Uncategorized

1996 में लालू को गिरफ्तार नहीं होने दे रहा था जिला प्रशासन, गिरफ्तारी हुई तो फूट-फूट कर रोयी डीएम राजबाला वर्मा: सरयू राय

Ranchi: पशुपालन घोटाला के दो मामले में लालू यादव को सजा हो चुकी है. अभी और भी मामले बचे हैं जिनपर सुनवाई होनी है. पशुपालन घोटाले के उद्भेदन प्रक्रिया को काफी बारीकी से जानने और देखने वाले सूबे के खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने एक लेख लिखा है. उस लेख में सरयू राय ने लिखा है कि आखिर कैसे 1996 में पटना का पूरा प्रशासन लालू यादव के आगे नतमस्तक था. सीबीआई लालू को गिरफ्तार करना चाह रही थी. लेकिन, प्रशासन ऐसा होने नहीं दे रहा था. उस वक्त पटना की डीएम झारखंड की वर्तमान मुख्य सचिव राजबाला वर्मा थी. प्रशासन की तरफ से ऐसे हालात बनाए गए कि सीबीआई को मजबूरन सेना के पास जाना पड़ा. मजबूर हो कर लालू ने सियासी तरीके से सरेंडर किया. सरेंडर करने के बाद कैसे तत्कालीन डीएम (राजबाला वर्मा) जेल में लालू यादव से मिलते वक्त फूंट-फूंट कर रोयीं. एक डीएम का ऐसा व्यवहार यह साबित करता है कि उस वक्त कानून और संविधान का सत्ता कैसे इस्तेमाल कर रही थी. कैसे प्रशासन के आला अधिकारी यह सब करने में सत्ता को पूरा साथ दे रहे थे. पढ़े सरयू राय का ये लेख.       

इसे भी पढ़ें: ODF घोषित कोडरमा के दर्जनों घरों में शौचालय नहीं, शौच के लिए खेत में गयी बच्ची को कुत्तों ने मार डाला

सरयू राय                         

30 जुलाई 1997 का दिन पशुपालन घोटाले के इतिहास में सर्वाधिक सनसनीखेज वाला दिन था़. उस दिन लालू प्रसाद ने चारा घोटाला के आरसी/20/96 मामले में कोर्ट में समर्पण किया था. सीबीआइ उन्हें गिरफ्तार करना चाहती थी, परंतु पटना के जिला प्रशासन ने ऐसा होने नहीं दिया. विकल्प के रूप में सीबीआइ ने 29 जुलाई की सुबह पटना उच्च न्यायालय में चारा घोटाला की सुनवाई करने वाले न्यायाधीश एसएन झा से उनके आवास पर भेंट की. इसके बाद सीबीआइ के अधिकारियों ने दानापुर कैंट में सेना के अधिकारियों से मदद मांगी, ताकि लालू प्रसाद को गिरफ्तार किया जा सके. 

saryu

सीबीआइ ने आरसी 20ए/96 मामले में 27 अप्रैल 1996 को आरोप पत्र दाखिल किया था, जिसे बिहार के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. एआर किदवई के पास अनुमोदन के लिए भेजा गया. डॉ. किदवई ने 17 जून 1996 को आरोप पत्र अनुमोदित कर दिया. गिरफ्तारी की आशंका के मद्देनजर लालू प्रसाद उच्चतम न्यायालय गये. उच्चतम न्यायालय ने 29 जुलाई के पूर्व उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा दी. बाद में सीबीआइ के अनुरोध पर उच्चतम न्यायालय ने रोक हटायी. फिर सीबीआइ का लालू प्रसाद को गिरफ्तार करने का प्रयास शुरू हुआ. इस बीच लालू प्रसाद ने 25 जुलाई को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया और राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया.   

लालू प्रसाद द्वारा न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण करने के लिए किये जा रहे प्रयास सफल नहीं हो रहे थे और पटना जिला प्रशासन सीबीआइ को उन्हें गिरफ्तार करने नहीं दे रहा था. तब झारखंड की वर्तमान मुख्य सचिव राजबाला वर्मा पटना की जिलाधिकारी थी. सीबीआइ ने रैपिड एक्शन फोर्स के डीआइजी से पुलिस बल की मांग की. तदुपरांत पुलिस बल सीबीआइ के कार्यालय पर पहुंच भी गया, परंतु राजबाला वर्मा ने बल के डीआइजी को स्पष्ट निर्देश दे दिया कि बिना उनकी इजाजत के पुलिस बल एक कदम भी आगे नहीं बढ़ेगा.  

