Year 2020 Overview

एक कोरोना ने हजारों साल पुरानी परंपराओं को झटके में बदल डाला

  • कोरोना काल में पता चल पाया सात लाख प्रवासी मजदूरों के बारे में

Ranchi: वैश्विक महामारी कोरोना वायरस का असर वर्ष के शुरुआत से लेकर अभी तक देखा जा रहा है. नया साल आने की दलहीज पर है लेकिन कोरोना अभी भी नहीं जाने की जिद पर अड़ा है. झारखंड में कोरोना ने कई लोगों की जिंदगी बदल डाली. एक ओर जहां दफ्तर से लेकर स्कूल-कॉलेज के काम में बदलाव आया वहीं दूसरी ओर कोरोना के नाम पर बेरोजगारी भी बढ़ती रही.

कोराना का वायरस लोगों के शरीर के साथ-साथ नौकरियों में आता दिखा. कोरोना से जीवनशैली में कई बदलाव हुए. इसका असर पूजा-पाठ में भी देखने को मिलता रहा. इसी क्रम में पूर्वी भारत का सबसे बड़े पर्व नवरात्र के दौरान भक्तों को मंदिरों में माता के प्रसाद से भी दूर रहना पड़ा. पंडालों में 50 से अधिक लोगों के जाने पर पाबंदी लगा दी गयी. पूरे साल कोई भी धार्मिक जुलूस नहीं निकल पाया. मंदिरों को अभी खोला जा रहा है लेकिन यहां भी 50 लोगों से अधिक की इंट्री बंद है.

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कोरोना की छाप हर धर्म पर दिखी. शायद यही कारण रहा कि जो परंपरा हजारों वर्षों से बदल नहीं सकी उसे कोरोना ने महज नौ माह में बदल दिया. अभी दिसंबर तक 1.15 लाख कोरोना पॉजिटिव मरीज मिल चुके हैं. अब भी लोग इसके डर से इस तरह भयभीत हैं कि वे भी सभी पारंपरिक नियमों को छोड़ अपनी जान बचाने को प्राथमिकता दे रहे हैं और कोविड गाइडलाइन का पालन करते दिख रहे हैं.

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कोरोना काल के कारण आज सभी मास्क, सैनिटाइजर, सोशल डिस्टेंस के साथ जी रहे हैं, जो शायद अगले कई वर्षों तक जीवन का अहम हिस्सा बना रहेगा.

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करीब सात लाख प्रवासी मजूदर लौटे झारखंड, सरकार को मिला आंकड़ा

कोरोना काल में राज्य में प्रवासी मजदूरों की संख्या में बेहताशा वृद्धि हुई. आखिरकार सरकार को इसी काल में पता चल पाया कि करीब सात लाख प्रवासी मजदूर अपने राज्य के हैं. मजदूरों की संख्या एकजुट करने के लिए सरकार के हर विभाग ने गणना शुरू कर दी.

आखिरकार करीब सात लाख प्रवासी मजदूरों का डाटा तैयार हुआ. शुरुआत में सभी राज्यों से प्रवासी मजदूरों को वापस लौटने के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराने को कहा गया, जिसके बाद हजार, दो हजार व पांच हजार की संख्या में मजदूर लौटने लगे. कई मजदूरों ने तो हजारों किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय कर डाली.

सरकार अब ऐसे प्रवासी मजदूरों को रोजगार देने की कवायद भी शुरू कर दी है ताकि उन्हें बाहर काम की तलाश में दोबारा नहीं जाना पड़े. लेकिन इसके बाद भी श्रम विभाग ने ऐसे जाने वाले श्रमिकों को भरोसा दिलाया गया कि वे जिस कंपनी में काम करने जायेंगे उन्हें वहां सरकार द्वारा सुविधा मुहैया करायी जायेगी. साथ ही उस कंपनी से तालमेल बिठाया जायेगा.

