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191 आदिवासी गांव पलामू टाइगर के निशाने पर

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Sunil Minz

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Palamu: विभाग टाइगर रिजर्व के आसपास के 191 गांव को बफर क्षेत्र बनाना चाहता है. विभाग का कहना है कि वन उत्पाद के साथ-साथ 191 गांवों के अलावा बारवाडीह, छिपादोहर, हेहेगारा और कुमन्दिह के ग्रामीणों के पशुओं के चारे की मांग के कारन वनों पर दबाव बढ़ रहा है.

जानवरों के रहवास के नाम पर आठ गांव के लोगों पर विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है.

पृष्ठभूमि

पलामू टाइगर रिजर्व लातेहार और गढ़वा के जिलों में स्थित है. इस बाघ परियोजना को 1974 में अधिसूचित किया गया था. जिसमें 226.84 वर्ग किमी का एक क्षेत्र शामिल था.

बाद में शेष पलामू वन्यजीव अभ्यारण्य का क्षेत्र इसमें शामिल किया गया और अब बढ़कर यह 1026.00 वर्ग किमी हो गया. वर्तमान में इसमें 103.93 वर्ग किमी आरएफ और पीएफ के साथ 1129.93 वर्ग किमी की वृद्धि हुई है.

इस ब्याघ्र परियोजना में बड़ी संख्या में लुप्तप्राय प्रजातियों ने अपना घर बना लिया है. इस ब्याघ्र परियोजना को 1974 में भारत के मूल नौ बाघ अभ्यारणियों में से एक होने का गौरव प्राप्त हुआ. यह वन डिवीजन जंगली जानवरों जैसे बाघ, हाथियों, तेंदुए, नील गाय, बाइसन, जंगली सूअर और हिरण, जैसे जानवरों से भरा है.

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लेकिन समय के साथ स्थिति बदल गई है. जंगल पलामू क्षेत्र में कवर के रूप में सिकुड़ गया है और इसकी गुणवत्ता भी बिगड़ गई है. वन्य–जीवन परियोजना टाइगर क्षेत्र तक ही सीमित है.

क्षेत्र में अभी भी हाथियों की अच्छी आबादी निवास करती है. लेकिन बाघों की आबादी काफी नीचे चली गयी है. इसकी संख्या में कमी का एक आधार शिकार भी है. जंगल माफिया, हाथी दांत और बाघ के चमड़े के तस्कर वर्तमान स्थिति के लिए मुख्य कारण है. बफर क्षेत्र के अंदर कई दशकों से लोग वहां निवास करते आ रहे हैं.

वर्तमान योजना

अब विभाग टाइगर रिजर्व के आसपास के 191 गांव को बफर क्षेत्र बनाना चाहता है. विभाग का कहना है कि वन उत्पाद के साथ-साथ 191 गांवों के अलावा बारवाडीह, छिपादोहर, हेहेगारा और कुमन्दिह के ग्रामीणों के पशुओं के चारे की मांग के कारन वनों पर दबाव बढ़ रहा है.

कोर क्षेत्र चारों ओर जंगलों से घिरा हुआ है. विस्थापन की दूसरी तात्कालिक वजह यह बतायी जा रही है कि गढ़वा जिला स्थित बहुउद्देश्यीय कुटकु बांध 1971-72 में शुरू हुआ था और अभी तक पूरा नहीं हुआ है.

डूब के तहत 13 गांव को मुआवजे का भुगतान किया गया है, लेकिन उन्होंने भूमि को कभी भी खाली नहीं किया. यह परियोजना दो साल के अंदर बनकर तैयार की जानी है.

इस जलाशय के जलमग्न होने से लगभग 119 वर्ग किमी (बफर में 115.40 वर्ग किमी और 3.60 वर्ग किलोमीटर कोर में) जंगल जिसमें जंगली जानवर रहते थे, डूब जाएगा.

इन जानवरों के रहने के लिए बफर जोन के 8 गांवों का पुनर्वास किया जाना है, जिनमें लातू, कुजरुम, हेनार, बिजयपुर, गुटुवा, गोपखाड़, पंडरा और रमंदाग शामिल हैं.

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गुटुआ गांव के बल्कू उरांव ने बताया कि उनका गांव 1920-23 में बसा है. जंगली जानवरों से लड़ते हुए बाघ के घर में हमलोगों ने रहने के लिए जमीं बनायी है. इस जमीन का कागज़ भी हमें 1975-76 में मिल गया है.

कुछ जमीनों का दावा हमने वनाधिकार क़ानून, 2006 के तहत किया है जो अभी तक लंबित है. हमने नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के लिए भी जमीन नहीं दी, हम जानवरों के विचरण के लिए भी गांव खाली नहीं करेंगे.

बता दें कि खेती बारी के लिए 7.56 प्रतिशत, बंजर भूमि- कृषि योग्य के लिए 3.90 प्रतिशत, बंजर भूमि- गैर कृषि भूमि के लिए 0.03 प्रतिशत, नदी/जलाशय के लिए 1.46 प्रतिशत जमीन का इस्तेमाल 8 गांव के आदिवासी विस्थापितों द्वारा किया गया है.

सामाजिक-आर्थिक स्थिति

आठ वन गांव अर्थात् लातू, कुजरुम, हेनार, बिजयपुर, गुटुआ, गोपखाड़,पंडरा और रमंदाग कोर क्षेत्र के जंगल से घिरे हुए हैं और स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास योजनाओं की बहुत कम पहुंच है. इन गांवों में कृषि मुख्य व्यवसाय है.

