखंड में 2014 दिसंबर से लेकर 2019 दिसंबर तक बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार रही. लेकिन पांच सालों तक एक ही नेतृत्व (रघुवर दास) में चलने के बाद अब जो परिणाम सामने आ रहे हैं, वो काफी डराने वाले हैं. इसकी पुष्टि और कोई नहीं बल्कि हाइकोर्ट और कैग (सीएजी) जैसी संवैधानिक संस्थाएं कर रही हैं.

पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास को पांच सालों तक लगातार विकास-विकास और सिर्फ विकास बोला जाते देखा गया है. रघुवर दास अपनी सरकार की विकास की बातें कहते थकते नहीं थे. विकास की बात कहते हुए रघुवर दास बार- बार कहते थे कि राज्य में डबल इंजन की सरकार है, जो विकास की पटरी पर दौड़ रही है. लेकिन नतीजे उनकी सरकार की नीतियों के फिसड्डी ही साबित हो रहे हैं.

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पांच सालों में राज्य की आमदनी 12% घटी

पिछले पांच सालों में राज्य की कुल आमदनी 50 फीसदी से गिरकर 38 फीसदी तक पहुंच गयी है. सरकार अगर 100 रुपए खर्च कर रही है तो उसमें सिर्फ 38 रुपए ही राज्य सरकार की है. बाकी 62 रुपए के लिए अब केंद्र पर निर्भर रहना पड़ रहा है. जबकि ऐसा पहले नहीं था. ये सारे आंकड़े कैग के हैं. विधानसभा में कैग की रिपोर्ट में इन बातों का उल्लेख है. रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य की आमदनी पिछले पांच सालों में लगातार घटी है.

2013-14 में राज्य सरकार अपने स्त्रोतों से 13132.50 करोड़ रुपए जुटा पायी थी. जबकि केंद्र की तरफ से 13004.29 करोड़ रुपए मिले थे. उस वक्त आमदी 50 फीसदी थी. लेकिन यह लगातार गिरी. 2014-15 में राज्य सरकार की आमद 14684.87 करोड़ हो गयी. जबकि केंद्र की तरफ से 16879.69 करोड़ मिले. आंकड़ा 50 फीसदी से घटकर 47 फीसदी हो गया. इसी तरह 2015-16 में घटकर 43, 2016-17 में 40 और 2017-18 में घटकर 38 फीसदी तक पहुंच गया.

हुआ सुरक्षा से समझौता

पूर्व रघुवर सरकार अपने कार्यकाल से ही नक्सलियों को उखाड़ फेंकने की बात करती आयी है. लेकिन कैग की रिपोर्ट में सामने आया है कि सरकार ने सुरक्षा के साथ समझौता किया है. कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि नक्सलियों से लड़ने के लिए सरकार की तरफ से जिन्हें प्रशिक्षण दिया गया, वो अधिक उम्र के थे.

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जिस वजह से 35 फीसदी पुलिसकर्मी यह प्रशिक्षण पास ही नहीं कर पाये. पुलिस को आधुनिक बनाने के नाम पर भी धोखा हुआ. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक, तत्कालीन सरकार ने वित्तीय वर्ष 2013 से 2018 के दौरान पुलिस आधुनिकीकरण के लिए 52.25 करोड रुपये का राज्यांश आवंटित नहीं किया. इतना ही नहीं केंद्र की तरफ से आधुनिकीकरण के नाम पर मिले 4.22 करोड़ भी सरकार खर्च नहीं कर पायी. जिस वजह से 2016 से 2018 के बीच केंद्र की तरफ से राज्य को 21.31 करोड़ रुपए नहीं मिले. जिसका असर यह हुआ कि 2013-18 के लिए बना एनुअल एक्शन प्लान लागू नहीं किया जा सका.

इससे पुलिस के पास अत्याधुनिक हथियारों की कमी हो गयी. अप्रैल 2013 तक जरूरत के मुकाबले हमारे पास 28 फीसदी कम अत्याधुनिक हथियार थे. लेकिन 2018 तक यह बढ़ कर 32 फीसदी हो गयी. कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2001 में सरकार ने 1000 पुलिसकर्मियों को बुलेटप्रूफ हेलमेट और जैकेट से लैस करने का फैसला लिया था. जांच में पाया गया कि 12 में से नौ बटालियन के पास सिर्फ 686 बुलेट प्रूफ जैकेट और 586 हेलमेट हैं.

जबकि जरूरत 900 बुलेट प्रूफ जैकेट और इतने ही हेलमेट की है. जैप-1 के पास 334 बुलेट प्रूफ जैकेट हैं. वहीं आठ दूसरे बटालियन के पास सिर्फ तीन से लेकर 57 बुलेट प्रूफ जैकेट ही हैं. जैप-6, एसटीएफ और सैप-1 के पास बुलेट प्रूफ जैकेट ही हैं.

रोजगार के साथ खिलवाड़

बेरोजगारी दूर करने के नाम पर रघुवर सरकार की तरफ से 2016 में एक रोजगार नीति बनायी गयी. 13 जिलों को अधिसूचित क्षेत्र घोषित कर दिया गया. अब इन जिलों में थर्ड और फोर्थ ग्रेड की नौकरी सिर्फ उसी जिले के बेरोजगारों को मिलेगी, ऐसा कानून बना दिया गया.

रघुवर सरकार के इस नियम को हाइकोर्ट ने गैरसंवैधामिक बताते हुए खारिज कर दिया. इस नीति को आधार मानते हुए सरकार की तरफ से कई नियुक्तियां हुईं. लेकिन कोर्ट की तरफ से शिक्षक निय़ुक्ति को छोड़कर बाकी नियुक्तियों को रियायत दी गयी है. कोर्ट के इस फैसले से 13 जिलों के 3684 शिक्षक फिर से बेरोजगार हो गये हैं.

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