इसे भी पढ़ें: जिस राज्य में लोग भूख से मरते हैं, वहीं के गोदाम में सड़ जाता है 1098 क्विंटल अनाज (देखें वीडियो) 

उस दिन मुख्य सचिव, डीजीपी, एसएसपी ने मोबाइल बंद कर दिया था, लैंडलाइन पर भी उपलब्ध नहीं थे. घर-ऑफिस से गायब हो गये थे. पूरा शासन कानून की धज्जियां उड़ा  रहा था.

सीबीआइ के अधिकारियों ने अपने प्रतिवेदन में अंकित किया है कि पटना जिला प्रशासन द्वारा लालू प्रसाद को गिरफ्तार करने के उच्चतम न्यायालय के आदेश का अनुपालन करने से इनकार कर दिये जाने के कारण उन्हें सेना की मदद लेने के लिए विवश होना पड़ा. यह घटना 29 जुलाई 1996 की है. सीबीआइ द्वारा लालू प्रसाद की गिरफ्तारी के लिए सेना की मदद मांगे जाने के अगले दिन 30 जुलाई को लालू प्रसाद आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार हुए.  

laloo

न्यायालय में आत्मसमर्पण के लिए जाते समय पटना की सड़कों पर लंबा जुलूस लेकर वे न्यायालय गये और अपनी गिरफ्तारी दी. इसके बाद उन्हें बेऊर जेल भेजा गया. वहां से कुछ ही क्षणों में उन्हें एक गेस्ट हाउस में भेज दिया गया और गेस्ट हाउस को जेल का दर्जा दे दिया गया. प्रत्यक्षदर्शी बताते हैं और उस समय के कतिपय समाचार पत्रों ने भी प्रकाशित किया है कि जब लालू प्रसाद बेऊर जेल भेजे गये, तब पटना की तत्कालीन जिलाधिकारी जेल गेट के सामने फूट-फूट कर रोने लगीं. शायद प्रशासन द्वारा तमाम प्रयासों के बावजूद लालू प्रसाद को गिरफ्तार कर उन्हें जेल जाने से रोक नहीं पाने के कारण इनके आंसू निकलने से रुके नहीं.

उस दिन मुख्य सचिव, डीजीपी व एसएसपी ने मोबाइल बंद कर दिया था. लैंड लाइन पर भी उपलब्ध नहीं थे. घर, ऑफिस से गायब हो गये थे. पूरा शासन कानून की धज्जियां उड़ा रहा था.

29 और 30 जुलाई 1996 का दिन न केवल पशुपालन घोटाला के इतिहास का एक सनसनीखेज दिन था, बल्कि एक ऐसा दिन भी था, जब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लालू प्रसाद की गिरफ्तारी से रोक हटाने और उन्हें अविलंब गिरफ्तार के आदेश का अनुपालन करने से पटना जिला प्रशासन इनकार कर गया. संविधान और कानून के मुंह पर प्रशासन द्वारा यह करारा तमाचा था. वह दिन एक प्रकार से जिला प्रशासन द्वारा राज्य सरकार की शह पर न्यायिक निर्णयों के प्रति विद्रोह के बिंब के रूप में याद किया जायेगा.

cs

जब नौकरशाही और प्रशासन संविधान, कानून और न्यायालय के प्रावधानों का अनुपालन करने से इनकार कर दे, तब नागरिक प्रशासन की विफलता के विकल्प में सेना का सहारा लेने का अंतिम विकल्प अपनाने का निर्णय कोई जांच एजेंसी करती है, तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के तारतार होने की स्थिति पैदा हो जाती है. सीबीआइ द्वारा नागरिक प्रशासन के विफल हो जाने के कारण कानून व्यवस्था लागू करने के लिए सेना की मदद लेने का निर्णय कितना उचित था और सीबीआइ के स्थानीय अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में था या नहीं यह विवाद का विषय हो सकता है, परंतु ऐसी स्थिति पैदा हो जाने पर इसके सिवाय क्या विकल्प है.

– लेखक चारा घोटाले की जांच के याचिकाकर्ता रहे हैं और वर्तमान में राज्य सरकार में खाद्य आपूर्ति मंत्री हैं.

न्यूज विंग एंड्रॉएड ऐप डाउनलोड करने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पेज लाइक कर फॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

Back to top button