धान, मड़वा, मक्का, दाल आदि उनके द्वारा उपजायी जानेवाली फसल हैं., लेकिन उत्पादन काफी कम है. इससे लगभग 6 महीने का गुजारा ही हो पता है.

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लोग अपनी आजीविका के पूरक रोजगार के रूप में वनों और वन्यजीव प्रबंधन गतिविधियों जैसे सड़कों और इमारतों की मरम्मत कार्य, डी-सिलिंग जलमोचनों और चेक बांधों, अग्निशामक, आदि दैनिक कामों पर निर्भर रहे हैं.

विजयपुर गांव के एक युवा प्रवीण ने बताया कि उन्हें जानवरों के पदचिन्ह गिनने के लिए वनविभाग की तरफ से माह में 5,229.40 रु. दिए जाते हैं. इस काम में लगभग 72 युवाओं को लगाया गया है.

आजीविका के अन्य विकल्प में जलावन लकड़ी, वन उपज, महुआ फूल और बीज, औषधीय पौधे, मशरूम, तेल बीज और शहद आदि की बिक्री से लगभग तीन से चार महीनों तक की आजीविका का जुगाड़ हो जाता है.
सड़क मरम्मत, भवन निर्माण, आवास प्रबंधन, आग प्रबंधन और शिकार विरोधी उपाय आज भी सामुदायिक ढांचे पर निर्भर है.

मदैत सिस्टम से लोग घर निर्माण और कृषि कार्य करते हैं. पलामू टाइगर रिजर्व में भी खाद्य सुरक्षा योजना की गतिविधियों चलायी जाती हैं.

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पशु पालन

कृषि में सहयोग के लिए पशुपालन भी किया जाता है. वे सीमित मात्रा में गाय-बैल, बकरी, सूअर, मुर्गी-बतख पालन भी करते हैं.

जनसंख्या

8 वन गांवों में से, 1 गांव- रमंदाग सीडी ब्लॉक बरवाडीह के क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार में आता है. बाकी 7 सीडी ब्लॉक गारू का हिस्सा हैं. सभी 8 पलामू टाइगर रिजर्व के ‘बफर एरिया’ वन विभाग के क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार में हैं.

विजयपुर गांव के अजय टोप्पो ने बताया कि कुजरुम में 49 परिवार के 319 आबादी, लातू गांव के 38 परिवारों की 224 आबादी, रमंदाग गांव के 85 परिवारों की 529 आबादी, हेनर गांव के 86 परिवारों की 560 आबादी, गुटुवा गांव के 90 परिवारों की 493 आबादी, विजयपुर गांव के 75 परिवारों की 365 आबादी, गोपखाड़ गांव के 25 परिवारों की 139 आबादी, और पंडारा गांव के परिवारों की 460 आबादी को जानवरों के रहवास के लिए उजाड़ने की बात कही जा रही है.

एक चरवाहे ने बताया कि इन 8 गांव में लगभग ढाई से तीन हजार पशु हैं, जिनके ऊपर इनलोगों की आजीविका टिकी है.

मानव-वन्यजीव संघर्ष

ये गांव वास्तव में वन्यजीवों के साथ जीता है, खासकर हाथी, बाघ और आलस भालू. यह दिलचस्प है कि इन गांवों के वन्यजीवों के साथ ज्यादा संघर्ष नहीं है.

50% हाथियों की आबादी मुख्य रूप से धान के मौसम में आवाजाही करती है और गर्मियों के दौरान हाथियों का 90% हिस्सा इन इलाकों में रहता है. लेकिन कभी भी इनका संघर्ष नहीं होता है.

उन्होंने हाथियों को भगाने की कला विकसित कर ली है. उन्होंने कभी भी बाघों, चीतों और भालुओं का शिकार नहीं किया. गुटुवा गांव के रिटायर्ड फौजी ने बताया कि जानवरों का शिकार करने तो लोहरदगा और रांची के लोग आते थे. आज भी उनके घरों में विभिन्न वन्य जीवों के खाल दीवार की शोभा बढ़ा रही है.

ग्रामीणों की मानें तो इन्हें सिर्फ बदनाम किया जाता है. पूर्व में हमारे पूर्वज 75 पैसे की मजदूरी में अंग्रेज अफसरों को पालकी में बैठाकर नेतरहाट ले जाते थे. कई बार जंगल में आग लगी तो हमारे लोगों ने भूखे-प्यासे उसे बुझाया.

आज भी जंगल और जंगली जानवरों से उन्हें उतना ही प्यार है. लेकिन उन्हें बफर क्षेत्र के वन परिधि से हटाना चाहते हैं. हालांकि 8 गांवों में से 6 गांवों ने ग्राम सभा करके अपनी असहमति सरकार को दे दी है.

कई बार इन्होंने गारू प्रखंड के समक्ष लोकतांत्रिक तरीके से अपनी असहमति का इजहार किया है. भविष्य में तो पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र के नाम पर और 207 गांव को उजाड़ने की योजना प्रस्तावित है.

इस इलाके में सालों से कुटकू बांध, ओरंगा बांध, ओरसापाट खदान, नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज, और पलामू टाइगर प्रोजेक्ट से विस्थापन का ख़तरा मंडरा रहा है.

लोगों ने विस्थापन के खिलाफ पुरजोर लड़ाई भी जारी रखी है. अब देखना यह है कि क्या ये आंदोलन भी राजकीय दमन के शिकार हो जाते हैं. या संवैधानिक अधिकारों के तहत लड़ाई करते हुए यह आंदोलन जीतते हैं.

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