अस्पतालों में कम होते गये मरीज, ऑनलाइन इलाज की हुई शुरुआत

कोरोना वायरस का खौफ इतना रहा कि अस्पतालों में भर्ती मरीज तक अस्पताल छोड़ जाने लगे. रिम्स जैसे बड़े सरकारी अस्पताल में जहां मरीज बेड से भी अधिक करीब 1700 के आसपास इलाजरत होते थे उनकी संख्या इस दौरान 50 तक भी नहीं थी.

बीच माह में बढ़ते संक्रमितों की वजह से ओपीडी सेवाएं बंद कर दी गयीं, फिर शुरू हुई एक नयी ऑनलाइन सेवा। शायद जो डॉक्टर फोन पर इलाज नहीं करने की सलाह देते थे वही इस कोरोना काल में ऑनलाइन मरीजों को सलाह देते रहे. यहां तक की उन्हें दवाएं लेने की जानकारी भी ऑनलाइन देते रहे.

अस्पतालों में सन्नाटा छाने लगा और घरों से ही लोग डॉक्टरी सलाह लेने लगे. इस बीच कई मोबाइल ऐप लॉन्च हुए जिससे लोगों की जीवनशैली बदल गयी. जो मोबाइल से दूरी बनाते थे वो भी मोबाइल से दोस्ती करने लगे.

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दफ्तरों ने बदली अपनी परंपरा, घर से काम करने का नया अविष्कार

ऑफिसों से काम करने की कभी बंद नहीं होने वाली परंपरा एक झटके में समाप्त हो गयी. हजारों कर्मचारी ऑफिस छोड़ घरों से काम करने लगे. इसका परिणाम भी काफी दिलचस्प रहा. घरों से काम करने का आउटपुट पहले की अपेक्षा काफी अधिक रहा.

एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक कंपनियों को 20-30 प्रतिशत तक अधिक परिणाम मिलने लगे थे. कंपनियां भी वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने लगी और यह एक ऐसा अविष्कार हुआ जो शायद काम करने के पूरे सिस्टम को ही बदल डाला.

गरीबों के लिए भी होती रही तैयारी

लॉकडाउन में सबसे अधिक दैनिक मजदूर प्रभावित हुए जिसके लिए सरकार की ओर से निःशुल्क भोजन की व्यवस्था की गयी. उन्हें पहले कोरोना से बचाव के तरीके बताये गये और फिर उन्हें नवंबर माह तक निःशुल्क अनाज और खिचड़ी की व्यवस्था की गयी.

इस बीच कालाबाजारी जैसे अपराध में भी बढ़ोतरी हुई. पूरे राज्य से करीब 80 हजार शिकायतें भोजन को लेकर विभाग के पास पहुंची जो सरकार के लिए चुनौती बनी हुई है.

खेती पर पड़ा असर

कोरोना काल में खेती पर काफी बुरा असर पड़ा. सबसे अधिक सब्जियों की खेती से जुड़े करीब 18 लाख किसानों को नुकसान उठाना पड़ा. इस काल में जो सब्जियां किसानों के लिए आय का साधन होती थी वही सब्जियां कौड़ी के भाव भी नहीं बिकीं.

आम लोगों की चांदी रही, लेकिन लाचार किसानों को कोई राहत नहीं मिल सकी. स्थिति यह थी कि किसानों ने हजारों क्विंटल सब्जियां खेतों में ही छोड़ दी या जानवरों का चारा बना दिया. उन्हें सरकार की ओर से करीब अगस्त के बाद राहत देने की शुरुआत हुई जिसके बाद झारखंड के किसानों की सब्जियों को दुबई तक भेजा गया.

लेकिन इसके बाद कोई बड़ी राहत नहीं मिल सकी. हालांकि बीच में वेजफेड के माध्यम से किसानों की सब्जियों की होम डिलिवरी करने का काम जरूर सफल रहा, जिससे किसानों को कुछ राहत जरूर मिल सकी.

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