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195 बड़ी कंपनियों का कर्ज उनके कैपिटल मार्केट से ज्यादा हो गया है, कारोबार जगत के दिवालिया होने का खतरा

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Girish Malviya

वित्तमंत्री 23 अगस्त को प्रेस कॉन्फ्रेंस में मेरे मुर्गे की तीन टांग पर अड़ी रही, बोली कोई मंदी नही है ! कोई स्लोडाउन नही है! यह जो घोषणाएं हम कर रहे हैं यह इसलिए क्योंकि व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल यह मांग उठा रहे थे.

लेकिन साफ दिख रहा था कि बाजार जो अर्थव्यवस्था की हालत बयान कर रहा है उसे देखकर प्रेस कॉन्फ्रेंस के डायस पर बैठे लोग अंदर ही अंदर से हिले हुए हैं. जुलाई और अगस्त में FPI ने बाजार से 23 हजार करोड़ की निकासी की है.

बिजनेस स्टेंडर्ड ने एक लेख में एक हैरान कर देने वाली जानकारी दी, उसका कहना है कि शेयर बाजार में जो हालिया गिरावट आयी हैं उससे भारतीय कारोबारी जगत में दिवालिया होने का खतरा बढ़ गया है. क्योंकि कई फर्मों की उधारी उनके मार्केट कैपिटल से काफी ज्यादा हो गयी है.

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प्रमुख कंपनियों का मार्केट कैपिटल और कर्ज अनुपात असंतुलित हो गया है. इनमें वोडाफोन-आइडिया (15.1 फीसदी), टाटा मोटर्स (32.7 फीसदी), टाटा पावर (30.4 फीसदी), टाटा स्टील (38.5 फीसदी), जीएमआर इन्फ्रा (37.7 फीसदी), आइआरबी इंफ्रा (17.5 फीसदी) और जिंदल स्टील (30 फीसदी) है.

वित्त वर्ष 2018 के अंत तक ऐसी 99 कंपनियां थी जिनकी उधारी उनके मार्केट कैपिटल से अधिक थी. मार्च 2019 में ऐसी कंपनियों की संख्या 147 हो गयी जो अब बढ़कर 195 हो गयी हैं. NBFC और प्राइवेट सेक्टर की 195 अन्य कंपनियों की उधारी पांच साल के उच्च स्तर पर पहुंच गयी है.

ऋणदाताओं के लिए बड़ी चिंता यह है कि अधिकांश कॉरपोरेट ऋण वित्तीय क्षेत्र की इन्हीं कंपनियों में लगा है. अगस्त आते-आते तक इन 195 कंपनियों पर ऋणदाताओं का कुल 13 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था, जो पिछले पांच साल में सर्वाधिक है. मार्च 2018 में यह 8.8 लाख करोड़ रुपये था.

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कर्ज और मार्केट कैपिटल में असंतुलन को देखते हुए विश्लेषकों का कहना है कि इससे कंपनियों के कर्ज चूक के मामले बढ़ सकते हैं. यही स्थिति रही तो सैकड़ों कंपनियां दीवालिया हो सकती है.

हम देख रहे हैं कि नयी दिवालिया अदालत के सामने आने वाले 12 प्रमुख कंपनियों के मामले जिनमे ढाई लाख करोड़ रुपये की रकम इन्वॉल्व है. उसमें 3 साल होने को आये हैं लेकिन आधे मामले भी ठीक ढंग से सॉल्व नही हो पाये हैं.

मार्केट की बिगड़ती स्थिति हमे साफतौर पर तभी दिखायी दे गयी थी जब आइएलएंडएफएस का मामला सामने आया था. लेकिन सरकार शुतर्मुर्ग की तरह रेत में गर्दन दबाये तूफान के गुजरने का इंतजार करती रही. झूठे आंकड़ो से मन बहलाती रही.

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अब पानी सर तक आ गया. 23 अगस्त को जब वित्तमंत्री प्रेसवार्ता कर रही थी उसके कुछ घंटे पहले ही खबर आयी कि मूडीज ने वर्ष 2019 के लिए भारत की जीडीपी की वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 6.2 प्रतिशत कर दिया है.

पहले इसे 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया था. इसी के साथ उसने 2020 के लिए भी वृद्धि दर के अनुमान को 0.6 प्रतिशत घटाकर 6.7 प्रतिशत कर दिया है. इससे पहले भी प्रमुख राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियां देश की GDP ग्रोथ के अनुमान घटा चुकी हैं. सभी को स्लोडाउन दिख रहा है लेकिन हमारी वित्तमंत्री को खोखले दम्भ भरने और अहंकारपूर्ण भाषा इस्तेमाल करने के अलावा और कुछ भी समझ नहीं आ रहा है.

(लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं, ये इनके निजी विचार हैं)

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