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प्रदेश के 39 लाख किसान बेहाल, 10 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि हो गई है अम्लीय

इस साल बिहार, पंजाब और छत्तीसगढ़ पर रहना होगा निर्भर, बाहर से मंगाना पड़ सकता है 125 करोड़ का अनाज

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 Ravi Aditya

RANCHI: राज्य गठन से लेकर अब तक 18 साल में 14 साल किसान धोखा खा चुके हैं. कृषि विभाग अब तक किसानों का दर्द भी नहीं समझ पाया है. हर साल सुखाड़ का सामना करने के लिये पैकेज की मांग की जाती है, लेकिन स्थायी निदान का कोई ठोस उपाय अब तक नहीं हो पाया है. प्रदेश की 10 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि की मिट्टी अम्लीय हो गई है. इसमें उत्पादन की संभावना नहीं के बराबर है. जिससे कृषि उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है. प्रति किलोग्राम 130 केजीएमपी प्रति हेक्टेयर होना चाहिये, जबकि झारखंड में प्रति हेक्टेयर 60 केजीएमपी है. वहीं राज्य में 38 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि है, जिसमें 25.75 लाख हेक्टेयर भूमि पर ही खेती है. 12.25 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में खेती नहीं होती है. प्रदेश में फसल त्रीवता भी राष्ट्रीय मानक से कम है. झारखंड में फसल त्रीवता 120 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय मानक 130 फीसदी है.

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दस फीसदी तक महंगा हो सकता है अनाज

इस साल 10 फीसदी तक अनाज महंगा हो सकता है. अनाज के लिये छत्तीसगढ़, पंजाब और बिहार पर निर्भर रहना होगा. सामान्य स्थिति में प्रदेश में 55 लाख टन अनाज का उत्पादन होता है. इस साल 40 से 45 लाख टन अनाज उत्पादन की संभावना जताई जा रही है. प्रति टन अनाज की कीमत लगभग 1000 रुपये आती है. इस हिसाब से 125 करोड़ रुपये का अनाज बाहर से मंगाना पड़ सकता है.

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बागवानी में उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ से पीछे है झारखंड

झारखंड बागवानी में भी राष्ट्रीय मानक से पीछे है. सब्जी उत्पादन में राष्ट्रीय मानक 17 टन प्रति हेक्टेयर है. झारखंड में 14 टन प्रति हेक्टेयर सब्जी का उत्पादन होता है. उत्तराखंड में 14.4 टन और छत्तीसगढ़ में 16 टन प्रति हेक्टेयर सब्जी का उत्पादन होता है.

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सिंचाई के मामले में उत्तराखंड आगे निकला

सिंचाई के मामले में साथ बने राज्य उत्तराखंड काफी निकल गया है. उत्तराखंड 45 फीसदी से अधिक कृषि भूमि में सिंचाई होती है. जबकि झारखंड में सिर्फ 13 फीसदी कृषि भूमि में सिंचाई सुविधा उपलब्ध है. पठारी क्षेत्र होने के बावजूद उत्तराखंड में दस वर्षीय फसल चक्र व्यवस्था है. पड़ोसी राज्य बिहार में 43.86 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में सिंचाई सुविधा उपलब्ध है.

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छत्तीसगढ़ में 61 फीसदी कृषि उत्पादन में वृद्धि

पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में 61 फीसदी कृषि उत्पादन में वृद्धि हो गई है. खाद के उपयोग से रबी और खरीफ फसल में औसतन 139 फीसदी की वृद्धि हुई है. पंप से सिंचाई क्षमता में 233 फीसदी की वृद्धि हुई है. जबकि झारखंड में औसत वर्षा 1400 मिलीमीटर होने के बावजूद सिर्फ 20 फीसदी ही वर्षा जल का उपयोग हो पाता है. वहीं झारखंड में 118 लघु सिंचाई योजनाओं में सिर्फ 44 का ही काम पूरा हो पाया है. वहीं प्रदेश के आठ जिले डेंजर जोन में हैं. पलामू, धनबाद, रांची, पूर्वी सिंहभूम, गोड्डा, रामगढ़, बोकारो, लोहरदगा में भू-गर्भ जल का दोहन 100 से 70 फीसदी हो चुका है. 70 फीसदी से कम भू-गर्भ जल के दोहन वाले क्षेत्र को सुरक्षित माना गया है.

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सुखाड़ की ओर बढ़ रहा है झारखंड

झारखंड सुखाड़ की ओर बढ़ रहा है. 2015 में 128 प्रखंडों में 55-60 फीसदी फसलों का नुकसान हुआ था. उस समय भी केंद्र से पैकेज की मांग की गई थी. इस बार 18 जिलों के 129 प्रखंड को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया गया है. राज्य गृह आपदा प्रबंधन विभाग ने इससे संबंधित अधिसूचना रविवार को जारी कर केंद्र को रिपोर्ट भेज दी है.

क्यों सुखाड़ घोषित करने की अधिसूचना हुई जारी

झारखंड में सामान्य परिस्थिति में 15 जुलाई तक धान की 80% और 31 जुलाई तक शत-प्रतिशत रोपाई हो जाती है. इस साल 31 जुलाई तक सभी फसलों का कवरेज मात्र 41.95% एवं धान का कवरेज 33.7% था. जबकि धान का कवरेज 31 जुलाई तक होना चाहिए था. जून में बारिश सामान्य से 32.97% कम हुई. जुलाई में 1-15 के बीच 53.6% कम वर्षा हुई. सितंबर में 56.74% वर्षा हुई, यह सामान्य से 43.6% कम है.

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सुखाड़ घोषित करने के ये हैं मानक

15 जून से 30 सितंबर तक 75 फीसदी से कम बारिश

फसल बुआई 50 फीसदी से होनी चाहिये कम

नॉर्मल डिफरेंशियल वेजिटेशन(एनडीवीआई) 0.4 फीसदी से होना चाहिये कम

आद्रता 0.4 फीसदी से होना चाहिये कम

ढ़ाई से तीन लाख हेक्टेयर : सब्जी की खेती

एक से डेढ़ लाख हेक्टेयर : फलों की खेती

20 हजार हेक्टेयर : काजू की खेती

1000 हेक्टेयर : संतरा की खेती

4000 हेक्टेयर : फूलों की खेती

26 हजार हेक्टेयर : आर्गेनिक फार्मिंग

झारखंड में कृषि की स्थिति : एक नजर

कुल किसान : 39 लाख

भौगोलिक क्षेत्र : 79.71 लाख हेक्टेयर

खेती योग्य जमीन- 38 लाख हेक्टेयर

खेती होती है : 25.75 लाख हेक्टेयर

दो हेक्टेयर जोत के किसान : 83 फीसदी

सालाना बारिश : लगभग 1400 मिलीमीटर

मॉनसून अवधि – चार माह( जून-सितंबर)

वर्षा जल का उपयोग : 20 फीसदी

सिंचाई सुविधा : 13 फीसदी

फसल घनत्व : 125 फीसदी

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