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134 प्रखंडों को सरकार ने अनुसूचित क्षेत्र से हटाया, रियायती दरों पर भूमि उपलब्ध कराने के लिए लिया निर्णय

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  • 2007 में राष्ट्रपति ने किया था राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों का चयन, अब आदिवासी नेता कह रहे आलोचना 
  • पलामु का एक भी ब्लॉक सरकार के अधिसूचित क्षेत्र में नहीं, पूर्व में सतबरवा के दो पंचायत थे अनुसूचित क्षेत्र में 
Chhaya
Ranchi: आदिवासी क्षेत्रों के विकास का मुद्दा राज्य गठन के बाद से ही चल रहा है. सरकार बनती हैं और योजनाओं में बदलाव किया जाता है. कुछ ऐसा ही बड़ा निर्णय वर्तमान झारखंड सरकार ने लिया है. 6 दिसंबर 2018 की कैबिनेट बैठक में राज्य सरकार ने राज्य के 134 अनुसूचित ब्लॉक्स को अनुसूचित क्षेत्र से हटा दिया. जबकि 110 अनुसूचित ब्लॉक को यथावत रखा गया. राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग की ओर से जारी अधिसूचना संख्या 1140 में यह लिखा गया है कि शैक्षणिक और स्वास्थ्य कार्यों से संबधित संस्थान खोलने के लिए रियायती दरों पर भूमि उपलब्ध कराने के लिए सरकार की ओर से अनुसूचित क्षेत्रों को अधिसूचित किया गया है. जिसके तहत राज्य के 134 अनुसूचित ब्लॉक्स के नगर निकायों को छोड़कर 110 ब्लॉक को अनुसूचित क्षेत्र के रूप में अधिसूचित किया जाता है. जबकि संविधान के आर्टिकल 244  के अनुसार किसी भी राज्य में अनुसूचित क्षेत्रों को राष्ट्रपति ही तय कर सकते है.

2007 में राष्ट्रपति की ओर से निकाली गई थी अधिसूचना

साल 2007 में राष्ट्रपति ने राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों के संबंध में अधिसूचना जारी की थी. जिसके अनुसार झारखंड के 12 जिले, 3 प्रखंड और 2 पंचायत को अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया गया. वहीं संविधान के अनुसार, पांचवीं अनुसूची के पैरा 6 (1) में भी यही कहा गया है कि किसी भी क्षेत्र को राष्ट्रपति के अधिसूचना के बाद ही अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया जाता है. इसमें राज्यपाल से भी विचार-विमर्श किया जाता है.

इन जिले के ब्लॉक थे अनुसूचित

2007 की अधिसूचना के अनुसार रांची, लोहरदगा, खूंटी, सिमडेगा, लातेहार, गुमला, पूर्वी सिंहभूम, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला खरसांवा, जामताड़ा, साहेबगंज, दुमका, पाकुड़ मुख्य रूप से हैं. इसके साथ ही पलामू, गढ़वा और गोड्डा के कुछ ब्लॉक इसमें शामिल हैं.

पलामू का एक भी ब्लॉक नहीं

राज्य सरकार की ओर से अधिसूचित अनुसूचित क्षेत्रों में पलामू के एक भी ब्लॉक को शामिल नहीं किया गया. जबकि 2007 की अधिसूचना में पलामू के सतबरवा प्रखंड के राबड़ा और बकोरिया पंचायत को शामिल किया गया था.

राज्य सरकार की अधिसूचना के बाद ये ब्लॉक है अनुसूचित

रांची जिला- बेड़ो, लापुंग, अनगड़ा, बुढ़मू, चान्हो, मांडर, तमाड़, सोनाहातु, इटकी और राहे. खूंटी जिला में तोरपा, रनिया, मुरहू, अड़की, कर्रा है. सिमडेगा में कोलेबिरा, बानो, जलडेगा, थेथईटांगर, बोलबा, कुरडेग, पाकरटांड़, केरसई, बांसजोर है. लातेहार में गारू, महुआटांड़, बरवाडीह, मनिका, बालूमाथ, चंदवा और बरियातु,. गुमला से भरनो, घाघरा, चैनपुर, डुमरी, विशुनपुर, रायडीह, पालकोट, बसिया, कामडारा, अलबर्ट एक्का. लोहरदगा से भंडरा, सेन्हा, किस्को, कुड़ू, कैरो, पेशरार है. पूर्वी सिंहभूम से मनोहरपूर, कुमारडुंगी, मंझगांव, मंझारी, खूंटपानी, तांतनगर, नोवामुंडी, जगरनाथपुर, गोइलकेरा, सोनुआ, झींकपानी, टोन्टो, गम्हरिया, आंनदपुर, गुदड़ी है. सरायकेला-खरसावां से खरसावां, कुचाई, चांडिल, ईचागढ़, नीमडीह, राजनगर और कुकड़ू है. जामताड़ा से नारायणपुर, नाला, कुंढित, करमाटांड़ और फतहेपुर है. दुमका से जामा, शिकारीपाड़ा, रानेश्वर, रामगढ़, जरमुंडी, मसलिया, सरैयाहाट, काठीकुंड, गोपीकांदर है. साहेबगंज से बरहेट, पटना, बोरियो, तालझरी, उधवा, मंडरो है. पाकुड़ से पाकुड़िया, महेशपुर, हिरणपुर, लिट्टीपाड़ा और अमड़ापाड़ा है. गोड्डा से सुन्दरपहाड़ी और बोआरीजोर है. वहीं गढ़वा से भंडरिया है.

शिक्षा -स्वास्थ्य की बात हास्यास्पद, भूमि अधिग्रहण मुख्य मुद्दा: बारला

दयामनी बारला ने इस संबध में कहा कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में अनुसूचित क्षेत्रों के बारे में कोई भी निर्णय लेने का अधिकार राष्ट्रपति को होता है. यह पूरी तरह से केंद्र पर आधारित निर्णय होता है. जब तक राष्ट्रपति की सहमति इस पर नहीं मिलती तब तक सरकार ऐसा निर्णय नहीं ले सकती. अब अगर सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बात करती है तो पहले स्कूलों का विलय और स्वास्थ्य सेवाओं को ही दुरूस्त कर लें. यह बिल्कुल ही हास्यास्पद निर्णय है. हर नियम-कानून को साइडलाइन कर सरकार सिर्फ भूमि अधिग्रहण करने के लिए ऐसा कर रही है. ताकि कंपनियों को बसाया जा सके. अगर ऐसा कोई निर्णय लेना ही था तो पहले कानून में संशोधन करती सरकार.

जमीन लूटने के लिए ऐसा कर रही सरकार 

आदिवासी बुद्धीजीवी मंच के प्रभाकर कुजूर ने कहा कि भाजपा सरकार ने सब कुछ अपने हाथ में ले लिया है. पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में सिर्फ गवर्नर और राष्ट्रपति का अधिकार होता है. वहीं निचले स्तर पर ग्राम सभाओं का. लेकिन राज्य में पेसा एक्ट सही से लागू नहीं होने से ऐसा संभव हो पा रहा है. जो गलत है. उन्होंने कहा कि मंच की ओर से पेसा कानून को लेकर पहले से ही हाई कोर्ट में मामला लंबित है. इसके बाद कैबिनेट में सरकार ऐसा फैसला कैसे ले सकती है. ये बिलकुल संविधान के पांचवीं अनुसूची और आर्टिकल 244 का उल्लंघन है.

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