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बाल विवाह के खिलाफ घर से शुरू हुई लड़ाई, समाज से खत्म करने का संकल्पः रुमी

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Md. Asghar Khan

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Ranchi: राजधानी रांची से करीब 35 किमी दूर बुडमो प्रखंड के पाहन टोली में एक किसान की बेटी ने संकल्प लिया कि समाज से बाल विवाह जैसी कुप्रथा को समाप्त करना है. लेकिन इसके खिलाफ उसे अपने घर सी बगावत का बिगुल बजाना पड़ा. एक बच्ची जो खेलने-कूदने की उम्र में किसी के घर का बर्तन-बासन और झाड़ू-पोछा करने लगती है. दस साल की उम्र तक घर वाले शादी की तैयारी करने लगते हैं. लेकिन उसे पढ़ाई करनी थी, बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई लड़नी थी.

ये कहानी 21 वर्षीय रूमी कुमारी की है, जिसने बाल विवाह के विरुद्ध जंग छेड़ रखी है. गांव-गांव बाल विवाह के खिलाफ सघन अभियान चला रही है. झारखंड में बाल विवाह की समस्या सरकार के लिए एक चुनौती है. और इसके उन्मूलन को वो अपनी प्राथमिकता बताती है, जिसका जिक्र सूबे के मुख्यमंत्री रघुवर दास और विभागीय मंत्री लुईस ने मरांडी ने कई बार किया है. राज्य में होने वाली शादियों में बाल विवाह का प्रतिशत 38 बताया जाता है. जबकि दस साल पहले राज्य में ये 62 प्रतिशत था.

संघर्ष के बाद सम्मान

रूमी रांची के एक कॉलेज से पॉलिटिक्ल साइंस से बीए कर रही है. उसका उद्देश्य राज्य से बाल विवाह को मिटाने में सरकार की सहायता करना है. रुमी के मुताबिक, ये तभी संभव है जब ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर बढ़ेगा. शिक्षा को हथियार की तरह इन क्षेत्रों में इस्तेमाल करना पड़ेगा.

झारखंड में बाल विवाह एक बड़ी समस्या है. सरकार इसके रोकथाम के लिए कई एनजीओ के साथ मिलकर काम कर रही है. बाल विवाह के मामले में झारखंड देश का चौथा प्रदेश है. और यहां के गांवों में ही 80 प्रतिशत से अधिक बाल विवाह होता है.
रुमी अपने संघर्ष के दिन को याद करते हुए कहती हैं, “मैं आठ साल की थी तब मेरी पढ़ाई छुड़वाकर मुझे पहले पटना फिर सिमडेगा में नौकरानी का काम करने के लिए लगा दिया गया.

परिवार बड़ा था और गरीबी इससे कहीं अधिक बड़ी थी. लेकिन वहां वे लोग झाड़ू-पोछा, बर्तन-बासन करवाते थे. साथ ही साथ प्रताड़ित भी करतें. मैं घर आ गई तो यहां मेरी शादी के लिए लड़का देखा जाने लगा. मैंने शादी से मना कर दिया. कहा, पढ़ाई करनी है, लेकिन घर वालों का साथ नहीं मिला. तभी मैं खुद कस्तुरबा गांधी बालिका विद्लाय बुडमो गई और अपने एडमिशन की बात की. शुरू में तो वे लोग एडमिशन नहीं ले रहे थे, लेकिन बाद में मेरा एडमिशन हो गया. हॉस्टल में रहकर पढ़ाई करने लगी, तो परिवार का साथ भी मिलने लगा.”

रूमी ने बाल विवाह के खिलाफ सैकड़ों लड़कियों को एकजुट किया है. इसके खिलाफ उनके संघर्ष को देखते हुए उन्हें पिछले महीने ही ‘अशोका यूथ वेंचर अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है. फिलहाल रूमी पढ़ाई के साथ-साथ विकास भारती बिशुनपुर, बरियातू में काम भी करती हैं.

वो बताती हैं कि इंटर करने के बाद सेव द चिल्ड्रेन और विकास भारती संस्था के सहयोग से वैसे बच्चे और बच्चियों का स्कूल में एडमिशन करवाती हैं, जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी. ऐसा करने का मकसद है कि उन्हें शिक्षा की तरफ लाएंगे तो बाल विवाह के खिलाफ वो खुद खड़ी होंगी.

रूमी बाल विवाह खिलाफ मिसाल

झारखंड में 31 प्रतिशत लड़कियों की पढ़ाई छुड़वाकर उनकी शादी करवा दी जाती है. इन लड़कियों की शादी की औसत आयु 15 साल होती है. ‘सेव द चिल्ड्रेन’ की सौमी गुहा हलदर बताती हैं कि राज्य में हो रहे बाल विवाह का ग्राफ गिरा है. लेकिन बावजूद इसके यह एक बड़ी समस्या बनी हुई है. ‘सेव द चिल्ड्रेन’ सरकार के साथ मिलकर इसके रोकथाम के लिए काम कर रही है. फिलहाल विलेज चाइल्ड प्रोटक्शन कमिटी के तहत गुमला और पश्चिमी सिंहभूम जिला के पंचायतों में अभियान चलाया जा रहा है. खास बात यह है कि इसके तहत बच्चियों को जोड़ा जा रहा है. इन्हें जीवन कौशल प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

सौमी कहती हैं, रुमी उन लड़कियों में एक मिसाल है जिसने बाल विवाह खिलाफ लड़ाई अपने घर से शुरु की. आज रुमी जैसी लड़कियों की जरूरत है ताकि इसके विरुद्ध आवाज उठाई जाए. रूमी की तरह ही कविता, लक्ष्मी और रेशमा आदि भी बाल विवाह को रोकने के लिए काम कर रही हैं. गांवों में लड़कियों को इसे लेकर जागरुक और शिक्षा से जोड़ रही हैं.

रूमी ने कस्तूरबा विद्यालय से बारहवीं तक की पढ़ाई की. इसी दौरान उसने ये ठान लिया कि गांव की लड़कियों को शिक्षा के प्रति प्रेरित करेंगी. रुमी दो भाई और छह बहनों में इकलौती स्नातक करने वाली है. दोनों भाई ने इंटर तक पढ़ाई करके छोड़ दी, जबकि बहनों में रूमी को छोड़ कोई आठवीं तक भी नहीं पढ़ी हुई है. फिलहाल वो पार्टनरशिप फॉर मैटरनल न्यू बोर्न एंड चाइल्ड हेल्थ सबमिट (पीएमएनसीएच) बतौर वक्ता झारखंड का प्रतिनिधित्व करने दिल्ली गई हैं.

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