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हो समुदाय के बीच है हेरो: पर्व की खास मान्यता

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Pravin Kumar

झारखंड आदिवासी समाज की विशिष्ट जीवनशैली व सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए जाना है. झारखंड के हो समुदाय की लोक जीवन की मान्यता संवैधानिक कानूनों के जरिये स्थानीय पांरपरिक स्वशासन व्यवस्था द्वारा संचालित हो रही है . इन्हीं प्रवधानों से हो समाज की जीविका भी संचालित होती है. हो समुदाय के लिए आज भी आजीविका का मुख्य साधन खेती है. इसी कारण समुदाय के त्योहार भी कृषि आधारित हैं. जिसमें हेरो: प्रमुख त्योहार रूप में मनाया जाता है. हो समुदाय के बसाहाट कोल्हान के इलाके में मॉनसून की बेरूखी के बाद भी जुलाई और अगस्त महीने में हेरो: पर्व को धूमधाम से मनाया जाता है.

हेरो: पर्व क्या है और कैसे मनाया जाता है

मागे और  बा जैसे बड़े त्योहारों के खत्म होने के बाद हेरो: पर्व मनाया जाता है. इस पर्व को जुलाई और अगस्त में मनाया जाता है. इसे ‘अरवा चावल पीठा’ वाला पूजा भी कहा जाता है. पीठा रुङ (गुंगू) के पते में पिसे हुए अरवा चावल को लपेटकर पकाया जाता है. अगली सुबह हंड़िया औऱ पीठा को गुंगू पत्ता में लपेटकर देवी-देवताओं व घर के पुरखों की आत्माओं के लिए चढ़ाया जाता है. पर्व की पहली रात को पीठा लपेटने के पहले अरवा चावल के घोल को कृषि औजरों पर छिड़का जाता है. कृषि उपकरणों को पवित्र किया जाता है और उड़द के दाल एंव भात से भरे पत्तल-दोना को सुप में रखकर गाय-बैलों को खिलाया जाता है.

कब से कब तक मनाया जाता है यह पर्व

यह पर्व प.सिंहभूम के गांवों मे  प्रमुखता से मनाया जाता है. इस पर्व को धान बुनाई से लेकर खर-पतवार हटाने तक मनाया जाता है. इस पर्व के साथ फसल की गर्भावस्था की मिथक  धारणा भी जुड़ी हुई है.

                  सीत लिङगी गाडा ताला रे

                  कुई होन गेले:ए हेड

(अर्थ- झरना, नदी-नाला के बीच खेलती युवतियां हरी-भरी फसल की गर्भावस्था को निहारती हुई खुशी-खुशी बरसात का आंनद ले रही हैं और कह रही हैं कि देवी मां इस वर्ष भी हमारी फसल को सफल बनाएं)

क्या है समुदाय की मान्यता

हो समुदाय के लोग जंगल को साफ करके खेत बनाए,  कृषि कार्य आरंभ किया और तरह-तरह के बीज बोये. एक दिन की बात है- माता जयरा ने किसानों से कहा कि हे मानव, आप जो हमें धूप में व कीचड़ में बोते हैं और कीड़े-मकोड़े, चींटी-पंछी चुग जाते हैं या घसीट कर ले जाते हैं, मैं आप सबों के बीच नहीं रह सकती. इतना कहकर जयरा रूठ कर जाने लगी. रूठ कर जाती जयरा को किसान मनाते हुए कहने लगे कि जयरा माता यदि आप रूठ कर चली गयीं तो हम मानव जाति जिंदा नहीं रह पायेंगे. बताइए मां हम आपकी सेवा कैसे करें. तब जयरा माता उपदेश देती हैं कि ग्राम देशाऊली के कहे अनुसार उनके नाम पर एक पाठा यानि बकरे की बलि दी जाए और मेरे नाम से खेत में काम करने जा रहे जानवरों (बैलों) को दाल-भात खिलाया जाए.

यह उपदेश सुनकर किसान काफी खुश हुए. खेत में धान बोने के पहले जयरा माता को मनाने के लिए एक केंदू कोसो की लकड़ी को खेत के बीच में खड़ा किया और एक साल के लिए मन्नत पूरा होने की खुशी में एक बकरे (पाठा) की बलि दी गयी. जिसके बाद से यह परंपरा आज तक कोल्हान में जीवित है.

पहले एक गांव में एक ही बकरे की बलि दिऊरी के द्वारा दी जाती थी और पूरा गांव पवित्र हो जाता था. लेकिन परंपरा में बदलाव होते हुए आजकल घर-घर में बकरे की बलि दी जा रही है. और अब इसी तरीके से यह पर्व मनाया जाता है.

