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झारखंड में एमपी फंड का 84.81 प्रतिशत ही खर्च, 14 सांसदों को मिले 350 थे करोड़

52.50 करोड़ से अधिक राशि खर्च नहीं हो सकी, 16वीं लोकसभा का टर्म भी हुआ पूरा

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  • देश भर में सांसद विकास निधि के लिए मिले 12051.36 करोड़, खर्च नहीं हो सके 1806.03 करोड़ रुपये
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Ranchi: झारखंड में सांसद विकास निधि (एमपी लैड) फंड का 84.81 फीसदी ही इस्तेमाल हो सका है. राज्य के 14 सांसदों (16वीं लोकसभा) को सांसद निधि के तहत 350 करोड़ रुपये 2014 से 2019 मार्च तक मिले.

इसमें से 52.50 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो सके. राज्य में गोड्डा सांसद निशिकांत दुबे ने सबसे कम 4.32 करोड़ ही अपने सांसद निधि का खर्च किया.

धनबाद के सांसद पीएन सिंह ने सबसे अधिक 17.79 करोड़ खर्च किये, वहीं जमशेदपुर के विद्युतवरण महतो ने 17.25 करोड़, कड़िया मुंडा ने 16.87 करोड़, शिबू सोरेन ने 16.36 करोड़, सुनील सिंह ने 15.29 करोड़ रुपये खर्च किये. सांसद निधि फंड में औसत खर्च 18.02 करोड़ रहा है.

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देश भर में रामा किशोर सिंह ने खर्च की सबसे अधिक राशि

देश भर में वैशाली (बिहार) के सांसद रामा किशोर सिंह ने सबसे अधिक सांसद निधि की राशि खर्च की. इनके अलावा नागालैंड के नेईफू रियो, चांदनी चौक दिल्ली के सांसद हर्ष वर्द्धन, तुरा (नागालैंड) की कोनार्ड संगमा, चेन्नई नार्थ के टेजी वेंकटेश बाबू और साबरकंठा गुजरात के दीप सिंह राठौड़ ने सबसे अधिक फंड का उपयोग किये. इन सभी सांसदों ने अपने फंड का 99.81 फीसदी राशि खर्च की.

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देश भर में 542 सांसदों को मिले थे 12051.36 करोड़

देश भर में 16वीं लोकसभा के निर्वाचित सांसदों को अपने संसदीय क्षेत्र के विकास के लिए 12051.36 करोड़ मिले थे. इनमें से 1806.03 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो पाये. देश में औसतन 85 फीसदी ही सांसद निधि राज्यों में खर्च की जा सकी.

दिल्ली में सांसद निधि के तहत 134.47 करोड़ में से 122.9 करोड़ खर्च किये गये. मेघालय में 43.68 करोड़ में से 40.26 करोड़ रुपये खर्च किये गये. सिक्किम में 22.23 करोड़ में से 20.16 करोड़ खर्च हुए.

गोवा में सांसद निधि का 22.54 फीसदी राशि ही खर्च हो सका. राजस्थान में 531.05 करोड़ रुपये में से 20 से अधिक सांसदों ने 113.97 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो सके.

किस राज्यों में कितना हुआ एमपी फंड का इस्तेमाल

राज्यखर्च का प्रतिशत
बिहार86.22 फीसदी
गुजरात91.20 फीसदी
झारखंड84.81 फीसदी
उत्तराखंड82.18 फीसदी
हिमाचल प्रदेश84.76 फीसदी
पंजाब81.59 फीसदी
राजस्थान78.54 फीसदी
मेघालय92.17 फीसदी
अरुणाचल प्रदेश88.28 फीसदी
नागालैंड89.97 फीसदी
हरियाणा83.97 फीसदी
मध्यप्रदेश86.28 फीसदी
महाराष्ट्र83.23 फीसदी
कर्नाटक85.25 फीसदी
केरल86.16 फीसदी
आंध्रप्रदेश84.33 फीसदी
तेलांगना85.7 फीसदी
छत्तीसगढ़86.8 फीसद
पश्चिम बंगाल86.58 फीसदी
मणिपुर87.76 फीसदी
मिजोरम87.61 फीसदी

 

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