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सालभर में देश में ठनका से 3000 की मौत, अब वज्रपात को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की कवायद

झारखंड में मुआवजा पर सालभर में खर्च 12 करोड़, प्रति मृत व्यक्ति के आश्रित को चार लाख रुपये मुआवजा देने का है प्रावधान

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Ranchi: देशभर में ठनका को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की कवायद शुरू कर दी गई है. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े के अनुसार भारत में अन्य सभी आपदाओं के मुकाबले वज्रपात से सबसे ज्यादा मौत होती है. वर्ष 2018 में 3000 लोगों की मौत वज्रपात से हुई है.

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इसे कम करने के लिये मंगलवार को दिल्ली में वज्रपात सुरक्षा अभियान लॉन्च किया गया. यह अभियान 2019 से 2021तक चलेगा. इसमें दावा किया गया है कि वज्रपात से होने वाली मौत को तीन साल के अंदर  80% कम किया जा सकेगा.

वहीं झारखंड में वर्ष 2018 में ठनका से 300 लोगों की मौत हो चुकी है. इसकी वजह यह है कि झारखंड में ठनका से बचाव के लिये कोई ठोस योजना नहीं बनी.

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देश के 400 जिले वज्रपात प्रभावित

वर्तमान में देश के 400 से ज्यादा जिले वज्रपात प्रभावित हैं. ये जिले वज्रपात के करंट तीव्रता के स्केल वन के क्षेत्र में आ चुके हैं. इन जिलों में पिछले सप्ताह करंट की तीव्रता 1.3 बिलियन वोल्ट नापी जा चुकी है. झारखंड सहित उत्तर प्रदेश बिहार, मध्य प्रदेश इनके मैदानी पठारी और पहाड़ी क्षेत्रों में वज्रपात के कारण हुई मौतों की संख्या में अचानक भारी वृद्धि हुई है.

पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात के समुद्र तटीय जिलों पर वज्रपात का प्रभाव मॉनसून व साइक्लोन के दौरान बना रहता है.

पहाड़ी क्षेत्रों में विशेषकर जम्मू कश्मीर ,हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, असम, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, मेघालय में वज्रपात की घटनाएं नॉर्वेस्टर के दौरान व मॉनसून में होती रहती हैं.

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हर साल मुआवजा में खर्च होता है 1200 करोड़

वज्रपात से होने वाली मौत के एवज में मृतक के आश्रितों को मुआवजा देने में हर साल 1200 करोड़ रुपये खर्च होता है. जबकि झारखंड में पिछले साल मुआवजा देने में 12 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं.

वज्रपात सुरक्षा अभियान के तहत दावा किया गया है कि इससे मौत की संख्या में 50% भी कमी आयेगी तो सरकार को मुआवजा में कम से कम 600 करोड़ रुपए की बचत होगी.

साथ ही पशु एवं आर्थिक क्षति के नुकसान में भी कमी आएगी. अभियान के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में वज्रपात से बचाव के प्रति जागरूक किया जायेगा.

पूरा अभियान तीन बिंदुओं पर होगा केंद्रित

वज्रपात सुरक्षित भारत अभियान की रणनीति तीन बिंदुओं पर केंद्रित है. पहला, वज्रपात की पूर्व सूचना स्थान विशेष व समय विशेष पर प्रोएक्टिव तरीके से आम जनता तक पहुंचाना. दूसरा, लोगों को यह अवगत कराया जायेगा कि वज्रपात के दौरान क्या नहीं करें?

तीसरा, वज्रपात सुरक्षित क्षेत्र बनाने के स्टैंडर्ड मानक के तड़ित चालक या रोधक स्कूलों, अस्पताल, पंचायत भवन, सरकारी भवन एवं गैर सरकारी भवनों में लगाना. यह अभियान देश के सभी राज्यों में चलेगा. क्लाइमेट रेसिलियंट ऑब्जर्विंग सिस्टम प्रमोशन काउंसिल का यह संयुक्त अभियान है.

इसमें राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, एनआरएससी,इसरो स्पेस एप्लीकेशन सेंटर, इंडियन मेट्रोलॉजिकल सोसायटी एसोसिएशन ऑफ एग्रोमीटरोलॉजी तथा वर्ल्ड विजन इंडिया यूनिसेफ व राज्यों के एनजीओ भी शामिल होंगे.

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झारखंड में दो तरह के हैं थंडरिंग जोन

झारखंड में दो तरह के थंडरिंग जोन हैं. इसमें लो क्लाउड (कम ऊंचाई के बादल) और माइक्रोस्पेरिक थंडरिंग शामिल है. लो क्लाउड थंडरिंग धरातल से 80 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर होती है, जबकि माइक्रोस्पेरिक थंडरिंग की गतिविधि धरातल से 80 किलोमीटर से अधिक ऊंचाई पर होती है.

थंडरिंग जोन की पहली श्रेणी में हजारीबाग है. इसके अलावा रांची, सरायकेला-खरसांवा, सिमडेगा, खूंटी और पश्चिमी सिंहभूम के इलाके शामिल हैं.

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क्या कहते हैं अभियान के संयोजक

वज्रपात सुरक्षित भारत अभियान के संयोजक कर्नल संजय श्रीवास्तव के अनुसार, वज्रपात भारत के विभिन्न हिस्सों में एक सामान्य प्रणाली के द्वारा होता है. आमतौर पर वसंत ऋतु के दौरान वैशाखी या नॉर्वेस्टर के दौरान पूर्वी एवं मध्य भारत में वज्रपात की घटनाएं होती हैं.

इसके बाद दक्षिण पश्चिम मॉनसून के शुरुआती दौर में वज्रपात की घटनाएं उत्तर पूर्व भारत से होती हुई भारत के शेष हिस्से में पहुंचती हैं. झारखंड में 2011 से 2016 तक चलाए गए वज्रपात सुरक्षित कार्यक्रमों से वज्रपात से होने वाली मौत की संख्या में काफी कमी आई थी.

वज्रपात सुरक्षित भारत अभियान के अंतर्गत कॉलेज यूनिवर्सिटी विद्यालय तकनीकी संस्थान शोधकर्ताओं विद्यार्थियों को जोड़ने का विशेष प्रयास किया जा रहा है.

 झारखंड में ठनका से बचाव के लिये क्या नहीं हुआ

छह जिलों में नहीं बना इंडस्ट्रीयल डिजास्टर मैनेजमेंट कॉरिडोर

धनबाद- बोकारो, रांची-रामगढ़ और पूर्वी व पश्चिमी सिंहभूम में बनना था कॉरिडोर

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