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सालभर में ठनका से 300 की मौत, मुआवजा पर सालाना 12 करोड़ खर्च, फिर भी नहीं लग पाया तड़ित रोधक यंत्र

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  • चार साल बाद भी छह जिलों में नहीं बना इंडस्ट्रीयल डिजास्टर मैनेजमेंट कॉरिडोर
  • धनबाद-बोकारो, रांची-रामगढ़ और पूर्वी व पश्चिमी सिंहभूम में बनना था कॉरिडोर
  • एक तड़ित रोधक यंत्र लगाने में खर्च आता है डेढ़ से दो लाख रुपये
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Ranchi: राज्य सरकार प्रदेश में लाइटनिंग (ठनका) से बचाव के लिए अब तक माकूल इंतजाम नहीं कर पाई है. पिछले साल लाइटनिंग से प्रदेश में 300 लोगों की मौत हो चुकी है. ठनका से बचाव के लिए कई योजनाएं बनीं. लेकिन चार साल बाद भी यह योजना ठनका प्रभावित इलाकों में धरातल पर नहीं उतर पाई. सिर्फ देवघर में छह और रांची के नामकुम में एक तड़ित रोधक यंत्र ही लगाया जा सका. योजना के तहत रांची के पहाड़ी मंदिर और जगन्नाथपुर मंदिर में भी तड़ित रोधक यंत्र लगाया जाना था.

छह जिलों में नहीं बना इंडस्ट्रीयल डिजास्टर मैनेजमेंट कॉरिडोर

चार साल गुजर जाने के बाद भी छह जिलों में इंडस्ट्रीयल डिजास्टर मैनेजमेंट कॉरिडोर नहीं बन पाया. इन जिलों में योजना यह थी कि इस कॉरिडोर के तहत आनेवाली औद्योगिक इकाईयां अपने उद्योगों के साथ आस-पास के क्षेत्र के लोगों को प्रशासन की सहायता से आपदा से निपटने के लिए जागरूक करतीं. साथ ही आपदा प्रबंधन (डिजास्टर मैनेजमेंट) का प्रशिक्षण भी देतीं.

इसके तहत आपदा से निपटने के लिए संचार व्यवस्था दुरुस्त करने की भी योजना थी. योजना के तहत इन छह जिलों में एक राहत केंद्र होता. राहत केंद्र में भोजन और दवाइयों की व्यवस्था होगी. मेडिकल मैनेजमेंट को भी दुरुस्त करने की बात कही गई थी.

खनिज क्षेत्रों में लाइटनिंग अरेस्टर ग्रिड भी नहीं लगा

लाइटनिंग से बचाव के लिए खनिज बहुल क्षेत्रों में लाइटनिंग अरेस्टर ग्रिड स्थापित करने की योजना थी. लेवल वन में पूर्वी सिंहभूम और पश्चिमी सिंहभूम को रखा गया था. लेवल टू में रामगढ़, हजारीबाग, बोकारो, रांची और कोडरमा को रखा गया था. लेवल थ्री में गढ़वा, लातेहार, पलामू, लोहरदगा और गुमला को रखा गया था. इसके अलावा लाइटनिंग से बचाव के लिए जिलों के साथ प्रखंड स्तर पर भी एक्शन प्लान बनाने की योजना बनाई गई थी.

क्यों लाइटनिंग अरेस्टर ग्रिड की है जरूरत

आपदा विभाग ने इसके पीछे तर्क दिया था कि खनिज क्षेत्र में लाइटनिंग (ठनका) कंडक्टर का काम करती है. यह खनिज की ओर काफी तेजी से आकर्षित होता है. इस कारण खनिज बहुल क्षेत्रों में लाइटनिंग अरेस्टर ग्रिड लगाने की योजना बनाई गई थी. जो ठनका को भूमिगत कर देता.

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रांची में जमीन लूट के मामने आजतक के अपने सभी रिकॉर्ड लगभग तोड़ चुके हैं. नतीजा सामने है. जीएम लैंड हो या आर्मी लैंड प्रशासन की मदद से माफिया, दबंग बेखौफ होकर जमीन का धंधा कर रहे हैं

क्यों बनी थी तड़ित रोधक यंत्र लगाने की योजना

आपदा विभाग का तर्क था कि पहले जो तड़ित चालक लगाये जाते थे, वह छत या भवन के उपरी हिस्से में तांबे का त्रिशुलनुमा यंत्र लगा होता था. इसी के सहारे अर्थिंग को जमीन के अंदर ले जाया जाता था. लेकिन यह उतनी कारगर साबित नहीं हो पाई. जबकि तड़ित रोधक ठनका को भूमिगत करने में सक्षम है.

क्या है तड़ित रोधक

तड़ित रोधक में एक एम्मीमीटर लगा होता है. जो एक इलेक्ट्रॉनिक फील्ड बनाता है. यह बिजली बनने से पहले ही उसे नष्ट कर देता है. यह यंत्र 240 मीटर की परिधि को कवर करने में सक्षम है. एक तड़ित रोधक लगाने में डेढ़ से दो लाख रुपये तक का खर्च आता है.

मुआवजा में सालाना खर्च 12 करोड़ रुपये

राज्य सरकार ठनका से हुई मौत पर मुआवजा देने के एवज में सालाना 11 से 12 करोड़ रुपये खर्च करती है. ठनका से मौत होने पर मृत व्यक्ति के परिजन को चार लाख रुपये देने का प्रावधान है.

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