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पांच साल में झारखंड से गायब हुए 2789 बच्चे, लगभग आधे का नहीं मिल सका सुराग

Ranchi: झारखंड में 90 फीसदी ह्यूमन ट्रैफिकिंग की शिकार, हमारी आदिवासी बेटियां हो रही हैं. इनकी सादगी, भोलापन, गरीबी और अशिक्षा का फायदा उठाकर मानव तस्कर महानगरों में इनकी मासूमियत की खुलेआम बोली लगाकर मालामाल हो रहे हैं. हमारी बेटियां नर्क की जिंदगी जीने को मजबूर हैं.

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कम लोगों को ही मिलता है सजा

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मानव तस्कर के रुप में पवन साहू, प्रभा, सुरेश, बामदेव जैसे कई दलाल सक्रिय हैं. पिछले 5 साल में झारखंड में 2,789 बच्चे लापता हुए. इसमें पुलिस सिर्फ 1505 बच्चों को ही बरामद कर सकी. बाकि बचे 1284 बच्चे कहां गये, इसका जवाब किसी के पास नहीं है.

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नेशनल क्राइम ब्यूरो 2017 के आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल पुलिस के पास बच्चों की गुमशुदगी के 395 मामले दर्ज किए गये, लेकिन सजा हुई महज 9 से 10 मामलों में ही. बाकि मामलों में आरोपी या तो छूट गये या फिर जमानत लेकर तस्करी के धंधे में लौट आए हैं.

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क्या कहते है सामाजिक कार्यकर्ता ?

सामाजिक कार्यकर्ता बैजनाथ कुमार कहते हैं कि मानव तस्करों खिलाफ साक्ष्य नहीं होने के कारण आरोपी को जमानत मिल जाती है. पीड़िता को पुलिस सुरक्षा नहीं दे पाती. गरीब होने के कारण अच्छे पीड़ित पक्ष अच्छे वकील भी नही रख पाते हैं. कई बार पीड़िता कोर्ट में बयान देने में ही टूट जाती है. तस्करों की कमर तोड़ने के लिए कड़ी सजा पर जोर देना होगा, तभी इनका मनोबल गिरेगा.

मानव तस्करी के 395 मामलों में महज 9 से 10 मामलों में हुई है सजा
मानव तस्करी के 395 मामलों में महज 9 से 10 मामलों में हुई है सजा

 

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एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट तो बना, पर पुलिस गंभीर नहीं

मानव तस्करी पर नकेल कसने के लिए वर्ष 2011 में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट का गठन किया गया. इसके तहत राज्य के आठ जिलों- गुमला नगर थाना, सिमडेगा नगर थाना, खूंटी नगर थाना, दुमका नगर थाना, रांची कोतवाली थाना, पश्चिमी सिंहभूम के चाईबासा सदर थाना, लोहरदगा सदर थाना व पलामू सदर थाने में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट का गठन हुआ. इसके गठित होने के बाद भी मानव तस्करी का धंधा फल-फूल रहा है.

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थाने में की जाती है खानापूर्ति

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद लापता बच्चों के मामले को गंभीरता से नहीं लिया जाता. पुलिस अधिकारियों की लापरवाही के कारण कई मासूमों की जिंदगी बर्बाद हो चुकी है. थाना में पुलिस सिर्फ सनहा दर्ज कर खानापूर्ति करती है. कई मामलों में एफआईआर दर्ज नहीं की जाती. इस कारण पुलिस उनकी खोजबीन को लेकर गंभीरता नहीं दिखाती. हकीकत यह है कि राज्यभर से सैंकड़ों बच्चे-बच्चियां गुम हैं. घरवाले थाना के चक्कर लगा-लगाकर थक चुके हैं. लेकिन अबतक उनका कोई सुराग नहीं मिल पाया है. वक्त रहते अगर पुलिस सक्रिय हो जाती, तो कई मासूमों बिकने से बच जातें.

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पुनर्वास उचित व्यवस्था नहीं

रेस्क्यू कर लायी गयी नाबालिग व बालिग लड़कियों के पुनर्वास की उचित व्यवस्था नहीं है. मजबूरन वह दोबारा इस काले धंधे के दलदल में फंस जाती हैं. रेस्क्यू के बाद उनकी प्रॉपर मॉनिटरिंग भी नहीं हो पाती. मानव तस्करी पर रोक के लिए वर्ष 2012 में पंचायत सचिव को गांव से बाहर कमाने जानेवालों का रजिस्ट्रेशन करने का निर्देश दिया गया था. लेकिन ये होता नहीं है.

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