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हिंदी के विख्यात आलोचक और साहित्यकार नामवर सिंह नहीं रहे

नामवर सिंह के छोटे भाई काशीनाथ सिंह ने कहा था कि हिंदी आलोचकों में भी ऐसी लोकप्रियता किसी को नहीं मिली जैसी नामवरजी को मिली.  

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NewDelhi : हिंदी के विख्यात आलोचक और साहित्यकार नामवर सिंह  नहीं रहे. वे 92 वर्ष के थे. उन्होंने दिल्ली के एम्स में आखिरी सांस ली.  एएनआई के अनुसार नामवर सिंह ने मंगलवार रात 11.51 बजे अंतिम सांस ली. बता दें कि नामवर सिंह पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे. बताया गया है कि जनवरी में नामवर सिंह अचानक अपने कमरे में गिर गये थे. इसके बाद उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ले जाया गया था. यहीं उनका इलाज चल रहा था. हिंदी में आलोचना विधा को नई पहचान देने वाले नामवर सिंह का जन्म बनारस के जीयनपुर गांव में हुआ था.

आज बुधवार दोपहर लोधी रोड स्थित श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार होगा.  वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने उनके निधन पर ट्वीट लिखा, हिंदी में फिर सन्नाटे की खबर. नायाब आलोचक, साहित्य में दूसरी परम्परा के अन्वेषी डॉ नामवर सिंह नहीं रहे. मंगलवार को आधी रात होते-न-होते उन्होंने आखिरी सांस ली. कुछ समय से एम्स में भर्ती थे. 26 जुलाई को वह 93 के हो जाते;  उन्होंने अच्छा जीवन जिया, बड़ा जीवन पाया.  नतशीश नमन.

जेएनयू में भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना की

हिंदी साहित्य में एमए व पीएचडी करने के बाद नामवर सिंह ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में पढ़ाया. इसके बाद वे दिल्ली आ गये थे. यहां उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना की. नामवर सिंह की शख़्सियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले साल उनके जन्मदिन के उपलक्ष्य में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित नामवर संग बैठकी कार्यक्रम में लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी ने उन्हें अज्ञेय के बाद हिंदी का सबसे बड़ा स्टेट्समैन कहा था. उस कार्यक्रम में नामवर सिंह के छोटे भाई काशीनाथ सिंह ने कहा था कि हिंदी आलोचकों में भी ऐसी लोकप्रियता किसी को नहीं मिली जैसी नामवरजी को मिली.

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