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80 बच्चों के बालाश्रय को नहीं मिल रहा सरकारी फंड, अब खुद के लिए श्रम कर रहे बच्चे

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Chhaya

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Ranchi: बाल हिंसा, बाल मजदूरी, बाल विवाह आदि समस्याओं के निदान के लिए सरकार विभिन्न योजनाएं बनाती है, लेकिन किसी भी योजना का असर धरातल पर नहीं देखा गया. राज्य में कई ऐसे बालाश्रय हैं, जो बच्चों के इन्हीं समस्याओं के खिलाफ से लड़ रहे हैं. इन्हीं में से एक टुपुदाना भुसूर स्थित आशा सेंटर (एसोसिएशन फॉर सोशल एंड ह्यूमन अवॉयरनेस) है. सरकार की ओर से सेंटर का निबंधन बालाश्रय चलाने के लिए हो तो गया, लेकिन सरकार की ओर से किसी तरह का फंड इन्हें नहीं दिया गया है. बालाश्रय में सुदूर गांवों के फिलहाल लगभग 80 बच्चे हैं. जिनके रख- रखाव की पूरी जिम्मेवारी आशा सेंटर ने ले रखी है. कई बच्चे यहां ऐसे भी हैं जिन्हें मंदिरों, सड़कों आदि से उठा कर लाया गया है. सरकार की ओर से किसी तरह की सहायता नहीं मिलने पर अब सेंटर मुसीबत के दौर से गुजर रहा है.

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व्यक्तिगत दान से चल रहा सेंटर

सेंटर के फाउंडर अजय जायसवाल ने बताया कि पिछले चार साल से सेंटर व्यक्तिगत दान से चल रहा है. कई संस्थाओं की ओर से भी राशन आदि भेजा गया है, लेकिन बच्चों की संख्या अधिक है और ऐसे में सीमित राशन में बच्चों का भरण पोषण करना संभव नहीं है. उन्होंने बताया कि दिन का भोजन का अधिकांश बच्चे स्कूल में मिलने वाले ‘मिड डे मील’ से कर लेते हैं. फिलहाल मिड डे मील भी बच्चों को नहीं मिल रहा.

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ईट भठ्ठों से लाया है बच्चों को

सेंटर के अजय जायसवाल ने बताया कि आशा एनजीओ के तहत आशा सेंटर की स्थापना की गयी है. विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर काम करते हुए संस्था के सदस्यों को लगा कि बच्चों के लिए भी कुछ करना चाहिये. ऐसे में साल 2009 से 2011 तक सदस्यों ने गुमला, लोहरदगा जैसे जिलों के ईंट भठ्ठों में रह कर बच्चों और मजदूरों को शिक्षित करने का काम किया, इस दौरान सदस्यों को लगा कि इन बच्चों को एक आश्रय की जरूरत है. जहां रखकर इन्हें शिक्षित किया जा सके. ऐसे में इन बच्चों के साथ 2011 में सेंटर की शुरूआत की गयी. इसके साथ ही यहां मंदिरों, सड़कों आदि सार्वजनिक स्थानों पर पड़े बच्चों को भी रखा गया है.

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एक बच्चे पर प्रतिदिन 40-45 रुपये खर्च

अजय ने बताया कि एक बच्चे पर प्रतिदिन कम से कम 40 से 45 रुपये का खर्च है. जिसमें बच्चों के दैनिक उपयोगी वस्तुएं, पेन पेंसिल, कॉपी-किताब, खान-पान शामिल हैं. इन सबके अलावा बच्चों के कपड़े आदि भी बच्चों की जरूरत है. जिसके लिए सेंटर को अब सोचना पड़ रहा है. साल 2014-15 में यूनिसेफ की ओर से सेंटर को फंड दिया गया था, लेकिन उसके बाद से किसी तरह की सहायता सेंटर को नहीं मिली.

कई स्तरों पर लिखा गया पत्र

सेंटर की ओर से बालाश्रय चलाने के लिए फंड की मांग के लिए कई स्तरों पर पत्र लिखा गया है. साल 2017 में झारखंड राज्य बाल सरंक्षण सोसायटी के निदेशक सह सदस्य सचिव ने सेंटर का चुनाव बालाश्रय चलाने के लिए किया. जिसके साथ ही सेंटर को फंड देने की बात कही गयी थी. अब सेंटर को 2017 से किसी तरह का फंड नहीं मिला है. जबकि इसके लिए बाल संरक्षण समीति, उपायुक्त रांची आदि को पत्र लिखा जा चुका है. अजय ने बताया कि उपायुक्त के अनुशंसा के बाद सेंटर को फंड मिल जायेगा, लेकिन इस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा. बता दें कि कई सरकारी पदाधिकारियों, बाल संरक्षण आयोग आदि की ओर से कई बार सेंटर का भ्रमण किया गया है.

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खुद के लिए काम कर रहे हैं बच्चे

अब सेंटर की स्थिति ऐसी है कि बच्चों को स्कूल से आने के बाद खुद के लिए श्रम करना पड़ रहा है. सेंटर की ओर से पहले से इन बच्चों को आर्ट एंड क्राफ्ट का प्रशिक्षण दिया जा रहा था. अजय ने बताया कि इसी का उपयोग कर सेंटर के सदस्य और बच्चे मिल कर इस बार दिवाली के लिए दीये बना रहें हैं. जिन्हें बाजार में बेचा जायेगा और दिवाली समेत अन्य खर्च निकाले जायेंगे.

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