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वर्तमान पर टिप्पणी करती शिरोमणि महतो की कविता – जो मारे जाते हैं

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जो मारे जाते हैं

 

वे एक हांक में

दौड़े आते सरपट गौओं की तरह

वे बलि-वेदी पर गर्दन डालकर

मुंह से उफ्फ भी नहीं करते

बिलकुल भेड़ों की तरह

 

वे मंदिर और मस्जिद में

गुरुद्वारे और गिरिजाघर में

कोई फर्क नहीं समझते

उनके लिए वे देव-थान

आत्मा का स्नानघर होतें!

 

वे उन देव थानों को

बारुदों से उड़ाना तो दूर

उस ओर पत्थर भी नहीं फेंक सकते

वे उन देव थानों को

अपने हाथों से तोड़ना तो दूर

उस ओर ठेप्पा भी नहीं दिखा सकते

 

वे याद नहीं रखते

वेदों की ऋचाएं/कुरान की आयतें

वे केवल याद रखते

अपने परिवार की कुछेक जरुरतें

वे दिन भर खटते-खपते है-

तन भर कपडा़/सर पर छप्पर और पेट भर भात के लिए

 

वे कभी नहीं चाहते

सता की सेज पर सोना

क्योंकि वे नहीं जानते

राजनीति का व्याकरण

भाषा के भेद

उच्चारणों का अनुतान

 

हां !

वे रोजी कमाते हैं

रोटी पकाते हैं

और चूल्हे में

रोटी सेंकते भी हैं

लेकिन वे नहीं  जानते

आग से दूर रहकर

रोटी सेंकने की कला!

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