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60 अर्थशास्त्रियों ने फाइनेंस मिनिस्टर अरुण जेटली को लिखा पत्र

New Delhi : देश के आगामी बजट 2018-19 को लेकर 60 अर्थशास्त्रियों ने फाइनेंस मिनिस्टर अरुण जेटली के नाम एक पत्र लिखा है. पत्र के माध्यम से अर्थशास्त्रियों ने जेटली को सलाह दी है कि देश के आगामी बजट में दो बिंदुओं को खास तौर पर प्राथमिकता दी जाये. यानि कि उनमें बदलाव किये जायें. जो देशहित में हैं और जिसके दूरगामी अच्छे परिणाम आयें. पत्र में जिन दो मुद्दों पर जिक्र है, उसमें सामाजिक सुरक्षा पेंशन और मातृ भत्ता है. इनमें बदलाव की बेहद जरूरत है.

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वृद्धापेंशन की राशी 200 से बढ़ाकर 500 की जाये

अर्थशास्त्रियों ने लिखा है कि, इसके तहत भारत सरकार की ओर से साल 2006 से ही वृद्धा पेंशन 200 रूपये दिया जाता है. जो आज के हिसाब बहुत कम है, जबकि यह योजना समाज के पिछड़े और गरीबों तक पहुंचती है. साथ ही इसमें चोरी के साथ ही प्रशासनिक खर्च भी कम है. इसलिए वृद्धा पेंशन की राशि को बढ़ाकर 500 रूपये कर देना चाहिए. इस पर बढ़ा हुआ खर्च अतिरिक्त 8,640 करोड़ रूपये ही होगा और इस योजना का लाभ देश भर में 2.4 करोड़ वृद्ध उठाते हैं. इसी प्रकार पत्र में विधवा पेंशन की राशि जो वर्तमान में 300 रूपये दी जाती है, उसे बढ़ाकर 500 रूपये करने का आग्रह किया गया है. साथ ही यह भी बताया गया है कि इससे सरकार पर अतिरिक्त खर्च मात्र 1,680 करोड़ ही आयेगा.

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संगठित क्षेत्र में काम कर रही हर को महिला मातृत्व भत्ता का अधिकार

अर्थशास्त्रियों ने इस मुद्दे पर भी पत्र में जिक्र किया है. केंद्र से आग्रह किया है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून 2013 के तहत संगठित क्षेत्र में काम रही हर महिला को छह हजार रूपये मातृत्व भत्ता का अधिकार है. लेकिन तीन साल बीतने के बाद भी सरकार ने इसपर कुछ नहीं किया. हालांकि 31 दिसंबर 2016 को पीएम ने घोषणा की थी कि जल्द ही मातृत्व भत्ता दिया जायेगा. इस प्रावधान के तहत बनी नयी योजना प्रधानमंत्री मातृत्व योजना अब तक लागू नहीं हो पायी है. जबकि केंद्र ने 2017-18 के बजट में इसके लिए 2,700 करोड़ राशि आवंटित किया था, जो आवश्यक राशि का मात्र एक तिहाई ही है. इस योजना पर पत्र में आग्रह किया गया है कि 2018 -19 के बजट में खाद्य सुरक्षा कानून के प्रावधानों के अनुसार पूरी तरह से मातृत्व भत्ता लागू करने के लिए राशि आवंटित होनी चाहिए. जिसके लिए सरकार को कम से कम 8 हजार करोड़ रूपये की आवश्यकता होगी. जिसमें खर्च केंद्र और राज्य के बीच 60:40 के अनुपात में बंटेगा.

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