आज भी इस पर्व को पवित्रता के साथ हर वर्ष मनाया जाता है. इसमें बिना नमक, गुड़, चीनी हल्दी के बिना  पीठा गुंगू पत्ता में पकाकर सभी देवी-देवताओं को चढ़ाया जाता है. पुरखों की आत्माओं को भी हड़िया व आरवा चावल का बना पीठा का चढ़ावा चढ़ाते हैं. देवी-देवताओं और पूर्वजों की आत्माओं की अराधना की जाती है. साथ ही इस पर्व के कई गीत भी गाये जाते हैं.

  गीत

            ओङ सिङबोंगा देशाउली महा बुरु

            पाउडी जयरा मां

            दुप्पुब दिशुम मरङ बोंगा

            लुकमी मां, तुड़सी मां

            निरल परची सपा सोतोय         

            हडम होड़ो को पे तना ले

            अले गुहारी तना, अले जुहार तना

            अपेया नुतुम गेले गुहारी जोहार तना

अनुवाद- सिंगबोंगा शिवाय सृष्टिकर्ता, अन्नदात्री जयरा माता, हमारे बुजुर्ग आप अदृश्य होते हुए और स्वर्गलोक में रहते हुए भी हमसे दूर नहीं हैं. आप सभी हमेशा हमारे घर में हमारी रक्षा के लिए तत्पर हैं. आप निराकर हैं. आपके द्वारा छोड़े हुए धरोहरों औऱ पर्व-त्योहारों के दस्तूर से आपका सम्मान करते हैं. भक्त के रूप में गुहार लगाते हैं, जोहार व अराधना करते हैं. हेरो: अगोम पर्व के 41 दिन पहले मन्नत मांगी जाती है और एक शपथ ली जाती है.

क्या है हेरो: अगांम की विधि

हेरो: अगांम के लिए घर का मुखिया मटका (लोटा) लेकर नदी नहाने जाता है. नहाने के बाद लोटा में पानी, एक लकड़ी और सवई घास के साथ बोआई खेत में जाकर इसे बांधता है. यह सब क्रिया उपवास रखकर की जाती है. वह मन्नत वाला जल डालते समय अराधना करता हैं कि हे ग्राम देवता, हे जंगल के देवी देवताओं कृषि के लिए खेत के बिचो-बीच आपके नाम से पानी डाल रहा हूं, मेरी फसलों की निगरानी आपके हाथ में है, जब तक चावल फसल तैयार ना हो जाए. इष्ट पुरखों के प्रचलन और रीति-रिवाजों के अनुसार अराधना करता हूं. आपकी भक्ति में बकरे (पाठ) की बलि और अरवा- चावल का पीठा निर्धारित समय पर चढ़ाऊंगा, इंतजार करना. जरूरत के हिसाब से बरसात और धूप देना भगवान. अगर अकाल करेंगे तो आप पर कौन विश्वास करेगा ? ऐसी अराधना करते हुए पानी निर्धारित स्थान पर डाल देता है.

घर पहुंचकर पुरखों की आत्मा के नाम पर डियांग, बांस की चकली पर रखे अरवा चावल और बकरे (पाठ) का नाम लेकर प्रार्थना करते हैं- हे पुरखों की पवित्र आत्माएं हमारी पूजा से प्रसन्न हों और हमारी पीढ़ी की हिफाजत करें. राह के कांटो और दुर्घटनाओं से बचाए रखना . इस तरह जंगल की लकड़ी, मटके में पानी और कांटो वाली घास को दूर खेत में लटका कर हेरो: पर्व का दिन हरेक वर्ष के लिए निश्चित कर दिया जाता है.

कहां पर की जाती है पर्व की पूजा

जिस स्थान पर धान बुआई के बाद मन्नत के रूप में पानी डाली जाती है उसी स्थान पर बकरे की पूजा कर बलि दी जाती है. इस स्थान पर बैलों को नाथ कर छोड़ दिया जाता है. इस स्थान पर हल के साथ-साथ कृषि औजारों और सामानों के दर्शन का रिवाज है. इसके बाद औजारों पर अरवा चावल एवं अबीर का लेप लगाया जाता है.  आरव चावल के भोग को पहले बलि के लिए तैयार पाठा को खिलाया जाता है. खिलाने के दरम्यान प्रकृति के सभी देवी देवताओं की पुकार दिऊरी के द्वारा की जाती है इसके उपरांत बकरे की बलि दी जाती है.  पूजा के दैरान और भी  कई विधियां की जाती है. जिस घर में बकरे की पूजा नहीं हुई होती है उस घर में कच्चा मांस प्रसाद के रूप में दिया जाता है. पूजा खत्म होने के बाद भोजन करके हंड़िया ग्रहण कर उपवास तोड़ा जाता है. हेरो: पर्व के मुख्य दिन घर के मुखिया और उसकी पत्नी उपवास रखती है. वहीं घर के बाकी सदस्य जंगल जाते हैं और तरोब की लकड़ी काटकर लाते हैं.

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