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374 करोड़ का भारी-भरकम बजट, फिर भी एम्स जैसी सुविधा उपलब्ध कराने में नाकाम रिम्स

गरीब-गुरबों के उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा राज्य का सबसे बड़ा हॉस्पिटल

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Chandan Choudhary

Ranchi : झारखंड का सबसे पुराना चिकित्सा संस्थान राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान अपनी ही बदहाली के आंसू रो रहा है. वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए रिम्स के लिए 374 करोड़ का भारी-भरकम बजट प्रस्तुत किया गया था. यहां पर मेडिकल की पढ़ाई के अलावा 15 सौ बेड का अस्पताल भी है, जो गरीब-गुरबों के इलाज के लिए है. स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा विभाग की ओर से रिम्स के लिए सलाना बजट का प्रावधान दिया जाता है, जिसे शासी निकाय की तरफ से खर्च की अनुमति मिलती है.

शासी निकाय में विभाग के मंत्री, विभाग के सचिव समेत रिम्स के निदेशक महत्वपूर्ण पदधारी होते हैं, जिनका निर्णय विभाग को भेजा जाता है. इतना सब कुछ होने के बाद भी रिम्स में अव्यवस्था, सुरक्षा की भारी कमी, बिचौलियों की भरमार और गंदगी का आलम हमेशा व्याप्त रहता है. यहां बड़े राजनेताओं और पैरोकारों को विशेष चिकित्सकीय सुविधाएं मिलती हैं. लेकिन आम व्यक्ति बेहतर इलाज की आस में टकटकी लगाये रहता है. रिम्स परिसर में कैंसर का अलग यूनिट स्थापित किया गया है, जो चिकित्सकों के इंतजार में बेजार साबित हो रहा है. वहीं दंत चिकित्सा विभाग में डेंटल की पढ़ाई अब तक शुरू नहीं हो पायी है. कहने को फार्मेसी और अन्य पाठ्यक्रमों के लिए भी हर वर्ष हामी भरी जाती है.

नये चिकित्सक आना नहीं चाहते

झारखंड बनने के बाद से जो भी मुख्यमंत्री बना रिम्स की बदहाली को सुधारने का दावा किया गया. रिम्स में एम्स के तर्ज पर सभी सुविधा देने की भी घोषणा की गई, लेकिन एक भी घोषणा को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका. अब भी एक अरब से अधिक की आधारभूत संरचना विकसित करने के लिए शासी निकाय को सफलता नहीं मिल पायी है. वहीं अत्याधुनिक चिकित्सा उपकरणों के लिए भी 115 करोड़ रुपये खर्च किये जाने हैं. इसके लिए निविदा-दर-निविदा बार-बार निकल रही है, रद्द हो रही है. वहीं मंगलवार को हुई कैबिनेट की बैठक में रिम्स को 120 करोड़ रुपए और देने के प्रस्ताव को स्वीकृति मिल चुकी है.

न दवा, न मशीन और न ही योजनाएं हो रही पूरी

रिम्स हॉस्पिटल में दवा की समस्या सालों भर बनी रहती है. हॉस्पिटल के दवा वितरण केंद्र पर कभी भी 20-22 प्रकार की दवाईयों से ज्यादा उपलब्ध नहीं रहता. जबकि सिर्फ दवाईयों पर ही 19 करोड़ रुपए खर्च करने का दावा किया गया था. स्वास्थ्य मंत्री ने भी 300 प्रकार की दवाईयां उपलब्ध कराने की बात कही थी. यह भी सिर्फ कागजों में ही सिमट कर रह गया. रिम्स के बजट में इमरजेंसी में भर्ती होने वाले मरीजों को नि:शुल्क दवा देने की बात कही गयी थी, इसका भी कहीं पालन होता नजर नहीं आ रहा.

वहीं बजट में मशीनों की खरीदारी के लिए 115 करोड़ रुपए खर्च करने की बात कही गयी थी. लेकिन नया मशीन खरीदना तो दूर पूराने मशीन भी रखरखाव की कमी के कारण खराब हो रहे हैं. मेमोग्राफी से लेकर डिस्पेंशर तक की कई मशीनें खराब पड़ी है. कंस्ट्रक्शन के लिए भी 112 करोड़ रुपए की सहमती मिली थी. लेकिन अब तक कोई भी कंस्ट्रशन पूरा नहीं हो पाया है. आंकोलॉजी विभाग बन कर तैयार है, लेकिन डॉक्टरों की कमी के कारण इसे आरंभ नहीं किया जा रहा है. हॉस्टल निर्माण कार्य भी बिजली की कमी के कारण अधूरा पडा है.

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